कर लिया दिन में काम आठ से पाँच अब चले दौर-ए-जाम आठ से पाँच चाँद है और आसमान है साफ़ रहिए बाला-ए-बाम आठ से पाँच अब तो हम बन गए हैं एक मशीन अब हमारा है नाम आठ से पाँच शे'र क्या शाइ'री के बारे में सोचना भी हराम आठ से पाँच कुछ ख़रीदें तो भाव पाँच के आठ और बेचें तो दाम आठ से पाँच वो मिले भी तो बस ये पूछेंगे कुछ मिला काम-वाम आठ से पाँच सोहबत-ए-अहल-ए-ज़ौक़ है 'बासिर' अब सुनाओ कलाम आठ से पाँच
Related Ghazal
उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
465 likes
यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
526 likes
ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
355 likes
मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
456 likes
क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
371 likes
More from Basir Sultan Kazmi
हम जैसे तेग़-ए-ज़ुल्म से डर भी गए तो क्या कुछ वो भी हैं जो कहते हैं सर भी गए तो क्या उठती रहेंगी दर्द की टीसें तमाम उम्र हैं ज़ख़्म तेरे हाथ के भर भी गए तो क्या हैं कौन से बहार के दिन अपने मुंतज़िर ये दिन किसी तरह से गुज़र भी गए तो क्या इक मक्र ही था आप का ईफ़ा-ए-अहद भी अपने कहे से आज मुकर भी गए तो क्या हम तो इसी तरह से फिरेंगे ख़राब-हाल ये शे'र तेरे दिल में उतर भी गए तो क्या 'बासिर' तुम्हें यहाँ का अभी तजरबा नहीं बीमार हो? पड़े रहो, मर भी गए तो क्या
Basir Sultan Kazmi
1 likes
कितनी ही बे-ज़रर सही तेरी ख़राबियाँ 'बासिर' ख़राबियाँ तो हैं फिर भी ख़राबियाँ हालत जगह बदलने से बदली नहीं मिरी होती हैं हर जगह की कुछ अपनी ख़राबियाँ तू चाहता है अपनी नई ख़ूबियों की दाद मुझ को अज़ीज़ तेरी पुरानी ख़राबियाँ जूँही तअ'ल्लुक़ात किसी से हुए ख़राब सारे जहाँ की उस में मिलेंगी ख़राबियाँ सरकार का है अपना ही मेआ'र-ए-इंतिख़ाब यारो कहाँ की ख़ूबियाँ कैसी ख़राबियाँ आदम ख़ता का पुतला है गर मान लें ये बात निकलेंगी इस ख़राबी से कितनी ख़राबियाँ उन हस्तियों की राह पे देखेंगे चल के हम जिन में न थीं किसी भी तरह की ख़राबियाँ बोएँगे अपने बाग़ में सब ख़ूबियों के बीज जड़ से उखाड़ फेंकेंगे सारी ख़राबियाँ 'बासिर' की शख़्सियत भी अजब है कि इस में हैं कुछ ख़ूबियाँ ख़राब कुछ अच्छी ख़राबियाँ
Basir Sultan Kazmi
0 likes
ज़ख़्म तुम्हारे भर जाएँगे थोड़ी देर लगेगी बे-सब्री से काम लिया तो और भी देर लगेगी साहब आज तो अपना काम करा के जाएँगे हम सारी शर्तें पूरी हैं फिर कैसी देर लगेगी यूँँ बेहाल न हो ऐ दिल बस आते ही होंगे वो कल भी देर लगी थी उन को आज भी देर लगेगी सीख लिया है मैं ने अपने आप से बातें करना फ़िक्र नहीं उन को आने में कितनी देर लगेगी कौन रुके अब उस के दर पर शाम हुई घर जाएँ इतना ज़रूरी काम नहीं है जितनी देर लगेगी इतनी देर में कुछ के कुछ हो जाएँगे हालात ख़त लिखने से ख़त मिलने तक जितनी देर लगेगी मार-गज़ीदा कौन बचा है 'बासिर' शुक्र करो तुम ठीक भी हो जाओगे लेकिन ख़ासी देर लगेगी
Basir Sultan Kazmi
3 likes
ये नहीं है कि तुझे मैं ने पुकारा कम है मेरे नालों को हवाओं का सहारा कम है इस क़दर हिज्र में की नज्म-शुमारी हम ने जान लेते हैं कहाँ कोई सितारा कम है दोस्ती में तो कोई शक नहीं उस की पर वो दोस्त दुश्मन का ज़ियादा है हमारा कम है साफ़ इज़हार हो और वो भी कम-अज़-कम दो बार हम वो आक़िल हैं जिन्हें एक इशारा कम है एक रुख़्सार पे देखा है वो तिल हम ने भी हो समरक़ंद मुक़ाबिल कि बुख़ारा कम है इतनी जल्दी न बना राय मिरे बारे में हम ने हमराह अभी वक़्त गुज़ारा कम है बाग़ इक हम को मिला था मगर उस को अफ़्सोस हम ने जी भर के बिगाड़ा है सँवारा कम है आज तक अपनी समझ में नहीं आया 'बासिर' कौन सा काम है वो जिस में ख़सारा कम है
Basir Sultan Kazmi
0 likes
होते हैं जो सब के वो किसी के नहीं होते औरों के तो क्या होंगे वो अपने नहीं होते मिल उन से कभी जागते हैं जिन के मुक़द्दर तेरी तरह हर वक़्त वो सोए नहीं होते दिन में जो फिरा करते हैं हुशियार ओ ख़बर-दार वो मेरी तरह रात को जागे नहीं होते हम उन की तरफ़ से कभी होते नहीं ग़ाफ़िल रिश्ते वही पक्के हैं जो पक्के नहीं होते अग़्यार ने मुद्दत से जो रोके हुए थे काम अब हम भी ये देखेंगे वो कैसे नहीं होते नाकामी की सूरत में मिले ताना-ए-ना-याफ़्त अब काम मिरे इतने भी कच्चे नहीं होते शब अहल-ए-हवस ऐसे परेशान थे 'बासिर' जैसे मह-ओ-अंजुम कभी देखे नहीं होते
Basir Sultan Kazmi
2 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Basir Sultan Kazmi.
Similar Moods
More moods that pair well with Basir Sultan Kazmi's ghazal.







