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हमारा दिल जब नहीं लगा तो सवाल पैदा हुआ लगेगा जवाब में हमनें कह दिया ठीक है मगर और क्या लगेगा अ गर कभी तीर चूम कर वो मेरी तरफ़ छोड़ दे कमां से मेरा मुक़द्दर तो इस तरह का है तीर दुश्मन को जा लगेगा कि दोस्त ऐसे मुआशरे में मुआशका चाहते हैं मुझ सेे मैं जिस में थप्पड़ भी खाना चाहूँ तो वो भी बुर्के में आ लगेगा हमारा नक़्शा किराया मेहनत दिमाग लगता है रास्तों पर तुम्हारी तो इनसे दोस्ती है तुम्हारा तो शुक्रिया लगेगा मुशायरों में ग़ज़ल नहीं लोग सिर्फ़ हुलियों को देखते हैं मेरा भी एक दोस्त है जो हँसने के बा'द जॉन एलिया लगेगा

Muzdum Khan11 Likes

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन

Varun Anand

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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वो जो मेरी ताबकारी में पिघलने लग गया जो सितारा भी नहीं था वो भी जलने लग गया ख़ूब-सूरत औरतों ने कर दी बीनाई अता आँख मलने वाला आख़िर हाथ मलने लग गया दूसरा पाँव नहीं रखने दिया मैं ने उसे पहला पाँव रखते ही चश्मा उबलने लग गया

Muzdum Khan

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मुझे न माँगती तो बोलती ख़ुदा दो मुझे बचा लिया है गुनाह से तुम्हें दुआ दो मुझे ये लोग देख रहें हैं मेरी चमक में तुम्हें कहीं अकेले जलाना अभी बुझा दो मुझे मुझे किसी से मुहब्बत नहीं तुम्हारे सिवा तुम्हें किसी से मुहब्बत है तो बता दो मुझे

Muzdum Khan

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दुनिया मेरे ख़िलाफ़ थी, तू भी ख़िलाफ़ है ये सच नहीं है ,है तो मुझे इख़्तिलाफ़ है जो भी करे जहाँ भी करे जिस तरह करे उस को मेरी तरफ़ से सभी कुछ मुआ'फ़ है भीगे हुए है दामन-ओ-रूमाल-ओ-आस्तीं हालांकि आसमान पे मतला भी साफ़ है आवाज़ ही सुनी न हो जिस शख़्स ने कभी उस के लिए मैं जो भी कहूँ इंकिशाफ़ है बदनाम हो गया हूँ मोहब्बत में नाम पर 'मुज़दम' ये मेरा सब सेे बड़ा एतिराफ़ है

Muzdum Khan

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मैं परेशान वो दुखी हुई है ये मोहब्बत है तो बड़ी हुई है कुछ भी अपना नहीं है मेरे पास बद-दुआ भी किसी की दी हुई है उस ने पूछी है आख़िरी ख़्वाहिश और मोहब्बत भी मैं ने की हुई है आज ग़ुस्सा नहीं पिऊॅंगा मैं आज मैं ने शराब पी हुई है मैं तुम्हें इतनी बार चाहता हूँ जितनी औरत पे शा'इरी हुई है बच्चा गिरवा के क्या मिलेगा तुम्हें दुनिया पहले बहुत गिरी हुई है

Muzdum Khan

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किस को रौशन बना रहे हो तुम इतना जो बुझते जा रहे हो तुम फूल किस ने क़बूल करने हैं जब तलक मुस्कुरा रहे हो तुम लोग पागल बनाए जा चुके हैं अब नया क्या बना रहे हो तुम गाँव की झाड़ियाँ बता रहीं हैं शहर में गुल खिला रहे हो तुम और किस ने तुम्हें नहीं देखा और किस के ख़ुदा रहे हो तुम

Muzdum Khan

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