चमन में कौन बबूलों की डाल खींचता है यहाँ जो आता है फूलों के गाल खींचता है वो तीर बा'द में पहले सवाल खींचता है सवाल भी जो समाअ'त की खाल खींचता है ऐ प्यार बाँटने वाले मैं ख़ूब जानता हूँ कि कितनी देर में मछवारा जाल खींचता है निकल भी सकता हूँ क़ैद-ए-तख़य्युलात से गर वो शख़्स खींच ले जिस का ख़याल खींचता है मैं उस के आगे नहीं खींचता नियाम से तेग़ वो शेर-शाह जो दुश्मन की ढाल खींचता है ये सर्द सुब्ह में सोया शरारती सूरज बस आँख खुलते ही परियों की शाल खींचता है मैं होश-मंद हूँ ख़ुद भी सो मेरी ग़ज़लों में न रक़्स करता है आशिक़ न बाल खींचता है
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इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए
Khumar Barabankvi
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आईने आँख में चुभते थे बिस्तर से बदन कतराता था एक याद बसर करती थी मुझे मैं साँस नहीं ले पाता था एक शख़्स के हाथ में था सब कुछ मेरा खिलना भी मुरझाना भी रोता था तो रात उजड़ जाती हँसता था तो दिन बन जाता था मैं रब से राब्ते में रहता मुमकिन है की उस से राब्ता हो मुझे हाथ उठाना पड़ते थे तब जा कर वो फोन उठाता था मुझे आज भी याद है बचपन में कभी उस पर नजर अगर पड़ती मेरे बस्ते से फूल बरसते थे मेरी तख्ती पे दिल बन जाता था हम एक ज़िंदान में ज़िंदा थे हम एक जंजीर में बढ़े हुए एक दूसरे को देख कर हम कभी हंसते थे तो रोना आता था वो जिस्म नज़र-अंदाज़ नहीं हो पाता था इन आँखों से मुजरिम ठहराता था अपना कहने को तो घर ठहराता था
Tehzeeb Hafi
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एक और शख़्स छोड़ कर चला गया तो क्या हुआ हमारे साथ कौन सा ये पहली मर्तबा हुआ अज़ल से इन हथेलियों में हिज्र की लकीर थी तुम्हारा दुख तो जैसे मेरे हाथ में बड़ा हुआ मेरे ख़िलाफ़ दुश्मनों की सफ़ में है वो और मैं बहुत बुरा लगूँगा उस पर तीर खींचता हुआ
Tehzeeb Hafi
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मेरे दिल में ये तेरे सिवा कौन है? तू नहीं है तो तेरी जगह कौन है? हम मोहब्बत में हारे हुए लोग हैं और मोहब्बत में जीता हुआ कौन है? मेरे पहलू से उठ के गया कौन है? तू नहीं है तो तेरी जगह कौन है? तू ने जाते हुए ये बताया नहीं मैं तेरा कौन हूँ तू मेरा कौन है
Tehzeeb Hafi
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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ
Ali Zaryoun
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पुकारता हूँ मैं अल-अमान अल-अमान अल्लाह बचा ले मेरे यक़ीनुल्लाह की जान अल्लाह वो जिन को तू ने अता किया है जहान अल्लाह बना रहे हैं तिरे लिए ही मकान अल्लाह वो याद आता है सिर्फ़ यारों के पूछने पर तू याद आता है सिर्फ़ वक़्त-ए-अज़ान अल्लाह तिरे तग़ाफ़ुल की ही बदौलत हूँ आज जो हूँ मुझे कोई जन्म-जात काफ़िर न जान अल्लाह मैं जब वो जन्नत भी छोड़ आया तो दुनिया क्या है ले मैं चला तू सँभाल अपना जहान अल्लाह
Charagh Sharma
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थक जाता हूँ रोज़ के आने जाने में मेरा बिस्तर लगवा दो मय-ख़ाने में "उस के हाथ में फूल है" मत कहिए, कहिए उस का हाथ है फूल को फूल बनाने में मैं कब से मौक़े की ताक में हूँ ,उस को जाने मन कह दूँ जाने अनजाने में आँखों में मत रोक, मुझे जाना है उधर ये रस्ता खुलता है जिस तहख़ाने में
Charagh Sharma
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मिरी उदासी मिरे दरमियान बंद करो कोई सलीक़े से ये इत्र-दान बंद करो पढ़ा रहा हूँ मैं बच्चों को कर्बला का निसाब तुम अपनी तिश्ना-लबी का बखान बंद करो ज़रा समझने की कोशिश करो मिरे अश्कों वो आज ख़ुश है तुम अपनी ज़बान बंद करो मैं एक शर्त पे राज़ी हूँ क़ैद होने को इसी क़फ़स में मिरा आसमान बंद करो मुझे अकेले में करनी हैं ख़ुद से कुछ बातें ये मेरा हुक्म है दीवारो कान बंद करो ग़ज़ल में लाने से ग़म और बढ़ गया है 'चराग़' शटर गिराओ सुख़न की दुकान बंद करो
Charagh Sharma
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जंग जितनी हो सके दुश्वार होनी चाहिए जीत हासिल हो तो लज़्ज़त-दार होनी चाहिए एक आशिक़ कल सलामत शहर में देखा गया ये ख़बर तो सुर्ख़ी-ए-अख़बार होनी चाहिए कह रही है आज-कल ग़ज़लें किसी के इश्क़ में वो कि जो ख़ुद ज़ीनत-ए-अश'आर होनी चाहिए इश्क़ दोनों ने किया था ख़ुद-कुशी बस मैं करूँँ वो भी मरने के लिए तय्यार होनी चाहिए दिल की नादानी ही बस काफ़ी नहीं है इश्क़ में अक़्ल भी थोड़ी बहुत बीमार होनी चाहिए प्यार है तो हाथ उस का थाम अपने हाथ में जंग है तो हाथ में तलवार होनी चाहिए
Charagh Sharma
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अब ये गुल गुलनार कब है ख़ार है बे-कार है आप ने जब कह दिया बे-कार है बे-कार है छोड़ कर मतला ग़ज़ल दमदार है बे-कार है जब सिपह-सालार ही बीमार है बे-कार है इक सवाल ऐसा है मेरे पास जिस के सामने ये जो तेरी शिद्दत-ए-इंकार है बे-कार है तुझ को भी है चाँद का दीदार करने की तलब इक दिए को रौशनी दरकार है बे-कार है मय-कदे के मुख़्तलिफ़ आदाब होते हैं 'चराग़' जो यहाँ पर साहब-ए-किरदार है बे-कार है
Charagh Sharma
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