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ज़माना इस लिए लहजा बदल रहा है दोस्त हमारा वक़्त ज़रा पीछे चल रहा दोस्त मैं मुस्कुरा रहा हूँ तेरी रुख़्सती पे अगर तो मुझ में कौन है जो हाथ मल रहा है दोस्त न मिल सकी मिरे हिस्से की रौशनी भी मुझे मिरा चराग़ कहीं और जल रहा है दोस्त पलीद कर के हमारे वजूद की मिट्टी हमारे नाम का सूरज निकल रहा है दोस्त बताएँ क्या तुझे अब ख़स्ता-हाली-ए-दिल 'राज़' शिकस्ता ख़्वाब के टुकड़ों पे पल रहा है दोस्त

Ismail Raaz15 Likes

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चल दिए फेर कर नज़र तुम भी ग़ैर तो ग़ैर थे मगर तुम भी ये गली मेरे दिलरुबा की है दोस्तों ख़ैरियत इधर तुम भी मुझ पे लोगों के साथ हँसते हो लोग रोएँगे ख़ास कर तुम भी मुझ को ठुकरा दिया है दुनिया ने मैं तो मर जाऊँगा अगर तुम भी उस की गाड़ी तो जा चुकी 'ताबिश' अब उठो जाओ अपने घर तुम भी

Zubair Ali Tabish

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

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अगर तू बे-वफ़ा है ध्यान रखना मुझे सब कुछ पता है ध्यान रखना बिछड़ते वक़्त हम ने कह दिया था हमारा दिल दुखा है ध्यान रखना ख़ुदा जिस की मोहब्बत में बनी हो वो कइयों का ख़ुदा है ध्यान रखना जिसे तुम दोस्त केवल जानती हो वो तुम को चाहता है ध्यान रखना

Anand Raj Singh

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आज जिन झीलों का बस काग़ज़ में नक़्शा रह गया एक मुद्दत तक मैं उन आँखों से बहता रह गया मैं उसे ना-क़ाबिल-ए-बर्दाश्त समझा था मगर वो मेरे दिल में रहा और अच्छा ख़ासा रह गया वो जो आधे थे तुझे मिल कर मुक़म्मल हो गए जो मुक़म्मल था वो तेरे ग़म में आधा रह गया

Tehzeeb Hafi

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रू-ब-रू तेरे बहुत देर बिठाया गया मैं वज्द में आया नहीं वज्द में लाया गया मैं सिलसिला ख़त्म न होगा ये दिल-आज़ारी का इस से पहले भी कई बार मनाया गया मैं यूँँ लगा सब ने गवाही दी कि तू मेरा है जब तिरे नाम से बस्ती में सताया गया मैं जब जब असरार मिरी ज़ात के खुलने से रहे छेड़ कर ज़िक्र तिरा वज्द में लाया गया मैं मुझ से रस्ते में ठहरने की अज़िय्यत पूछो ठोकरें मार के रस्ते से हटाया गया मैं

Ismail Raaz

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पड़ी है रात कोई ग़म-शनास भी नहीं है शराब खाने में आधा गिलास भी नहीं है मैं दिल को ले कर कहा निकलूं इतनी रात गए मकान उस का कहीं आसपास भी नहीं है यहाँ तो लड़कियां अच्छा सा घर भी चाहती है हमारे पास तो अच्छा लिबास भी नहीं है

Ismail Raaz

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ठोकरों में असर नहीं आया दिल अभी राह पर नहीं आया ख़ुद में देखा जो झाँक कर तिरे बा'द मुझ को मैं भी नज़र नहीं आया मुद्दतों से सुकूत चीख़ता है लेकिन अब तक असर नहीं आया चाँद किस तमकनत से निकलेगा तू अगर बाम पर नहीं आया कब से घर छोड़ कर गया हुआ हूँ कब से मैं लौट कर नहीं आया

Ismail Raaz

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ज़िंदगी तू ने सुलूक ऐसे किए साथ मेरे वो तो अच्छा है कि बाँधे हुए हैं हाथ मेरे रोज़ मैं लौटता हूँ ख़ुद में नदामत के साथ रोज़ मुझ को कहीं फेंक आते हैं जज़्बात मेरे मुझ को सुनिए नज़र-अंदाज़ न कीजे साहब मेरे हालात से अच्छे है ख़यालात मेरे

Ismail Raaz

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तेरी गली को छोड़ के पागल नहीं गया रस्सी तो जल गई है मगर बल नहीं गया मजनूँ की तरह छोड़ा नहीं मैं ने शहर को या'नी मैं हिज्र काटने जंगल नहीं गया उस को नज़र उठा के ज़रा देखने तो दे फिर कहना मेरा जादू अगर चल नहीं गया हाए वो आँखें टाट को तकते ही बुझ गईं हाए वो दिल कि जानिब-ए-मख़मल नहीं गया तेरे मकाँ के बा'द क़दम ही नहीं उठे तेरे मकाँ से आगे मैं पैदल नहीं गया

Ismail Raaz

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