दुनिया-जहाँ के जाम छलक जाएँ रेत पर क्या कीजिए कि होंट बहक जाएँ रेत पर पानी की चाह भी हो समुंदर का ख़ौफ़ भी लहरों के साथ साथ हुमक जाएँ रेत पर गो लाख सीपियों में समुंदर की क़ैद हों मोती वही जो फिर भी झलक जाएँ रेत पर कासा हर इक सदफ़ का लुटा जाए अशरफ़ी ला'ल-ओ-जवाहरात खनक जाएँ रेत पर टुक आँख तू भी खोल कि दरिया के लब खुलें सातों दिशा के दाँत चमक जाएँ रेत पर छिन जाएँ रस के फ़र्श से धरती के ग़ार में और आसमाँ की छत से टपक जाएँ रेत पर रखिए सफ़र में सब की तन-आसानियों की ख़ैर ऐसा न हो कि घोड़े बिदक जाएँ रेत पर सरगोशियों की मौज कहाँ ले के जाएगी हम कुछ अगर जुनून में बक जाएँ रेत पर सूरज की आसमाँ पे सितारों को ढाँप ले ज़र्रों से आफ़्ताब दमक जाएँ रेत पर दिल की धड़कती ख़ाक से साहिल बनाइए पानी के पाँव आज थिरक जाएँ रेत पर
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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
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तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं तुझे हर बहाने से हम देखते हैं हमारी तरफ़ अब वो कम देखते हैं वो नज़रें नहीं जिन को हम देखते हैं ज़माने के क्या क्या सितम देखते हैं हमीं जानते हैं जो हम देखते हैं
Dagh Dehlvi
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लहू में घुल घुल के बह रहे थे रगों के अंदर हम अपनी मिट्टी में कुछ रवानी बचा रहे थे उसे ख़बर भी नहीं हम उस शब ख़ामोश रह कर बची हुई है जो इक कहानी बचा रहे थे ये सोच किस दर्जा तिश्नगी से मरे थे हम लोग कि पानी पी नहीं रहे थे पानी बचा रहे थे
Pallav Mishra
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तुम्हारी दुनिया के बाहर अंदर भटक रहा हूँ मैं बा'द-ए-तर्क-ए-जहाँ यही पर भटक रहा हूँ मैं तुझ से मिलने समय से पहले पहुँच गया था सो तेरे घर के क़रीब आ के भटक रहा हूँ मैं एक ख़ाना-ब-दोश हूँ जिस का घर है दुनिया सो अपने काँधों पे ले के ये घर भटक रहा हूँ मैं हर क़दम पर सँभल सँभल कर भटकने वाला भटकने वालों से काफ़ी बेहतर भटक रहा हूँ
Pallav Mishra
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तुम्हें आँसू बहाने को भी मिल जाएँ कई कंधे मगर मुझ को अज़िय्यत में परेशाँ कौन देखेगा तुम्हीं जो उस की ख़ातिर जागते बैठे रहे शब भर जो अब सो जाओ तो सुब्ह-ए-दरख़्शाँ कौन देखेगा मैं भागा तो चला आऊँ तुम्हारी इक निदा सुन कर सर-ए-वक़्त-ए-जुनूँ इनकार-ए-दरबाँ कौन देखेगा मैं तेरे हिज्र में बैठा हुआ कुछ फूल गिन लूँगा मियान-ए-बे-दिली रंग-ए-गुलिस्ताँ कौन देखेगा तुम्हें क्यूँँ फ़िक्र रहती है मिरे पिंदार की जानाँ तुम्हारे रुख़ के आगे मुझ को उर्यां कौन देखेगा
Pallav Mishra
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कुछ ऐसे दो-जहाँ से राब्ता रक्खा गया है कि इन ख़्वाबीदा आँखों को खुला रक्खा गया है मिरी आँखों में अब तू रेत पाएगा न पानी यहाँ दरिया न सहरा बस ख़ला रक्खा गया है पस-ए-पर्दा गले मिल कर वो शायद रो पड़ेंगे जिन्हें पूरी कहानी में जुदा रक्खा गया है
Pallav Mishra
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तुम्हारी दुनिया के बाहर अंदर भटक रहा हूँ मैं बाद-ए-तर्क-ए-जहाँ यही पर भटक रहा हूँ मैं तुझ से मिलने समय से पहले पहुँच गया था सो तेरे घर के क़रीब आ के भटक रहा हूँ मैं एक ख़ाना-ब-दोश हूँ जिस का घर है दुनिया सो अपने काँधों पे ले के ये घर भटक रहा हूँ मैं हर क़दम पर सँभल सँभल कर भटकने वाला भटकने वालों से काफ़ी बेहतर भटक रहा हूँ
Pallav Mishra
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