पुकारता हूँ मैं अल-अमान अल-अमान अल्लाह बचा ले मेरे यक़ीनुल्लाह की जान अल्लाह वो जिन को तू ने अता किया है जहान अल्लाह बना रहे हैं तिरे लिए ही मकान अल्लाह वो याद आता है सिर्फ़ यारों के पूछने पर तू याद आता है सिर्फ़ वक़्त-ए-अज़ान अल्लाह तिरे तग़ाफ़ुल की ही बदौलत हूँ आज जो हूँ मुझे कोई जन्म-जात काफ़िर न जान अल्लाह मैं जब वो जन्नत भी छोड़ आया तो दुनिया क्या है ले मैं चला तू सँभाल अपना जहान अल्लाह
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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ
Ali Zaryoun
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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मिरी उदासी मिरे दरमियान बंद करो कोई सलीक़े से ये इत्र-दान बंद करो पढ़ा रहा हूँ मैं बच्चों को कर्बला का निसाब तुम अपनी तिश्ना-लबी का बखान बंद करो ज़रा समझने की कोशिश करो मिरे अश्कों वो आज ख़ुश है तुम अपनी ज़बान बंद करो मैं एक शर्त पे राज़ी हूँ क़ैद होने को इसी क़फ़स में मिरा आसमान बंद करो मुझे अकेले में करनी हैं ख़ुद से कुछ बातें ये मेरा हुक्म है दीवारो कान बंद करो ग़ज़ल में लाने से ग़म और बढ़ गया है 'चराग़' शटर गिराओ सुख़न की दुकान बंद करो
Charagh Sharma
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अब ये गुल गुलनार कब है ख़ार है बे-कार है आप ने जब कह दिया बे-कार है बे-कार है छोड़ कर मतला ग़ज़ल दमदार है बे-कार है जब सिपह-सालार ही बीमार है बे-कार है इक सवाल ऐसा है मेरे पास जिस के सामने ये जो तेरी शिद्दत-ए-इंकार है बे-कार है तुझ को भी है चाँद का दीदार करने की तलब इक दिए को रौशनी दरकार है बे-कार है मय-कदे के मुख़्तलिफ़ आदाब होते हैं 'चराग़' जो यहाँ पर साहब-ए-किरदार है बे-कार है
Charagh Sharma
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थक जाता हूँ रोज़ के आने जाने में मेरा बिस्तर लगवा दो मय-ख़ाने में "उस के हाथ में फूल है" मत कहिए, कहिए उस का हाथ है फूल को फूल बनाने में मैं कब से मौक़े की ताक में हूँ ,उस को जाने मन कह दूँ जाने अनजाने में आँखों में मत रोक, मुझे जाना है उधर ये रस्ता खुलता है जिस तहख़ाने में
Charagh Sharma
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किसी को क्लास से बाहर निकाल रक्खा है किसी ने सीट पे रुमाल डाल रक्खा है किसी ने कमरे में बर्बाद कर लिया ख़ुद को किसी ने जंग में अपना ख़याल रक्खा है हकीम-ए-शहर के बच्चों को पालने के लिए हर आदमी ने कोई रोग पाल रक्खा है वहाँ वो चिड़िया भी ख़ुश है ये सोच कर सय्याद कि उस ने दुनिया को पिंजरे में डाल रक्खा है ग़ज़ल ही इश्क़ का मैदान है तो आगे बढ़ो यहाँ का मोर्चा हम ने सँभाल रक्खा है
Charagh Sharma
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जंग जितनी हो सके दुश्वार होनी चाहिए जीत हासिल हो तो लज़्ज़त-दार होनी चाहिए एक आशिक़ कल सलामत शहर में देखा गया ये ख़बर तो सुर्ख़ी-ए-अख़बार होनी चाहिए कह रही है आज-कल ग़ज़लें किसी के इश्क़ में वो कि जो ख़ुद ज़ीनत-ए-अश'आर होनी चाहिए इश्क़ दोनों ने किया था ख़ुद-कुशी बस मैं करूँँ वो भी मरने के लिए तय्यार होनी चाहिए दिल की नादानी ही बस काफ़ी नहीं है इश्क़ में अक़्ल भी थोड़ी बहुत बीमार होनी चाहिए प्यार है तो हाथ उस का थाम अपने हाथ में जंग है तो हाथ में तलवार होनी चाहिए
Charagh Sharma
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