ghazalKuch Alfaaz

कितनी ही बे-ज़रर सही तेरी ख़राबियाँ 'बासिर' ख़राबियाँ तो हैं फिर भी ख़राबियाँ हालत जगह बदलने से बदली नहीं मिरी होती हैं हर जगह की कुछ अपनी ख़राबियाँ तू चाहता है अपनी नई ख़ूबियों की दाद मुझ को अज़ीज़ तेरी पुरानी ख़राबियाँ जूँही तअ'ल्लुक़ात किसी से हुए ख़राब सारे जहाँ की उस में मिलेंगी ख़राबियाँ सरकार का है अपना ही मेआ'र-ए-इंतिख़ाब यारो कहाँ की ख़ूबियाँ कैसी ख़राबियाँ आदम ख़ता का पुतला है गर मान लें ये बात निकलेंगी इस ख़राबी से कितनी ख़राबियाँ उन हस्तियों की राह पे देखेंगे चल के हम जिन में न थीं किसी भी तरह की ख़राबियाँ बोएँगे अपने बाग़ में सब ख़ूबियों के बीज जड़ से उखाड़ फेंकेंगे सारी ख़राबियाँ 'बासिर' की शख़्सियत भी अजब है कि इस में हैं कुछ ख़ूबियाँ ख़राब कुछ अच्छी ख़राबियाँ

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जिस तरह वक़्त गुज़रने के लिए होता है आदमी शक्ल पे मरने के लिए होता है तेरी आँखों से मुलाक़ात हुई तब ये खुला डूबने वाला उभरने के लिए होता है इश्क़ क्यूँँ पीछे हटा बात निभाने से मियाँ हुस्न तो ख़ैर मुकरने के लिए होता है आँख होती है किसी राह को तकने के लिए दिल किसी पाँव पे धरने के लिए होता है दिल की दिल्ली का चुनाव ही अलग है साहब जब भी होता है ये हरने के लिए होता है कोई बस्ती हो उजड़ने के लिए बसती है कोई मज़मा हो बिखरने के लिए होता है

Ali Zaryoun

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा

Hasan Abbasi

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बरसों पुराना दोस्त मिला जैसे ग़ैर हो देखा रुका झिझक के कहा तुम उमैर हो मिलते हैं मुश्किलों से यहाँ हम-ख़याल लोग तेरे तमाम चाहने वालों की ख़ैर हो कमरे में सिगरेटों का धुआँ और तेरी महक जैसे शदीद धुंध में बाग़ों की सैर हो हम मुत्मइन बहुत हैं अगर ख़ुश नहीं भी हैं तुम ख़ुश हो क्या हुआ जो हमारे बग़ैर हो पैरों में उस के सर को धरें इल्तिजा करें इक इल्तिजा कि जिस का न सर हो न पैर हो

Umair Najmi

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ज़ख़्म तुम्हारे भर जाएँगे थोड़ी देर लगेगी बे-सब्री से काम लिया तो और भी देर लगेगी साहब आज तो अपना काम करा के जाएँगे हम सारी शर्तें पूरी हैं फिर कैसी देर लगेगी यूँँ बेहाल न हो ऐ दिल बस आते ही होंगे वो कल भी देर लगी थी उन को आज भी देर लगेगी सीख लिया है मैं ने अपने आप से बातें करना फ़िक्र नहीं उन को आने में कितनी देर लगेगी कौन रुके अब उस के दर पर शाम हुई घर जाएँ इतना ज़रूरी काम नहीं है जितनी देर लगेगी इतनी देर में कुछ के कुछ हो जाएँगे हालात ख़त लिखने से ख़त मिलने तक जितनी देर लगेगी मार-गज़ीदा कौन बचा है 'बासिर' शुक्र करो तुम ठीक भी हो जाओगे लेकिन ख़ासी देर लगेगी

Basir Sultan Kazmi

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हम जैसे तेग़-ए-ज़ुल्म से डर भी गए तो क्या कुछ वो भी हैं जो कहते हैं सर भी गए तो क्या उठती रहेंगी दर्द की टीसें तमाम उम्र हैं ज़ख़्म तेरे हाथ के भर भी गए तो क्या हैं कौन से बहार के दिन अपने मुंतज़िर ये दिन किसी तरह से गुज़र भी गए तो क्या इक मक्र ही था आप का ईफ़ा-ए-अहद भी अपने कहे से आज मुकर भी गए तो क्या हम तो इसी तरह से फिरेंगे ख़राब-हाल ये शे'र तेरे दिल में उतर भी गए तो क्या 'बासिर' तुम्हें यहाँ का अभी तजरबा नहीं बीमार हो? पड़े रहो, मर भी गए तो क्या

Basir Sultan Kazmi

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ये नहीं है कि तुझे मैं ने पुकारा कम है मेरे नालों को हवाओं का सहारा कम है इस क़दर हिज्र में की नज्म-शुमारी हम ने जान लेते हैं कहाँ कोई सितारा कम है दोस्ती में तो कोई शक नहीं उस की पर वो दोस्त दुश्मन का ज़ियादा है हमारा कम है साफ़ इज़हार हो और वो भी कम-अज़-कम दो बार हम वो आक़िल हैं जिन्हें एक इशारा कम है एक रुख़्सार पे देखा है वो तिल हम ने भी हो समरक़ंद मुक़ाबिल कि बुख़ारा कम है इतनी जल्दी न बना राय मिरे बारे में हम ने हमराह अभी वक़्त गुज़ारा कम है बाग़ इक हम को मिला था मगर उस को अफ़्सोस हम ने जी भर के बिगाड़ा है सँवारा कम है आज तक अपनी समझ में नहीं आया 'बासिर' कौन सा काम है वो जिस में ख़सारा कम है

Basir Sultan Kazmi

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कर लिया दिन में काम आठ से पाँच अब चले दौर-ए-जाम आठ से पाँच चाँद है और आसमान है साफ़ रहिए बाला-ए-बाम आठ से पाँच अब तो हम बन गए हैं एक मशीन अब हमारा है नाम आठ से पाँच शे'र क्या शाइ'री के बारे में सोचना भी हराम आठ से पाँच कुछ ख़रीदें तो भाव पाँच के आठ और बेचें तो दाम आठ से पाँच वो मिले भी तो बस ये पूछेंगे कुछ मिला काम-वाम आठ से पाँच सोहबत-ए-अहल-ए-ज़ौक़ है 'बासिर' अब सुनाओ कलाम आठ से पाँच

Basir Sultan Kazmi

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होते हैं जो सब के वो किसी के नहीं होते औरों के तो क्या होंगे वो अपने नहीं होते मिल उन से कभी जागते हैं जिन के मुक़द्दर तेरी तरह हर वक़्त वो सोए नहीं होते दिन में जो फिरा करते हैं हुशियार ओ ख़बर-दार वो मेरी तरह रात को जागे नहीं होते हम उन की तरफ़ से कभी होते नहीं ग़ाफ़िल रिश्ते वही पक्के हैं जो पक्के नहीं होते अग़्यार ने मुद्दत से जो रोके हुए थे काम अब हम भी ये देखेंगे वो कैसे नहीं होते नाकामी की सूरत में मिले ताना-ए-ना-याफ़्त अब काम मिरे इतने भी कच्चे नहीं होते शब अहल-ए-हवस ऐसे परेशान थे 'बासिर' जैसे मह-ओ-अंजुम कभी देखे नहीं होते

Basir Sultan Kazmi

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