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ज़िंदगी तू ने सुलूक ऐसे किए साथ मेरे वो तो अच्छा है कि बाँधे हुए हैं हाथ मेरे रोज़ मैं लौटता हूँ ख़ुद में नदामत के साथ रोज़ मुझ को कहीं फेंक आते हैं जज़्बात मेरे मुझ को सुनिए नज़र-अंदाज़ न कीजे साहब मेरे हालात से अच्छे है ख़यालात मेरे

Ismail Raaz15 Likes

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Waseem Barelvi

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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वो मुँह लगाता है जब कोई काम होता है जो उस का होता है समझो ग़ुलाम होता है किसी का हो के दुबारा न आना मेरी तरफ़ मोहब्बतों में हलाला हराम होता है इसे भी गिनते हैं हम लोग अहल-ए-ख़ाना में हमारे याँ तो शजर का भी नाम होता है तुझ ऐसे शख़्स के होते हैं ख़ास दोस्त बहुत तुझ ऐसा शख़्स बहुत जल्द आम होता है कभी लगी है तुम्हें कोई शाम आख़िरी शाम हमारे साथ ये हर एक शाम होता है

Umair Najmi

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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

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रू-ब-रू तेरे बहुत देर बिठाया गया मैं वज्द में आया नहीं वज्द में लाया गया मैं सिलसिला ख़त्म न होगा ये दिल-आज़ारी का इस से पहले भी कई बार मनाया गया मैं यूँँ लगा सब ने गवाही दी कि तू मेरा है जब तिरे नाम से बस्ती में सताया गया मैं जब जब असरार मिरी ज़ात के खुलने से रहे छेड़ कर ज़िक्र तिरा वज्द में लाया गया मैं मुझ से रस्ते में ठहरने की अज़िय्यत पूछो ठोकरें मार के रस्ते से हटाया गया मैं

Ismail Raaz

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ठोकरों में असर नहीं आया दिल अभी राह पर नहीं आया ख़ुद में देखा जो झाँक कर तिरे बा'द मुझ को मैं भी नज़र नहीं आया मुद्दतों से सुकूत चीख़ता है लेकिन अब तक असर नहीं आया चाँद किस तमकनत से निकलेगा तू अगर बाम पर नहीं आया कब से घर छोड़ कर गया हुआ हूँ कब से मैं लौट कर नहीं आया

Ismail Raaz

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पड़ी है रात कोई ग़म-शनास भी नहीं है शराब खाने में आधा गिलास भी नहीं है मैं दिल को ले कर कहा निकलूं इतनी रात गए मकान उस का कहीं आसपास भी नहीं है यहाँ तो लड़कियां अच्छा सा घर भी चाहती है हमारे पास तो अच्छा लिबास भी नहीं है

Ismail Raaz

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ज़माना इस लिए लहजा बदल रहा है दोस्त हमारा वक़्त ज़रा पीछे चल रहा दोस्त मैं मुस्कुरा रहा हूँ तेरी रुख़्सती पे अगर तो मुझ में कौन है जो हाथ मल रहा है दोस्त न मिल सकी मिरे हिस्से की रौशनी भी मुझे मिरा चराग़ कहीं और जल रहा है दोस्त पलीद कर के हमारे वजूद की मिट्टी हमारे नाम का सूरज निकल रहा है दोस्त बताएँ क्या तुझे अब ख़स्ता-हाली-ए-दिल 'राज़' शिकस्ता ख़्वाब के टुकड़ों पे पल रहा है दोस्त

Ismail Raaz

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अब इस भ्रम में हर एक रात काटनी है मुझे के आने वाली तेरे साथ काटनी हैं मुझे तुझे दिलाना है एहसास अपने इस दुख का तू कुछ तो बोल तेरी बात काटनी है मुझे मुझे तुलू-ए-सहर की तसल्लीया मत दे अभी तो ये शब-ए-जुलमात काटनी हैं मुझे

Ismail Raaz

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