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वो जो मेरी ताबकारी में पिघलने लग गया जो सितारा भी नहीं था वो भी जलने लग गया ख़ूब-सूरत औरतों ने कर दी बीनाई अता आँख मलने वाला आख़िर हाथ मलने लग गया दूसरा पाँव नहीं रखने दिया मैं ने उसे पहला पाँव रखते ही चश्मा उबलने लग गया

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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मुझे न माँगती तो बोलती ख़ुदा दो मुझे बचा लिया है गुनाह से तुम्हें दुआ दो मुझे ये लोग देख रहें हैं मेरी चमक में तुम्हें कहीं अकेले जलाना अभी बुझा दो मुझे मुझे किसी से मुहब्बत नहीं तुम्हारे सिवा तुम्हें किसी से मुहब्बत है तो बता दो मुझे

Muzdum Khan

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दुनिया मेरे ख़िलाफ़ थी, तू भी ख़िलाफ़ है ये सच नहीं है ,है तो मुझे इख़्तिलाफ़ है जो भी करे जहाँ भी करे जिस तरह करे उस को मेरी तरफ़ से सभी कुछ मुआ'फ़ है भीगे हुए है दामन-ओ-रूमाल-ओ-आस्तीं हालांकि आसमान पे मतला भी साफ़ है आवाज़ ही सुनी न हो जिस शख़्स ने कभी उस के लिए मैं जो भी कहूँ इंकिशाफ़ है बदनाम हो गया हूँ मोहब्बत में नाम पर 'मुज़दम' ये मेरा सब सेे बड़ा एतिराफ़ है

Muzdum Khan

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किस को रौशन बना रहे हो तुम इतना जो बुझते जा रहे हो तुम फूल किस ने क़बूल करने हैं जब तलक मुस्कुरा रहे हो तुम लोग पागल बनाए जा चुके हैं अब नया क्या बना रहे हो तुम गाँव की झाड़ियाँ बता रहीं हैं शहर में गुल खिला रहे हो तुम और किस ने तुम्हें नहीं देखा और किस के ख़ुदा रहे हो तुम

Muzdum Khan

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तेरी तस्वीर मोअत्तल नहीं होती मेरे दोस्त वरना दीवार तो पागल नहीं होती मेरे दोस्त इश्क़ में जीत मुक़द्दर से है मेहनत से नहीं ऐसे खेलों में रिहर्सल नहीं होती मेरे दोस्त उस ने बेचैनी भी बख़्शी है बड़ी मुश्किल से और बेचैनी मुसलसल नहीं होती मेरे दोस्त

Muzdum Khan

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बिस्तर को झटकना पड़ता है कपड़ो को बदलना पड़ता है लोगों को बसर करने के लिए कमरों से निकलना पड़ता है हम उन बाग़ों में ख़िलते है जिन बाग़ों में ख़ुश्बू के लिए फूलों को उचकना पड़ता है,कलियों को मसलना पड़ता है पहली को भुलाने के लिए दूसरी औरत लाई जाती है इक ज़ह्र उगलने के लिए दूसरा ज़ह्र निगलना पड़ता है वो रोज़ कहीं से ज़ख़्मी हो कर आ जाती है और मुझे कुत्तों को हटकना पड़ता है कीड़ों को कुचलना पड़ता है मैं पल में उस के जिस्म की सैर से फ़ारिग़ हो जाता हूँ मगर मुझे इस रफ़्तार को हासिल करने के लिए जलना पड़ता है शादाब गुज़रगाहों पे तेरे काँटो की तिज़ारत होती है वीरान गुज़रगाहों पे मेरी आँखों को छलकना पड़ता है ताख़ीर से लौटने वालों की तक़लीफ़ भी दोहरी होती है हाथों को भी मलना पड़ता है बाहों को भी मलना पड़ता है

Muzdum Khan

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