ghazalKuch Alfaaz

वो बार-ए-फ़र्ज़-ए-तकल्लुफ़ मुझी को धोना पड़ा उसे रुलाने कि ख़ातिर मुझे भी रोना पड़ा वो एक हुस्न था जिस की थी सिर्फ़ ख़्वाब में बूद उसे जगाने की चाहत में मुझ को सोना पड़ा मैं देखता हूँ ये छींटे लगें गे किस के हाथ मुझे जो आज उदासी से हाथ धोना पड़ा ये क्या हुआ कि तिरी धुन में जिन से बिछड़े थे उन्हीं के सामने तुझ से बिछड़ के रोना पड़ा मैं अपनी मर्ज़ी से इस दुनिया में हुआ कब था मआ'नी ये हैं कि मुझ को जहाँ में होना पड़ा

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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा

Hasan Abbasi

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सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा इतना मत चाहो उसे वो बे-वफ़ा हो जाएगा हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा कितनी सच्चाई से मुझ से ज़िंदगी ने कह दिया तू नहीं मेरा तो कोई दूसरा हो जाएगा मैं ख़ुदा का नाम ले कर पी रहा हूँ दोस्तो ज़हर भी इस में अगर होगा दवा हो जाएगा सब उसी के हैं हवा ख़ुशबू ज़मीन ओ आसमाँ मैं जहाँ भी जाऊँगा उस को पता हो जाएगा

Bashir Badr

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झुक के चलता हूँ कि क़द उस के बराबर न लगे दूसरा ये कि उसे राह में ठोकर न लगे ये तेरे साथ तअ'ल्लुक़ का बड़ा फ़ाइदा है आदमी हो भी तो औक़ात से बाहर न लगे नीम तारीक सा माहौल है दरकार मुझे ऐसा माहौल जहाँ आँख लगे डर न लगे माँओं ने चूमना होते हैं बुरीदा सर भी उस से कहना कि कोई ज़ख़्म जबीं पर न लगे ये तलबगार निगाहों के तक़ाज़े हर सू कोई तो ऐसी जगह हो जो मुझे घर न लगे ये जो आईना है देखूँ तो ख़ला दिखता है इस जगह कुछ भी न लगवाऊँ तो बेहतर न लगे तुम ने छोड़ा तो किसी और से टकराऊँगा मैं कैसे मुमकिन है कि अंधे का कहीं सर न लगे

Umair Najmi

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ये अलग बात मुक़द्दर नहीं बदला अपना एक ही दर पे रहे दर नहीं बदला अपना इश्क़ का खेल है शतरंज नहीं है साहिब मात खाई है मगर घर नहीं बदला अपना जाने किस वक़्त अचानक उसे याद आ जाए मैं ने ये सोच के नंबर नहीं बदला अपना

Aadil Rasheed

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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लहू में घुल घुल के बह रहे थे रगों के अंदर हम अपनी मिट्टी में कुछ रवानी बचा रहे थे उसे ख़बर भी नहीं हम उस शब ख़ामोश रह कर बची हुई है जो इक कहानी बचा रहे थे ये सोच किस दर्जा तिश्नगी से मरे थे हम लोग कि पानी पी नहीं रहे थे पानी बचा रहे थे

Pallav Mishra

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दुनिया-जहाँ के जाम छलक जाएँ रेत पर क्या कीजिए कि होंट बहक जाएँ रेत पर पानी की चाह भी हो समुंदर का ख़ौफ़ भी लहरों के साथ साथ हुमक जाएँ रेत पर गो लाख सीपियों में समुंदर की क़ैद हों मोती वही जो फिर भी झलक जाएँ रेत पर कासा हर इक सदफ़ का लुटा जाए अशरफ़ी ला'ल-ओ-जवाहरात खनक जाएँ रेत पर टुक आँख तू भी खोल कि दरिया के लब खुलें सातों दिशा के दाँत चमक जाएँ रेत पर छिन जाएँ रस के फ़र्श से धरती के ग़ार में और आसमाँ की छत से टपक जाएँ रेत पर रखिए सफ़र में सब की तन-आसानियों की ख़ैर ऐसा न हो कि घोड़े बिदक जाएँ रेत पर सरगोशियों की मौज कहाँ ले के जाएगी हम कुछ अगर जुनून में बक जाएँ रेत पर सूरज की आसमाँ पे सितारों को ढाँप ले ज़र्रों से आफ़्ताब दमक जाएँ रेत पर दिल की धड़कती ख़ाक से साहिल बनाइए पानी के पाँव आज थिरक जाएँ रेत पर

Pallav Mishra

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तुम्हें आँसू बहाने को भी मिल जाएँ कई कंधे मगर मुझ को अज़िय्यत में परेशाँ कौन देखेगा तुम्हीं जो उस की ख़ातिर जागते बैठे रहे शब भर जो अब सो जाओ तो सुब्ह-ए-दरख़्शाँ कौन देखेगा मैं भागा तो चला आऊँ तुम्हारी इक निदा सुन कर सर-ए-वक़्त-ए-जुनूँ इनकार-ए-दरबाँ कौन देखेगा मैं तेरे हिज्र में बैठा हुआ कुछ फूल गिन लूँगा मियान-ए-बे-दिली रंग-ए-गुलिस्ताँ कौन देखेगा तुम्हें क्यूँँ फ़िक्र रहती है मिरे पिंदार की जानाँ तुम्हारे रुख़ के आगे मुझ को उर्यां कौन देखेगा

Pallav Mishra

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तुम्हारी दुनिया के बाहर अंदर भटक रहा हूँ मैं बाद-ए-तर्क-ए-जहाँ यही पर भटक रहा हूँ मैं तुझ से मिलने समय से पहले पहुँच गया था सो तेरे घर के क़रीब आ के भटक रहा हूँ मैं एक ख़ाना-ब-दोश हूँ जिस का घर है दुनिया सो अपने काँधों पे ले के ये घर भटक रहा हूँ मैं हर क़दम पर सँभल सँभल कर भटकने वाला भटकने वालों से काफ़ी बेहतर भटक रहा हूँ

Pallav Mishra

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तुम्हारी दुनिया के बाहर अंदर भटक रहा हूँ मैं बा'द-ए-तर्क-ए-जहाँ यही पर भटक रहा हूँ मैं तुझ से मिलने समय से पहले पहुँच गया था सो तेरे घर के क़रीब आ के भटक रहा हूँ मैं एक ख़ाना-ब-दोश हूँ जिस का घर है दुनिया सो अपने काँधों पे ले के ये घर भटक रहा हूँ मैं हर क़दम पर सँभल सँभल कर भटकने वाला भटकने वालों से काफ़ी बेहतर भटक रहा हूँ

Pallav Mishra

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