मुझे न माँगती तो बोलती ख़ुदा दो मुझे बचा लिया है गुनाह से तुम्हें दुआ दो मुझे ये लोग देख रहें हैं मेरी चमक में तुम्हें कहीं अकेले जलाना अभी बुझा दो मुझे मुझे किसी से मुहब्बत नहीं तुम्हारे सिवा तुम्हें किसी से मुहब्बत है तो बता दो मुझे
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
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ग़ज़ल तो सब को मीठी लग रही थी मगर नातिक को मिर्ची लग रही थी तुम्हारे लब नहीं चू में थे जब तक मुझे हर चीज़ कड़वी लग रही थी मैं जिस दिन छोड़ने वाला था उस को वो उस दिन सब सेे प्यारी लग रही थी
Zubair Ali Tabish
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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं
Ali Zaryoun
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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वो जो मेरी ताबकारी में पिघलने लग गया जो सितारा भी नहीं था वो भी जलने लग गया ख़ूब-सूरत औरतों ने कर दी बीनाई अता आँख मलने वाला आख़िर हाथ मलने लग गया दूसरा पाँव नहीं रखने दिया मैं ने उसे पहला पाँव रखते ही चश्मा उबलने लग गया
Muzdum Khan
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हमारा दिल जब नहीं लगा तो सवाल पैदा हुआ लगेगा जवाब में हमनें कह दिया ठीक है मगर और क्या लगेगा अ गर कभी तीर चूम कर वो मेरी तरफ़ छोड़ दे कमां से मेरा मुक़द्दर तो इस तरह का है तीर दुश्मन को जा लगेगा कि दोस्त ऐसे मुआशरे में मुआशका चाहते हैं मुझ सेे मैं जिस में थप्पड़ भी खाना चाहूँ तो वो भी बुर्के में आ लगेगा हमारा नक़्शा किराया मेहनत दिमाग लगता है रास्तों पर तुम्हारी तो इनसे दोस्ती है तुम्हारा तो शुक्रिया लगेगा मुशायरों में ग़ज़ल नहीं लोग सिर्फ़ हुलियों को देखते हैं मेरा भी एक दोस्त है जो हँसने के बा'द जॉन एलिया लगेगा
Muzdum Khan
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तेरी तस्वीर मोअत्तल नहीं होती मेरे दोस्त वरना दीवार तो पागल नहीं होती मेरे दोस्त इश्क़ में जीत मुक़द्दर से है मेहनत से नहीं ऐसे खेलों में रिहर्सल नहीं होती मेरे दोस्त उस ने बेचैनी भी बख़्शी है बड़ी मुश्किल से और बेचैनी मुसलसल नहीं होती मेरे दोस्त
Muzdum Khan
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किस को रौशन बना रहे हो तुम इतना जो बुझते जा रहे हो तुम फूल किस ने क़बूल करने हैं जब तलक मुस्कुरा रहे हो तुम लोग पागल बनाए जा चुके हैं अब नया क्या बना रहे हो तुम गाँव की झाड़ियाँ बता रहीं हैं शहर में गुल खिला रहे हो तुम और किस ने तुम्हें नहीं देखा और किस के ख़ुदा रहे हो तुम
Muzdum Khan
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मैं परेशान वो दुखी हुई है ये मोहब्बत है तो बड़ी हुई है कुछ भी अपना नहीं है मेरे पास बद-दुआ भी किसी की दी हुई है उस ने पूछी है आख़िरी ख़्वाहिश और मोहब्बत भी मैं ने की हुई है आज ग़ुस्सा नहीं पिऊॅंगा मैं आज मैं ने शराब पी हुई है मैं तुम्हें इतनी बार चाहता हूँ जितनी औरत पे शा'इरी हुई है बच्चा गिरवा के क्या मिलेगा तुम्हें दुनिया पहले बहुत गिरी हुई है
Muzdum Khan
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