ghazalKuch Alfaaz

बिस्तर को झटकना पड़ता है कपड़ो को बदलना पड़ता है लोगों को बसर करने के लिए कमरों से निकलना पड़ता है हम उन बाग़ों में ख़िलते है जिन बाग़ों में ख़ुश्बू के लिए फूलों को उचकना पड़ता है,कलियों को मसलना पड़ता है पहली को भुलाने के लिए दूसरी औरत लाई जाती है इक ज़ह्र उगलने के लिए दूसरा ज़ह्र निगलना पड़ता है वो रोज़ कहीं से ज़ख़्मी हो कर आ जाती है और मुझे कुत्तों को हटकना पड़ता है कीड़ों को कुचलना पड़ता है मैं पल में उस के जिस्म की सैर से फ़ारिग़ हो जाता हूँ मगर मुझे इस रफ़्तार को हासिल करने के लिए जलना पड़ता है शादाब गुज़रगाहों पे तेरे काँटो की तिज़ारत होती है वीरान गुज़रगाहों पे मेरी आँखों को छलकना पड़ता है ताख़ीर से लौटने वालों की तक़लीफ़ भी दोहरी होती है हाथों को भी मलना पड़ता है बाहों को भी मलना पड़ता है

Muzdum Khan13 Likes

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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ख़याल में भी उसे बे-रिदा नहीं किया है ये ज़ुल्म मुझ सेे नहीं हो सका नहीं किया है मैं एक शख़्स को ईमान जानता हूँ तो क्या ख़ुदा के नाम पर लोगों ने क्या नहीं किया है इसीलिए तो मैं रोया नहीं बिछड़ते समय तुझे रवाना किया है जुदा नहीं किया है ये बद-तमीज़ अगर तुझ सेे डर रहे हैं तो फिर तुझे बिगाड़ कर मैं ने बुरा नहीं किया है

Ali Zaryoun

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आईने आँख में चुभते थे बिस्तर से बदन कतराता था एक याद बसर करती थी मुझे मैं साँस नहीं ले पाता था एक शख़्स के हाथ में था सब कुछ मेरा खिलना भी मुरझाना भी रोता था तो रात उजड़ जाती हँसता था तो दिन बन जाता था मैं रब से राब्ते में रहता मुमकिन है की उस से राब्ता हो मुझे हाथ उठाना पड़ते थे तब जा कर वो फोन उठाता था मुझे आज भी याद है बचपन में कभी उस पर नजर अगर पड़ती मेरे बस्ते से फूल बरसते थे मेरी तख्ती पे दिल बन जाता था हम एक ज़िंदान में ज़िंदा थे हम एक जंजीर में बढ़े हुए एक दूसरे को देख कर हम कभी हंसते थे तो रोना आता था वो जिस्म नज़र-अंदाज़ नहीं हो पाता था इन आँखों से मुजरिम ठहराता था अपना कहने को तो घर ठहराता था

Tehzeeb Hafi

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मेरे अश'आर सुनाना न सुनाने देना जब मैं दुनिया से चला जाऊँ तो जाने देना साथ इन के है बहुत ख़ाक उड़ाई मैं ने इन हवाओं को मेरी ख़ाक उड़ाने देना मत बताना कि बिखर जाएँ तो क्या होता है नई नस्लों को नए ख़्वाब सजाने देना वक़्त दुनिया को सुनाएगा कहानी मेरी कहे देता हूँ मिरा नाम न आने देना रहूँ ख़ामोश तो ख़ामोश ही रखना मुझ को और अगर शोर मचाऊँ तो मचाने देना अब तो बारिश में भी स्कूल खुला करते हैं वहाँ मत भेजना बच्चों को नहाने देना जान लेना कि नया हाथ बुलाता है तुम्हें गर कोई हाथ छुड़ाए तो छुड़ाने देना हाँ वही बात जो मालूम है तुम लोगों को मैं वही बात छुपाऊँगा छुपाने देना मेरे जीने पे हँसे लोग कोई बात नहीं हाँ मिरी मौत का मातम न मनाने देना

Ameer Imam

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वो जो मेरी ताबकारी में पिघलने लग गया जो सितारा भी नहीं था वो भी जलने लग गया ख़ूब-सूरत औरतों ने कर दी बीनाई अता आँख मलने वाला आख़िर हाथ मलने लग गया दूसरा पाँव नहीं रखने दिया मैं ने उसे पहला पाँव रखते ही चश्मा उबलने लग गया

Muzdum Khan

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दुनिया मेरे ख़िलाफ़ थी, तू भी ख़िलाफ़ है ये सच नहीं है ,है तो मुझे इख़्तिलाफ़ है जो भी करे जहाँ भी करे जिस तरह करे उस को मेरी तरफ़ से सभी कुछ मुआ'फ़ है भीगे हुए है दामन-ओ-रूमाल-ओ-आस्तीं हालांकि आसमान पे मतला भी साफ़ है आवाज़ ही सुनी न हो जिस शख़्स ने कभी उस के लिए मैं जो भी कहूँ इंकिशाफ़ है बदनाम हो गया हूँ मोहब्बत में नाम पर 'मुज़दम' ये मेरा सब सेे बड़ा एतिराफ़ है

Muzdum Khan

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मुझे न माँगती तो बोलती ख़ुदा दो मुझे बचा लिया है गुनाह से तुम्हें दुआ दो मुझे ये लोग देख रहें हैं मेरी चमक में तुम्हें कहीं अकेले जलाना अभी बुझा दो मुझे मुझे किसी से मुहब्बत नहीं तुम्हारे सिवा तुम्हें किसी से मुहब्बत है तो बता दो मुझे

Muzdum Khan

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किस को रौशन बना रहे हो तुम इतना जो बुझते जा रहे हो तुम फूल किस ने क़बूल करने हैं जब तलक मुस्कुरा रहे हो तुम लोग पागल बनाए जा चुके हैं अब नया क्या बना रहे हो तुम गाँव की झाड़ियाँ बता रहीं हैं शहर में गुल खिला रहे हो तुम और किस ने तुम्हें नहीं देखा और किस के ख़ुदा रहे हो तुम

Muzdum Khan

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तेरी तस्वीर मोअत्तल नहीं होती मेरे दोस्त वरना दीवार तो पागल नहीं होती मेरे दोस्त इश्क़ में जीत मुक़द्दर से है मेहनत से नहीं ऐसे खेलों में रिहर्सल नहीं होती मेरे दोस्त उस ने बेचैनी भी बख़्शी है बड़ी मुश्किल से और बेचैनी मुसलसल नहीं होती मेरे दोस्त

Muzdum Khan

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