ghazalKuch Alfaaz

कुछ लोग ख़यालों से चले जाएँ तो सोएँ बीते हुए दिन रात न याद आएँ तो सोएँ चेहरे जो कभी हम को दिखाई नहीं देंगे आ आ के तसव्वुर में न तड़पाएँ तो सोएँ बरसात की रुत के वो तरब-रेज़ मनाज़िर सीने में न इक आग सी भड़काएँ तो सोएँ सुब्हों के मुक़द्दर को जगाते हुए मुखड़े आँचल जो निगाहों में न लहराएँ तो सोएँ महसूस ये होता है अभी जाग रहे हैं लाहौर के सब यार भी सो जाएँ तो सोएँ

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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अगर तू बे-वफ़ा है ध्यान रखना मुझे सब कुछ पता है ध्यान रखना बिछड़ते वक़्त हम ने कह दिया था हमारा दिल दुखा है ध्यान रखना ख़ुदा जिस की मोहब्बत में बनी हो वो कइयों का ख़ुदा है ध्यान रखना जिसे तुम दोस्त केवल जानती हो वो तुम को चाहता है ध्यान रखना

Anand Raj Singh

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Waseem Barelvi

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वो मुँह लगाता है जब कोई काम होता है जो उस का होता है समझो ग़ुलाम होता है किसी का हो के दुबारा न आना मेरी तरफ़ मोहब्बतों में हलाला हराम होता है इसे भी गिनते हैं हम लोग अहल-ए-ख़ाना में हमारे याँ तो शजर का भी नाम होता है तुझ ऐसे शख़्स के होते हैं ख़ास दोस्त बहुत तुझ ऐसा शख़्स बहुत जल्द आम होता है कभी लगी है तुम्हें कोई शाम आख़िरी शाम हमारे साथ ये हर एक शाम होता है

Umair Najmi

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हम ने दिल से तुझे सदा माना तू बड़ा था तुझे बड़ा माना 'मीर'-ओ-'ग़ालिब' के बा'द 'अनीस' के बा'द तुझ को माना बड़ा बजा माना तू कि दीवाना-ए-सदाक़त था तू ने बंदे को कब ख़ुदा माना तुझ को पर्वा न थी ज़माने की तू ने दिल ही का हर कहा माना तुझ को ख़ुद पे था ए'तिमाद इतना ख़ुद ही को तो न रहनुमा माना की न शब की कभी पज़ीराई सुब्ह को लाएक़-ए-सना माना हँस दिया सत्ह-ए-ज़ेहन-ए-आलम पर जब किसी बात का बुरा माना यूँँ तो शाइ'र थे और भी ऐ 'जोश' हम ने तुझ सा न दूसरा माना

Habib Jalib

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फ़ैज़' और 'फ़ैज़' का ग़म भूलने वाला है कहीं मौत ये तेरा सितम भूलने वाला है कहीं हम से जिस वक़्त ने वो शाह-ए-सुख़न छीन लिया हम को वो वक़्त-ए-अलम भूलने वाला है कहीं तिरे अश्क और भी चमकाएँगी यादें उस की हम को वो दीदा-ए-नम भूलने वाला है कहीं कभी ज़िंदाँ में कभी दूर वतन से ऐ दोस्त जो किया उस ने रक़म भूलने वाला है कहीं आख़िरी बार उसे देख न पाए 'जालिब' ये मुक़द्दर का सितम भूलने वाला है कहीं

Habib Jalib

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आग है फैली हुई काली घटाओं की जगह बद-दुआएँ हैं लबों पर अब दु'आओं की जगह इंतिख़ाब-ए-अहल-ए-गुलशन पर बहुत रोता है दिल देख कर ज़ाग़-ओ-ज़ग़्न को ख़ुश-नवाओं की जगह कुछ भी होता पर न होते पारा-पारा जिस्म-ओ-जाँ राहज़न होते अगर उन रहनुमाओं की जगह लुट गई इस दौर में अहल-ए-क़लम की आबरू बिक रहे हैं अब सहाफ़ी बेसवाओं की जगह कुछ तो आता हम को भी जाँ से गुज़रने का मज़ा ग़ैर होते काश 'जालिब' आश्नाओं की जगह

Habib Jalib

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कहीं आह बन के लब पर तिरा नाम आ न जाए तुझे बे-वफ़ा कहूँ मैं वो मक़ाम आ न जाए ज़रा ज़ुल्फ़ को सँभालो मिरा दिल धड़क रहा है कोई और ताइर-ए-दिल तह-ए-दाम आ न जाए जिसे सुन के टूट जाए मिरा आरज़ू भरा दिल तिरी अंजुमन से मुझ को वो पयाम आ न जाए वो जो मंज़िलों पे ला कर किसी हम-सफ़र को लूटें उन्हीं रहज़नों में तेरा कहीं नाम आ न जाए इसी फ़िक्र में हैं ग़लताँ ये निज़ाम-ए-ज़र के बंदे जो तमाम-ए-ज़िंदगी है वो निज़ाम आ न जाए ये मह ओ नुजूम हँस लें मिरे आँसुओं पे 'जालिब' मिरा माहताब जब तक लब-ए-बाम आ न जाए

Habib Jalib

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अपनों ने वो रंग दिए हैं, बेगाने याद आते हैं देख के इस बस्ती की हालत वीराने याद आते हैं इस नगरी में क़दम- क़दम पे सर को झुकाना पड़ता है इस नगरी में क़दम-क़दम पर बुतख़ाने याद आते हैं आँखें पुरनम हो जाती हैं ग़ुरबत के सेहराओं में जब उस रिमझिम की वादी के अफ़साने याद आते हैं ऐसे-ऐसे दर्द मिले हैं नए दयारों में हम को बिछड़े हुए कुछ लोग, पुराने याराने याद आते हैं जिन के कारन आज हमारे हाल पे दुनिया हंसती है कितने ज़ालिम चेहरे जाने-पहचाने याद आते हैं यूँ न लुटी थी गलियों-गलियों दौलत अपने अश्क़ों की रोते हैं तो हम को अपने ग़मख़ाने याद आते हैं कोई तो परचम ले कर निकले अपने गरेबां का जालिब चारों जानिब सन्नाटा है, दीवाने याद आते हैं

Habib Jalib

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