ghazalKuch Alfaaz

कोई इतना प्यारा कैसे हो सकता है फिर सारे का सारा कैसे हो सकता है कैसे किसी की याद हमें ज़िंदा रखती है एक ख़याल सहारा कैसे हो सकता है तुझ से जब मिल कर भी उदासी कम नहीं होती तेरे बग़ैर गुज़ारा कैसे हो सकता है यार हवा से कैसे आग भड़क उठती है लफ़्ज़ कोई अँगारा कैसे हो सकता है कौन ज़माने-भर की ठोकरें खा कर ख़ुश है दर्द किसी को प्यारा कैसे हो सकता है हम भी कैसे एक ही शख़्स के हो कर रह जाएँ वो भी सिर्फ़ हमारा कैसे हो सकता है कैसे हो सकता है जो कुछ भी मैं चाहूँ बोल ना मेरे यारा कैसे हो सकता है

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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किसी लिबास की ख़ुशबू जब उड़ के आती है तेरे बदन की जुदाई बहुत सताती है तेरे गुलाब तरसते हैं तेरी ख़ुशबू को तेरी सफ़ेद चमेली तुझे बुलाती है तेरे बग़ैर मुझे चैन कैसे पड़ता हैं मेरे बगैर तुझे नींद कैसे आती है

Jaun Elia

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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं

Ali Zaryoun

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दर-गुज़र जितना किया है वही काफ़ी है मुझे अब तुझे क़त्ल भी कर दूँ तो मुआ'फ़ी है मुझे मसअला ऐसे कोई हल तो न होगा शायद शे'र कहना ही मिरे ग़म की तलाफ़ी है मुझे दफ़अ'तन इक नए एहसास ने चौंका सा दिया मैं तो समझा था कि हर साँस इज़ाफ़ी है मुझे मैं न कहता था दवाएँ नहीं काम आएँगी जानता था तिरी आवाज़ ही शाफ़ी है मुझे इस से अंदाज़ा लगाओ कि मैं किस हाल में हूँ ग़ैर का ध्यान भी अब वा'दा-ख़िलाफ़ी है मुझे वो कहीं सामने आ जाए तो क्या हो 'जव्वाद' याद ही उस की अगर सीना-शिगाफ़ी है मुझे

Jawwad Sheikh

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नहीं ऐसा भी कि यकसर नहीं रहने वाला दिल में ये शोर बराबर नहीं रहने वाला जिस तरह ख़ामुशी लफ़्ज़ों में ढली जाती है इस में तासीर का उंसुर नहीं रहने वाला अब ये किस शक्ल में ज़ाहिर हो, ख़ुदा ही जाने रंज ऐसा है कि अंदर नहीं रहने वाला मैं उसे छोड़ना चाहूँ भी तो कैसे छोड़ूँ? वो किसी और का हो कर नहीं रहने वाला ग़ौर से देख उन आँखों में नज़र आता है वो समुंदर जो समुंदर नहीं रहने वाला जुर्म वो करने का सोचा है कि बस अब की बार कोई इल्ज़ाम मिरे सर नहीं रहने वाला मैं ने हालाँकि बहुत वक़्त गुज़ारा है यहाँ अब मैं इस शहर में पल भर नहीं रहने वाला मस्लहत लफ़्ज़ पे दो हर्फ़ न भेजूँ? 'जव्वाद' जब मिरे साथ मुक़द्दर नहीं रहने वाला

Jawwad Sheikh

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मेरा ख़ज़ाना ज़माने के हाथ जा न लगे तुझे किसी की किसी को तेरी हवा न लगे मैं एक जिस्म को चखना तो चाहता हूँ मगर कुछ इस तरह कि मेरे मुँह को ज़ाएका न लगे हमें लगा सो लगा ख़ुद-अज़िय्यती का नशा दुआ करो कि तुम्हें बद-दुआ दुआ न लगे दुआ करो कि किसी का न दिल लगे तुम सेे लगे तो और किसी से लगा हुआ न लगे हसद किया हो तेरे रिज़्क़ से कभी मैं ने तो मुझ को अपनी कमाई हुई ग़िज़ा न लगे हमें ही इश्क़ की तशहीर चाहिए वरना पता न लगने दिया जाए तो पता न लगे पड़ा रहा मैं किसी और ही बखेड़े में बहुत से क़ीमती जज़्बे किसी दिशा न लगे बना रहा हूँ तसव्वुर में एक मुद्दत से एक ऐसा शहर जिसे कोई रास्ता न लगे हमें तो उस सेे मुहब्बत है और बेहद है अगर उसे नहीं लगता तो क्या हुआ न लगे किसे ख़ुशी नहीं होती सराहे जाने की मगर वो दोस्त ही क्या है जो आइना न लगे कभी कभार जो रखने लगे ज़बाँ का भरम वो अब भी क्या नहीं लगता मजीद क्या न लगे यही कहूँगा कि 'जव्वाद' बच बचा के ज़रा अगर किसी का रवैया बरादरा न लगे

Jawwad Sheikh

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मैं चाहता हूँ कि दिल में तिरा ख़याल न हो अजब नहीं कि मिरी ज़िंदगी वबाल न हो मैं चाहता हूँ तू यक-दम ही छोड़ जाए मुझे ये हर घड़ी तिरे जाने का एहतिमाल न हो मैं चाहता हूँ मोहब्बत पे अब की बार आए ज़वाल ऐसा कि जिस को कभी ज़वाल न हो मैं चाहता हूँ मोहब्बत सिरे से मिट जाए मैं चाहता हूँ उसे सोचना मुहाल न हो मैं चाहता हूँ मोहब्बत मुझे फ़ना कर दे फ़ना भी ऐसा कि जिस की कोई मिसाल न हो मैं चाहता हूँ मोहब्बत मिरा वो हाल करे कि ख़्वाब में भी दोबारा कभी मजाल न हो मैं चाहता हूँ कि इतना ही रब्त रह जाए वो याद आए मगर भूलना मुहाल न हो मैं चाहता हूँ मिरी आँखें नोच ली जाएँ तिरा ख़याल किसी तौर पाएमाल न हो मैं चाहता हूँ कि मैं ज़ख़्म ज़ख़्म हो जाऊँ और इस तरह कि कभी ख़ौफ़-ए-इंदिमाल न हो मिरी मिसाल हो सब की निगाह में 'जव्वाद' मैं चाहता हूँ किसी और का ये हाल न हो

Jawwad Sheikh

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ग़म-ए-जहाँ से मैं उकता गया तो क्या होगा ख़ुद अपनी फ़िक्र में घुलने लगा तो क्या होगा ये ना-गुज़ीर है उम्मीद की नुमू के लिए गुज़रता वक़्त कहीं थम गया तो क्या होगा यही बहुत है कि हम को सुकूँ से जीने दे किसी के हाथों हमारा भला तो क्या होगा ये लोग मेरी ख़मोशी पे मुझ से नालाँ हैं कोई ये पूछे मैं गोया हुआ तो क्या होगा मैं इस लिए भी बहुत मुख़्तलिफ़ हूँ लोगों से वो सोचते हैं कि ऐसा हुआ तो क्या होगा जुनूँ की राह अजब है कि पाँव धरने को ज़मीन तक भी नहीं नक़्श-ए-पा तो क्या होगा ये एक ख़ौफ़ भी मेरी ख़ुशी में शामिल है तिरा भी ध्यान अगर हट गया तो क्या होगा जो हो रहा है वो होता चला गया तो फिर? जो होने को है वही हो गया तो क्या होगा

Jawwad Sheikh

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