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मैं रोज़गार-ए-मुहब्बत में कम पगार पे था और इतनी कम कि ग़ज़ल का गुज़र उधार पे था हमारा इश्क़ भी याराने की कगार पे था जब उस ने "प्यार" कहा था तो ज़ोर "यार" पे था किसे ख़बर थी कि दरवाज़ा भी खुला हुआ है सभी का ध्यान तो दीवार की दरार पे था मुझे ख़रीदने दो तीन लोग आए थे और उन में से भी मेरा क़र्ज़ तीन-चार पे था मैं जिस गुलाब की ख़ातिर था ख़ार की ज़द में उसे भी मुझ पे भरोसा नहीं था ख़ार पे था बता रहा था अँधेरा बहुत है दुनिया में वो इक चराग़ जो मंसूर के मज़ार पे था हुआ था क़त्ल कल उस के किसी दिवाने का ख़ुदा का शुक्र! कि इल्ज़ाम ख़ाकसार पे था

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो

Jaun Elia

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पुकारता हूँ मैं अल-अमान अल-अमान अल्लाह बचा ले मेरे यक़ीनुल्लाह की जान अल्लाह वो जिन को तू ने अता किया है जहान अल्लाह बना रहे हैं तिरे लिए ही मकान अल्लाह वो याद आता है सिर्फ़ यारों के पूछने पर तू याद आता है सिर्फ़ वक़्त-ए-अज़ान अल्लाह तिरे तग़ाफ़ुल की ही बदौलत हूँ आज जो हूँ मुझे कोई जन्म-जात काफ़िर न जान अल्लाह मैं जब वो जन्नत भी छोड़ आया तो दुनिया क्या है ले मैं चला तू सँभाल अपना जहान अल्लाह

Charagh Sharma

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थक जाता हूँ रोज़ के आने जाने में मेरा बिस्तर लगवा दो मय-ख़ाने में "उस के हाथ में फूल है" मत कहिए, कहिए उस का हाथ है फूल को फूल बनाने में मैं कब से मौक़े की ताक में हूँ ,उस को जाने मन कह दूँ जाने अनजाने में आँखों में मत रोक, मुझे जाना है उधर ये रस्ता खुलता है जिस तहख़ाने में

Charagh Sharma

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अब ये गुल गुलनार कब है ख़ार है बे-कार है आप ने जब कह दिया बे-कार है बे-कार है छोड़ कर मतला ग़ज़ल दमदार है बे-कार है जब सिपह-सालार ही बीमार है बे-कार है इक सवाल ऐसा है मेरे पास जिस के सामने ये जो तेरी शिद्दत-ए-इंकार है बे-कार है तुझ को भी है चाँद का दीदार करने की तलब इक दिए को रौशनी दरकार है बे-कार है मय-कदे के मुख़्तलिफ़ आदाब होते हैं 'चराग़' जो यहाँ पर साहब-ए-किरदार है बे-कार है

Charagh Sharma

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वो सिर्फ़ क़िस्से कहानियों के मुआ'मले थे चराग़ रख दे चराग़ घिसने से कोई जिन-विन नहीं निकलते चराग़ रख दे हमारी मा'सूमियत तो देखो रख आए दिल हम हुज़ूर-ए-जानाँ कि जैसे कोई ख़ुदा का बंदा हवा के आगे चराग़ रख दे किसी के साए को क़ैद करने का इक तरीक़ा बता रहा हूँ इक उस के आगे चराग़ रख दे इक उस के पीछे चराग़ रख दे तुझे बहुत शौक़ था मोहब्बत की गर्म लपटों से खेलने का ले जल गई न हथेली अब ख़ुश कहा था मैं ने चराग़ रख दे चराग़ ले के भी ढूँडने से चराग़ जैसा नहीं मिलेगा सो रखनी है तो चराग़ से रख नहीं तो प्यारे चराग़ रख दे चराग़ रौशन ज़रूर कर तो पर इस से पहले ख़ुदा की ख़ातिर यहाँ पे फैला है जो अँधेरा समेट ज़ेर-ए-चराग़ रख दे मैं दिल की बातों में आ गया और उठा के ले आया उस की पायल दिमाग़ देता रहा सदाएँ चराग़ रख दे चराग़ रख दे

Charagh Sharma

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कोई ख़त वत नहीं फाड़ा कोई तोहफ़ा नहीं तोड़ा कि वो देखे तो ख़ुद सोचे कि दिल तोड़ा नहीं तोड़ा यहाँ मैं ने गले में बाँध ली रस्सी और इक वो है कि अब तक सिर्फ़ दस्तक दी है दरवाज़ा नहीं तोड़ा भरोसा था भरोसा तोड़ देगा वो सो उस ने भी भरोसा तोड़ के वो जो भरोसा था नहीं तोड़ा बनाना आ गया जब काँच की किरचों से कोहेनूर ग़ज़ल कहने लगे ग़ुस्से में गुलदस्ता नहीं तोड़ा

Charagh Sharma

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