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कुछ ऐसे दो-जहाँ से राब्ता रक्खा गया है कि इन ख़्वाबीदा आँखों को खुला रक्खा गया है मिरी आँखों में अब तू रेत पाएगा न पानी यहाँ दरिया न सहरा बस ख़ला रक्खा गया है पस-ए-पर्दा गले मिल कर वो शायद रो पड़ेंगे जिन्हें पूरी कहानी में जुदा रक्खा गया है

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Waseem Barelvi

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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं

Ali Zaryoun

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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झूठों ने झूठों से कहा है सच बोलो सरकारी एलान हुआ है सच बोलो घर के अंदर तो झूठों की एक मंडी है दरवाज़े पर लिखा हुआ है सच बोलो गुलदस्ते पर यकजहती लिख रक्खा है गुलदस्ते के अंदर क्या है सच बोलो गंगा मइया डूबने वाले अपने थे नाव में किस ने छेद किया है सच बोलो

Rahat Indori

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लहू में घुल घुल के बह रहे थे रगों के अंदर हम अपनी मिट्टी में कुछ रवानी बचा रहे थे उसे ख़बर भी नहीं हम उस शब ख़ामोश रह कर बची हुई है जो इक कहानी बचा रहे थे ये सोच किस दर्जा तिश्नगी से मरे थे हम लोग कि पानी पी नहीं रहे थे पानी बचा रहे थे

Pallav Mishra

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तुम्हारी दुनिया के बाहर अंदर भटक रहा हूँ मैं बा'द-ए-तर्क-ए-जहाँ यही पर भटक रहा हूँ मैं तुझ से मिलने समय से पहले पहुँच गया था सो तेरे घर के क़रीब आ के भटक रहा हूँ मैं एक ख़ाना-ब-दोश हूँ जिस का घर है दुनिया सो अपने काँधों पे ले के ये घर भटक रहा हूँ मैं हर क़दम पर सँभल सँभल कर भटकने वाला भटकने वालों से काफ़ी बेहतर भटक रहा हूँ

Pallav Mishra

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वो बार-ए-फ़र्ज़-ए-तकल्लुफ़ मुझी को धोना पड़ा उसे रुलाने कि ख़ातिर मुझे भी रोना पड़ा वो एक हुस्न था जिस की थी सिर्फ़ ख़्वाब में बूद उसे जगाने की चाहत में मुझ को सोना पड़ा मैं देखता हूँ ये छींटे लगें गे किस के हाथ मुझे जो आज उदासी से हाथ धोना पड़ा ये क्या हुआ कि तिरी धुन में जिन से बिछड़े थे उन्हीं के सामने तुझ से बिछड़ के रोना पड़ा मैं अपनी मर्ज़ी से इस दुनिया में हुआ कब था मआ'नी ये हैं कि मुझ को जहाँ में होना पड़ा

Pallav Mishra

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तुम्हें आँसू बहाने को भी मिल जाएँ कई कंधे मगर मुझ को अज़िय्यत में परेशाँ कौन देखेगा तुम्हीं जो उस की ख़ातिर जागते बैठे रहे शब भर जो अब सो जाओ तो सुब्ह-ए-दरख़्शाँ कौन देखेगा मैं भागा तो चला आऊँ तुम्हारी इक निदा सुन कर सर-ए-वक़्त-ए-जुनूँ इनकार-ए-दरबाँ कौन देखेगा मैं तेरे हिज्र में बैठा हुआ कुछ फूल गिन लूँगा मियान-ए-बे-दिली रंग-ए-गुलिस्ताँ कौन देखेगा तुम्हें क्यूँँ फ़िक्र रहती है मिरे पिंदार की जानाँ तुम्हारे रुख़ के आगे मुझ को उर्यां कौन देखेगा

Pallav Mishra

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दुनिया-जहाँ के जाम छलक जाएँ रेत पर क्या कीजिए कि होंट बहक जाएँ रेत पर पानी की चाह भी हो समुंदर का ख़ौफ़ भी लहरों के साथ साथ हुमक जाएँ रेत पर गो लाख सीपियों में समुंदर की क़ैद हों मोती वही जो फिर भी झलक जाएँ रेत पर कासा हर इक सदफ़ का लुटा जाए अशरफ़ी ला'ल-ओ-जवाहरात खनक जाएँ रेत पर टुक आँख तू भी खोल कि दरिया के लब खुलें सातों दिशा के दाँत चमक जाएँ रेत पर छिन जाएँ रस के फ़र्श से धरती के ग़ार में और आसमाँ की छत से टपक जाएँ रेत पर रखिए सफ़र में सब की तन-आसानियों की ख़ैर ऐसा न हो कि घोड़े बिदक जाएँ रेत पर सरगोशियों की मौज कहाँ ले के जाएगी हम कुछ अगर जुनून में बक जाएँ रेत पर सूरज की आसमाँ पे सितारों को ढाँप ले ज़र्रों से आफ़्ताब दमक जाएँ रेत पर दिल की धड़कती ख़ाक से साहिल बनाइए पानी के पाँव आज थिरक जाएँ रेत पर

Pallav Mishra

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