ghazalKuch Alfaaz

रू-ब-रू तेरे बहुत देर बिठाया गया मैं वज्द में आया नहीं वज्द में लाया गया मैं सिलसिला ख़त्म न होगा ये दिल-आज़ारी का इस से पहले भी कई बार मनाया गया मैं यूँँ लगा सब ने गवाही दी कि तू मेरा है जब तिरे नाम से बस्ती में सताया गया मैं जब जब असरार मिरी ज़ात के खुलने से रहे छेड़ कर ज़िक्र तिरा वज्द में लाया गया मैं मुझ से रस्ते में ठहरने की अज़िय्यत पूछो ठोकरें मार के रस्ते से हटाया गया मैं

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं

Ali Zaryoun

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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो

Tehzeeb Hafi

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पड़ी है रात कोई ग़म-शनास भी नहीं है शराब खाने में आधा गिलास भी नहीं है मैं दिल को ले कर कहा निकलूं इतनी रात गए मकान उस का कहीं आसपास भी नहीं है यहाँ तो लड़कियां अच्छा सा घर भी चाहती है हमारे पास तो अच्छा लिबास भी नहीं है

Ismail Raaz

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ज़माना इस लिए लहजा बदल रहा है दोस्त हमारा वक़्त ज़रा पीछे चल रहा दोस्त मैं मुस्कुरा रहा हूँ तेरी रुख़्सती पे अगर तो मुझ में कौन है जो हाथ मल रहा है दोस्त न मिल सकी मिरे हिस्से की रौशनी भी मुझे मिरा चराग़ कहीं और जल रहा है दोस्त पलीद कर के हमारे वजूद की मिट्टी हमारे नाम का सूरज निकल रहा है दोस्त बताएँ क्या तुझे अब ख़स्ता-हाली-ए-दिल 'राज़' शिकस्ता ख़्वाब के टुकड़ों पे पल रहा है दोस्त

Ismail Raaz

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ठोकरों में असर नहीं आया दिल अभी राह पर नहीं आया ख़ुद में देखा जो झाँक कर तिरे बा'द मुझ को मैं भी नज़र नहीं आया मुद्दतों से सुकूत चीख़ता है लेकिन अब तक असर नहीं आया चाँद किस तमकनत से निकलेगा तू अगर बाम पर नहीं आया कब से घर छोड़ कर गया हुआ हूँ कब से मैं लौट कर नहीं आया

Ismail Raaz

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ज़िंदगी तू ने सुलूक ऐसे किए साथ मेरे वो तो अच्छा है कि बाँधे हुए हैं हाथ मेरे रोज़ मैं लौटता हूँ ख़ुद में नदामत के साथ रोज़ मुझ को कहीं फेंक आते हैं जज़्बात मेरे मुझ को सुनिए नज़र-अंदाज़ न कीजे साहब मेरे हालात से अच्छे है ख़यालात मेरे

Ismail Raaz

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तेरी गली को छोड़ के पागल नहीं गया रस्सी तो जल गई है मगर बल नहीं गया मजनूँ की तरह छोड़ा नहीं मैं ने शहर को या'नी मैं हिज्र काटने जंगल नहीं गया उस को नज़र उठा के ज़रा देखने तो दे फिर कहना मेरा जादू अगर चल नहीं गया हाए वो आँखें टाट को तकते ही बुझ गईं हाए वो दिल कि जानिब-ए-मख़मल नहीं गया तेरे मकाँ के बा'द क़दम ही नहीं उठे तेरे मकाँ से आगे मैं पैदल नहीं गया

Ismail Raaz

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