तुम्हारी दुनिया के बाहर अंदर भटक रहा हूँ मैं बाद-ए-तर्क-ए-जहाँ यही पर भटक रहा हूँ मैं तुझ से मिलने समय से पहले पहुँच गया था सो तेरे घर के क़रीब आ के भटक रहा हूँ मैं एक ख़ाना-ब-दोश हूँ जिस का घर है दुनिया सो अपने काँधों पे ले के ये घर भटक रहा हूँ मैं हर क़दम पर सँभल सँभल कर भटकने वाला भटकने वालों से काफ़ी बेहतर भटक रहा हूँ
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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
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उस के हाथों में जो ख़ंजर है ज़्यादा तेज है और फिर बचपन से ही उस का निशाना तेज है जब कभी उस पार जाने का ख़याल आता मुझे कोई आहिस्ता से कहता था की दरिया तेज है आज मिलना था बिछड़ जाने की निय्यत से हमें आज भी वो देर से पहुँचा है कितना तेज है अपना सब कुछ हार के लौट आए हो न मेरे पास मैं तुम्हें कहता भी रहता की दुनिया तेज है आज उस के गाल चू में हैं तो अंदाज़ा हुआ चाय अच्छी है मगर थोडा सा मीठा तेज है
Tehzeeb Hafi
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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर
Anwar Shaoor
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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है
Waseem Barelvi
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दुनिया-जहाँ के जाम छलक जाएँ रेत पर क्या कीजिए कि होंट बहक जाएँ रेत पर पानी की चाह भी हो समुंदर का ख़ौफ़ भी लहरों के साथ साथ हुमक जाएँ रेत पर गो लाख सीपियों में समुंदर की क़ैद हों मोती वही जो फिर भी झलक जाएँ रेत पर कासा हर इक सदफ़ का लुटा जाए अशरफ़ी ला'ल-ओ-जवाहरात खनक जाएँ रेत पर टुक आँख तू भी खोल कि दरिया के लब खुलें सातों दिशा के दाँत चमक जाएँ रेत पर छिन जाएँ रस के फ़र्श से धरती के ग़ार में और आसमाँ की छत से टपक जाएँ रेत पर रखिए सफ़र में सब की तन-आसानियों की ख़ैर ऐसा न हो कि घोड़े बिदक जाएँ रेत पर सरगोशियों की मौज कहाँ ले के जाएगी हम कुछ अगर जुनून में बक जाएँ रेत पर सूरज की आसमाँ पे सितारों को ढाँप ले ज़र्रों से आफ़्ताब दमक जाएँ रेत पर दिल की धड़कती ख़ाक से साहिल बनाइए पानी के पाँव आज थिरक जाएँ रेत पर
Pallav Mishra
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लहू में घुल घुल के बह रहे थे रगों के अंदर हम अपनी मिट्टी में कुछ रवानी बचा रहे थे उसे ख़बर भी नहीं हम उस शब ख़ामोश रह कर बची हुई है जो इक कहानी बचा रहे थे ये सोच किस दर्जा तिश्नगी से मरे थे हम लोग कि पानी पी नहीं रहे थे पानी बचा रहे थे
Pallav Mishra
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वो बार-ए-फ़र्ज़-ए-तकल्लुफ़ मुझी को धोना पड़ा उसे रुलाने कि ख़ातिर मुझे भी रोना पड़ा वो एक हुस्न था जिस की थी सिर्फ़ ख़्वाब में बूद उसे जगाने की चाहत में मुझ को सोना पड़ा मैं देखता हूँ ये छींटे लगें गे किस के हाथ मुझे जो आज उदासी से हाथ धोना पड़ा ये क्या हुआ कि तिरी धुन में जिन से बिछड़े थे उन्हीं के सामने तुझ से बिछड़ के रोना पड़ा मैं अपनी मर्ज़ी से इस दुनिया में हुआ कब था मआ'नी ये हैं कि मुझ को जहाँ में होना पड़ा
Pallav Mishra
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तुम्हें आँसू बहाने को भी मिल जाएँ कई कंधे मगर मुझ को अज़िय्यत में परेशाँ कौन देखेगा तुम्हीं जो उस की ख़ातिर जागते बैठे रहे शब भर जो अब सो जाओ तो सुब्ह-ए-दरख़्शाँ कौन देखेगा मैं भागा तो चला आऊँ तुम्हारी इक निदा सुन कर सर-ए-वक़्त-ए-जुनूँ इनकार-ए-दरबाँ कौन देखेगा मैं तेरे हिज्र में बैठा हुआ कुछ फूल गिन लूँगा मियान-ए-बे-दिली रंग-ए-गुलिस्ताँ कौन देखेगा तुम्हें क्यूँँ फ़िक्र रहती है मिरे पिंदार की जानाँ तुम्हारे रुख़ के आगे मुझ को उर्यां कौन देखेगा
Pallav Mishra
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तुम्हारी दुनिया के बाहर अंदर भटक रहा हूँ मैं बा'द-ए-तर्क-ए-जहाँ यही पर भटक रहा हूँ मैं तुझ से मिलने समय से पहले पहुँच गया था सो तेरे घर के क़रीब आ के भटक रहा हूँ मैं एक ख़ाना-ब-दोश हूँ जिस का घर है दुनिया सो अपने काँधों पे ले के ये घर भटक रहा हूँ मैं हर क़दम पर सँभल सँभल कर भटकने वाला भटकने वालों से काफ़ी बेहतर भटक रहा हूँ
Pallav Mishra
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