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kitni be-nur thi din bhar nazar-e-parvana raat aai to hui hai sahar-e-parvana shama jalte hi yahan hashr ka manzar hoga phir koi pa na sakega khabar-e-parvana bujh gai shama kati raat gai sab mahfil ab akele hi katega safar-e-parvana raat bhar bazm men hangama hi hangama tha sirf khamoshi hai ab nauha-gar-e-parvana saari makhluq tamashe ke liye aai thi kaun tha sikhne vaala hunar-e-parvana asman surkh hai suraj bhi abhi duuba hai abhi raushan na karo rahguzar-e-parvana na sahi jism magar khaak to udti phirti kaash jalte na kabhi bal-o-par-e-parvana shama kya chiiz hai jalti to kahan tak jalti abhi zinda hai dil-e-be-khatar-e-parvana haae vo husn ki jis ka koi mushtaq nahin haae vo shama ki hai be-khabar-e-parvana jis tarah guzregi ye raat guzar jaegi muddaton yaad rahega asar-e-parvana ek hi jast men tai ho gai manzil 'shahzad' kitne aram se guzra safar-e-parvana kitni be-nur thi din bhar nazar-e-parwana raat aai to hui hai sahar-e-parwana shama jalte hi yahan hashr ka manzar hoga phir koi pa na sakega khabar-e-parwana bujh gai shama kati raat gai sab mahfil ab akele hi katega safar-e-parwana raat bhar bazm mein hangama hi hangama tha sirf khamoshi hai ab nauha-gar-e-parwana sari makhluq tamashe ke liye aai thi kaun tha sikhne wala hunar-e-parwana aasman surkh hai suraj bhi abhi duba hai abhi raushan na karo rahguzar-e-parwana na sahi jism magar khak to udti phirti kash jalte na kabhi baal-o-par-e-parwana shama kya chiz hai jalti to kahan tak jalti abhi zinda hai dil-e-be-khatar-e-parwana hae wo husn ki jis ka koi mushtaq nahin hae wo shama ki hai be-khabar-e-parwana jis tarah guzregi ye raat guzar jaegi muddaton yaad rahega asar-e-parwana ek hi jast mein tai ho gai manzil 'shahzad' kitne aaram se guzra safar-e-parwana

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अपनी आँखों में भर कर ले जाने हैं मुझ को उस के आँसू काम में लाने है देखो हम कोई वहशी नइँ दीवाने हैं तुम सेे बटन खुलवाने नइँ लगवाने हैं हम तुम इक दूजे की सीढ़ी है जानाँ बाक़ी दुनिया तो साँपों के ख़ाने हैं पाक़ीज़ा चीज़ों को पाक़ीज़ा लिखो मत लिक्खो उस की आँखें मय-ख़ाने हैं

Varun Anand

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

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मैं ने जो कुछ भी सोचा हुआ है, मैं वो वक़्त आने पे कर जाऊँगा तुम मुझे ज़हर लगते हो और मैं किसी दिन तुम्हें पी के मर जाऊँगा तू तो बीनाई है मेरी तेरे अलावा मुझे कुछ भी दिखता नहीं मैं ने तुझ को अगर तेरे घर पे उतारा तो मैं कैसे घर जाऊँगा चाहता हूँ तुम्हें और बहुत चाहता हूँ, तुम्हें ख़ुद भी मालूम है हाँ अगर मुझ सेे पूछा किसी ने तो मैं सीधा मुँह पर मुकर जाऊँगा तेरे दिल से तेरे शहर से तेरे घर से तेरी आँख से तेरे दर से तेरी गलियों से तेरे वतन से निकाला हुआ हूँ किधर जाऊँगा

Tehzeeb Hafi

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वो एक पक्षी जो गुंजन कर रहा है वो मुझ में प्रेम सृजन कर रहा है बहुत दिन हो गए है तुम सेे बिछड़े तुम्हें मिलने को अब मन कर रहा है नदी के शांत तट पर बैठ कर मन तेरी यादें विसर्जन कर रहा है

Azhar Iqbal

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चराग़ ख़ुद ही बुझाया बुझा के छोड़ दिया वो ग़ैर था उसे अपना बना के छोड़ दिया हज़ार चेहरे हैं मौजूद आदमी ग़ाएब ये किस ख़राबे में दुनिया ने ला के छोड़ दिया मैं अपनी जाँ में उसे जज़्ब किस तरह करता उसे गले से लगाया लगा के छोड़ दिया मैं जा चुका हूँ मिरे वास्ते उदास न हो मैं वो हूँ तू ने जिसे मुस्कुरा के छोड़ दिया किसी ने ये न बताया कि फ़ासला क्या है हर एक ने मुझे रस्ता दिखा के छोड़ दिया हमारे दिल में है क्या झाँक कर न देख सके ख़ुद अपनी ज़ात से पर्दा उठा के छोड़ दिया वो तेरा रोग भी है और तिरा इलाज भी है उसी को ढूँड जिसे तंग आ के छोड़ दिया वो अंजुमन में मिला भी तो उस ने बात न की कभी कभी कोई जुमला छुपा के छोड़ दिया रखूँ किसी से तवक़्क़ो तो क्या रखूँ 'शहज़ाद' ख़ुदा ने भी तो ज़मीं पर गिरा के छोड़ दिया

Shahzad Ahmad

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अपनी तस्वीर को आँखों से लगाता क्या है इक नज़र मेरी तरफ़ भी तिरा जाता क्या है मेरी रुस्वाई में वो भी हैं बराबर के शरीक मेरे क़िस्से मिरे यारों को सुनाता क्या है पास रह कर भी न पहचान सका तू मुझ को दूर से देख के अब हाथ हिलाता क्या है ज़ेहन के पर्दों पे मंज़िल के हयूले न बना ग़ौर से देखता जा राह में आता क्या है ज़ख़्म-ए-दिल जुर्म नहीं तोड़ भी दे मोहर-ए-सुकूत जो तुझे जानते हैं उन से छुपाता क्या है सफ़र-ए-शौक़ में क्यूँँ काँपते हैं पाँव तिरे आँख रखता है तो फिर आँख चुराता क्या है उम्र भर अपने गरेबाँ से उलझने वाले तू मुझे मेरे ही साए से डराता क्या है चाँदनी देख के चेहरे को छुपाने वाले धूप में बैठ के अब बाल सुखाता क्या है मर गए प्यास के मारे तो उठा अब्र-ए-करम बुझ गई बज़्म तो अब शम्अ' जलाता क्या है मैं तिरा कुछ भी नहीं हूँ मगर इतना तो बता देख कर मुझ को तिरे ज़ेहन में आता क्या है तेरा एहसास ज़रा सा तिरी हस्ती पायाब तो समुंदर की तरह शोर मचाता क्या है तुझ में कस-बल है तो दुनिया को बहा कर ले जा चाय की प्याली में तूफ़ान उठाता क्या है तेरी आवाज़ का जादू न चलेगा उन पर जागने वालों को 'शहज़ाद' जगाता क्या है

Shahzad Ahmad

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