ghazalKuch Alfaaz

होते हैं जो सब के वो किसी के नहीं होते औरों के तो क्या होंगे वो अपने नहीं होते मिल उन से कभी जागते हैं जिन के मुक़द्दर तेरी तरह हर वक़्त वो सोए नहीं होते दिन में जो फिरा करते हैं हुशियार ओ ख़बर-दार वो मेरी तरह रात को जागे नहीं होते हम उन की तरफ़ से कभी होते नहीं ग़ाफ़िल रिश्ते वही पक्के हैं जो पक्के नहीं होते अग़्यार ने मुद्दत से जो रोके हुए थे काम अब हम भी ये देखेंगे वो कैसे नहीं होते नाकामी की सूरत में मिले ताना-ए-ना-याफ़्त अब काम मिरे इतने भी कच्चे नहीं होते शब अहल-ए-हवस ऐसे परेशान थे 'बासिर' जैसे मह-ओ-अंजुम कभी देखे नहीं होते

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Rahat Indori

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किसी लिबास की ख़ुशबू जब उड़ के आती है तेरे बदन की जुदाई बहुत सताती है तेरे गुलाब तरसते हैं तेरी ख़ुशबू को तेरी सफ़ेद चमेली तुझे बुलाती है तेरे बग़ैर मुझे चैन कैसे पड़ता हैं मेरे बगैर तुझे नींद कैसे आती है

Jaun Elia

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कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे शाम हुए ख़ुश-बाश यहाँ के मेरे पास आ जाते हैं मेरे बुझने का नज़्ज़ारा करने आ जाते होंगे वो जो न आने वाला है ना उस से मुझ को मतलब था आने वालों से क्या मतलब आते हैं आते होंगे उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा यूँँही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे मेरा साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएँगे या'नी मेरे बा'द भी या'नी साँस लिए जाते होंगे

Jaun Elia

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ज़ख़्म तुम्हारे भर जाएँगे थोड़ी देर लगेगी बे-सब्री से काम लिया तो और भी देर लगेगी साहब आज तो अपना काम करा के जाएँगे हम सारी शर्तें पूरी हैं फिर कैसी देर लगेगी यूँँ बेहाल न हो ऐ दिल बस आते ही होंगे वो कल भी देर लगी थी उन को आज भी देर लगेगी सीख लिया है मैं ने अपने आप से बातें करना फ़िक्र नहीं उन को आने में कितनी देर लगेगी कौन रुके अब उस के दर पर शाम हुई घर जाएँ इतना ज़रूरी काम नहीं है जितनी देर लगेगी इतनी देर में कुछ के कुछ हो जाएँगे हालात ख़त लिखने से ख़त मिलने तक जितनी देर लगेगी मार-गज़ीदा कौन बचा है 'बासिर' शुक्र करो तुम ठीक भी हो जाओगे लेकिन ख़ासी देर लगेगी

Basir Sultan Kazmi

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ये नहीं है कि तुझे मैं ने पुकारा कम है मेरे नालों को हवाओं का सहारा कम है इस क़दर हिज्र में की नज्म-शुमारी हम ने जान लेते हैं कहाँ कोई सितारा कम है दोस्ती में तो कोई शक नहीं उस की पर वो दोस्त दुश्मन का ज़ियादा है हमारा कम है साफ़ इज़हार हो और वो भी कम-अज़-कम दो बार हम वो आक़िल हैं जिन्हें एक इशारा कम है एक रुख़्सार पे देखा है वो तिल हम ने भी हो समरक़ंद मुक़ाबिल कि बुख़ारा कम है इतनी जल्दी न बना राय मिरे बारे में हम ने हमराह अभी वक़्त गुज़ारा कम है बाग़ इक हम को मिला था मगर उस को अफ़्सोस हम ने जी भर के बिगाड़ा है सँवारा कम है आज तक अपनी समझ में नहीं आया 'बासिर' कौन सा काम है वो जिस में ख़सारा कम है

Basir Sultan Kazmi

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कितनी ही बे-ज़रर सही तेरी ख़राबियाँ 'बासिर' ख़राबियाँ तो हैं फिर भी ख़राबियाँ हालत जगह बदलने से बदली नहीं मिरी होती हैं हर जगह की कुछ अपनी ख़राबियाँ तू चाहता है अपनी नई ख़ूबियों की दाद मुझ को अज़ीज़ तेरी पुरानी ख़राबियाँ जूँही तअ'ल्लुक़ात किसी से हुए ख़राब सारे जहाँ की उस में मिलेंगी ख़राबियाँ सरकार का है अपना ही मेआ'र-ए-इंतिख़ाब यारो कहाँ की ख़ूबियाँ कैसी ख़राबियाँ आदम ख़ता का पुतला है गर मान लें ये बात निकलेंगी इस ख़राबी से कितनी ख़राबियाँ उन हस्तियों की राह पे देखेंगे चल के हम जिन में न थीं किसी भी तरह की ख़राबियाँ बोएँगे अपने बाग़ में सब ख़ूबियों के बीज जड़ से उखाड़ फेंकेंगे सारी ख़राबियाँ 'बासिर' की शख़्सियत भी अजब है कि इस में हैं कुछ ख़ूबियाँ ख़राब कुछ अच्छी ख़राबियाँ

Basir Sultan Kazmi

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हम जैसे तेग़-ए-ज़ुल्म से डर भी गए तो क्या कुछ वो भी हैं जो कहते हैं सर भी गए तो क्या उठती रहेंगी दर्द की टीसें तमाम उम्र हैं ज़ख़्म तेरे हाथ के भर भी गए तो क्या हैं कौन से बहार के दिन अपने मुंतज़िर ये दिन किसी तरह से गुज़र भी गए तो क्या इक मक्र ही था आप का ईफ़ा-ए-अहद भी अपने कहे से आज मुकर भी गए तो क्या हम तो इसी तरह से फिरेंगे ख़राब-हाल ये शे'र तेरे दिल में उतर भी गए तो क्या 'बासिर' तुम्हें यहाँ का अभी तजरबा नहीं बीमार हो? पड़े रहो, मर भी गए तो क्या

Basir Sultan Kazmi

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कर लिया दिन में काम आठ से पाँच अब चले दौर-ए-जाम आठ से पाँच चाँद है और आसमान है साफ़ रहिए बाला-ए-बाम आठ से पाँच अब तो हम बन गए हैं एक मशीन अब हमारा है नाम आठ से पाँच शे'र क्या शाइ'री के बारे में सोचना भी हराम आठ से पाँच कुछ ख़रीदें तो भाव पाँच के आठ और बेचें तो दाम आठ से पाँच वो मिले भी तो बस ये पूछेंगे कुछ मिला काम-वाम आठ से पाँच सोहबत-ए-अहल-ए-ज़ौक़ है 'बासिर' अब सुनाओ कलाम आठ से पाँच

Basir Sultan Kazmi

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