ghazalKuch Alfaaz

मिरी उदासी मिरे दरमियान बंद करो कोई सलीक़े से ये इत्र-दान बंद करो पढ़ा रहा हूँ मैं बच्चों को कर्बला का निसाब तुम अपनी तिश्ना-लबी का बखान बंद करो ज़रा समझने की कोशिश करो मिरे अश्कों वो आज ख़ुश है तुम अपनी ज़बान बंद करो मैं एक शर्त पे राज़ी हूँ क़ैद होने को इसी क़फ़स में मिरा आसमान बंद करो मुझे अकेले में करनी हैं ख़ुद से कुछ बातें ये मेरा हुक्म है दीवारो कान बंद करो ग़ज़ल में लाने से ग़म और बढ़ गया है 'चराग़' शटर गिराओ सुख़न की दुकान बंद करो

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क्या ग़लतफ़हमी में रह जाने का सदमा कुछ नहीं वो मुझे समझा तो सकता था कि ऐसा कुछ नहीं इश्क़ से बच कर भी बंदा कुछ नहीं होता मगर ये भी सच है इश्क़ में बंदे का बचता कुछ नहीं जाने कैसे राज़ सीने में लिए बैठा है वो ज़ह्र खा लेता है पर मुँह से उगलता कुछ नहीं शुक्र है कि उस ने मुझ सेे कह दिया कि कुछ तो है मैं उस सेे कहने ही वाला था कि अच्छा कुछ नहीं

Tehzeeb Hafi

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फिर मिरी याद आ रही होगी फिर वो दीपक बुझा रही होगी फिर मिरे फेसबुक पे आ कर वो ख़ुद को बैनर बना रही होगी अपने बेटे का चूम कर माथा मुझ को टीका लगा रही होगी फिर उसी ने उसे छुआ होगा फिर उसी से निभा रही होगी जिस्म चादर सा बिछ गया होगा रूह सिलवट हटा रही होगी फिर से इक रात कट गई होगी फिर से इक रात आ रही होगी

Kumar Vishwas

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आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा कश्ती के मुसाफ़िर ने समुंदर नहीं देखा बे-वक़्त अगर जाऊँगा सब चौंक पड़ेंगे इक उम्र हुई दिन में कभी घर नहीं देखा जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं तुम ने मिरा काँटों भरा बिस्तर नहीं देखा यारों की मोहब्बत का यक़ीं कर लिया मैं ने फूलों में छुपाया हुआ ख़ंजर नहीं देखा महबूब का घर हो कि बुज़ुर्गों की ज़मीनें जो छोड़ दिया फिर उसे मुड़ कर नहीं देखा ख़त ऐसा लिखा है कि नगीने से जड़े हैं वो हाथ कि जिस ने कोई ज़ेवर नहीं देखा पत्थर मुझे कहता है मिरा चाहने वाला मैं मोम हूँ उस ने मुझे छू कर नहीं देखा

Bashir Badr

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कोई इतना प्यारा कैसे हो सकता है फिर सारे का सारा कैसे हो सकता है कैसे किसी की याद हमें ज़िंदा रखती है एक ख़याल सहारा कैसे हो सकता है तुझ से जब मिल कर भी उदासी कम नहीं होती तेरे बग़ैर गुज़ारा कैसे हो सकता है यार हवा से कैसे आग भड़क उठती है लफ़्ज़ कोई अँगारा कैसे हो सकता है कौन ज़माने-भर की ठोकरें खा कर ख़ुश है दर्द किसी को प्यारा कैसे हो सकता है हम भी कैसे एक ही शख़्स के हो कर रह जाएँ वो भी सिर्फ़ हमारा कैसे हो सकता है कैसे हो सकता है जो कुछ भी मैं चाहूँ बोल ना मेरे यारा कैसे हो सकता है

Jawwad Sheikh

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रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ कुछ तो मिरे पिंदार-ए-मोहब्बत का भरम रख तू भी तो कभी मुझ को मनाने के लिए आ पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो रस्म-ओ-रह-ए-दुनिया ही निभाने के लिए आ किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम तू मुझ से ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए आ इक उम्र से हूँ लज़्ज़त-ए-गिर्या से भी महरूम ऐ राहत-ए-जाँ मुझ को रुलाने के लिए आ अब तक दिल-ए-ख़ुश-फ़हम को तुझ से हैं उम्मीदें ये आख़िरी शमएँ भी बुझाने के लिए आ

Ahmad Faraz

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पुकारता हूँ मैं अल-अमान अल-अमान अल्लाह बचा ले मेरे यक़ीनुल्लाह की जान अल्लाह वो जिन को तू ने अता किया है जहान अल्लाह बना रहे हैं तिरे लिए ही मकान अल्लाह वो याद आता है सिर्फ़ यारों के पूछने पर तू याद आता है सिर्फ़ वक़्त-ए-अज़ान अल्लाह तिरे तग़ाफ़ुल की ही बदौलत हूँ आज जो हूँ मुझे कोई जन्म-जात काफ़िर न जान अल्लाह मैं जब वो जन्नत भी छोड़ आया तो दुनिया क्या है ले मैं चला तू सँभाल अपना जहान अल्लाह

Charagh Sharma

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जंग जितनी हो सके दुश्वार होनी चाहिए जीत हासिल हो तो लज़्ज़त-दार होनी चाहिए एक आशिक़ कल सलामत शहर में देखा गया ये ख़बर तो सुर्ख़ी-ए-अख़बार होनी चाहिए कह रही है आज-कल ग़ज़लें किसी के इश्क़ में वो कि जो ख़ुद ज़ीनत-ए-अश'आर होनी चाहिए इश्क़ दोनों ने किया था ख़ुद-कुशी बस मैं करूँँ वो भी मरने के लिए तय्यार होनी चाहिए दिल की नादानी ही बस काफ़ी नहीं है इश्क़ में अक़्ल भी थोड़ी बहुत बीमार होनी चाहिए प्यार है तो हाथ उस का थाम अपने हाथ में जंग है तो हाथ में तलवार होनी चाहिए

Charagh Sharma

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अब ये गुल गुलनार कब है ख़ार है बे-कार है आप ने जब कह दिया बे-कार है बे-कार है छोड़ कर मतला ग़ज़ल दमदार है बे-कार है जब सिपह-सालार ही बीमार है बे-कार है इक सवाल ऐसा है मेरे पास जिस के सामने ये जो तेरी शिद्दत-ए-इंकार है बे-कार है तुझ को भी है चाँद का दीदार करने की तलब इक दिए को रौशनी दरकार है बे-कार है मय-कदे के मुख़्तलिफ़ आदाब होते हैं 'चराग़' जो यहाँ पर साहब-ए-किरदार है बे-कार है

Charagh Sharma

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कोई ख़त वत नहीं फाड़ा कोई तोहफ़ा नहीं तोड़ा कि वो देखे तो ख़ुद सोचे कि दिल तोड़ा नहीं तोड़ा यहाँ मैं ने गले में बाँध ली रस्सी और इक वो है कि अब तक सिर्फ़ दस्तक दी है दरवाज़ा नहीं तोड़ा भरोसा था भरोसा तोड़ देगा वो सो उस ने भी भरोसा तोड़ के वो जो भरोसा था नहीं तोड़ा बनाना आ गया जब काँच की किरचों से कोहेनूर ग़ज़ल कहने लगे ग़ुस्से में गुलदस्ता नहीं तोड़ा

Charagh Sharma

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चमन में कौन बबूलों की डाल खींचता है यहाँ जो आता है फूलों के गाल खींचता है वो तीर बा'द में पहले सवाल खींचता है सवाल भी जो समाअ'त की खाल खींचता है ऐ प्यार बाँटने वाले मैं ख़ूब जानता हूँ कि कितनी देर में मछवारा जाल खींचता है निकल भी सकता हूँ क़ैद-ए-तख़य्युलात से गर वो शख़्स खींच ले जिस का ख़याल खींचता है मैं उस के आगे नहीं खींचता नियाम से तेग़ वो शेर-शाह जो दुश्मन की ढाल खींचता है ये सर्द सुब्ह में सोया शरारती सूरज बस आँख खुलते ही परियों की शाल खींचता है मैं होश-मंद हूँ ख़ुद भी सो मेरी ग़ज़लों में न रक़्स करता है आशिक़ न बाल खींचता है

Charagh Sharma

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