ghazalKuch Alfaaz

थक जाता हूँ रोज़ के आने जाने में मेरा बिस्तर लगवा दो मय-ख़ाने में "उस के हाथ में फूल है" मत कहिए, कहिए उस का हाथ है फूल को फूल बनाने में मैं कब से मौक़े की ताक में हूँ ,उस को जाने मन कह दूँ जाने अनजाने में आँखों में मत रोक, मुझे जाना है उधर ये रस्ता खुलता है जिस तहख़ाने में

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा

Hasan Abbasi

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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो

Jaun Elia

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पुकारता हूँ मैं अल-अमान अल-अमान अल्लाह बचा ले मेरे यक़ीनुल्लाह की जान अल्लाह वो जिन को तू ने अता किया है जहान अल्लाह बना रहे हैं तिरे लिए ही मकान अल्लाह वो याद आता है सिर्फ़ यारों के पूछने पर तू याद आता है सिर्फ़ वक़्त-ए-अज़ान अल्लाह तिरे तग़ाफ़ुल की ही बदौलत हूँ आज जो हूँ मुझे कोई जन्म-जात काफ़िर न जान अल्लाह मैं जब वो जन्नत भी छोड़ आया तो दुनिया क्या है ले मैं चला तू सँभाल अपना जहान अल्लाह

Charagh Sharma

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अब के मिली शिकस्त मेरी ओर से मुझे जितवा दिया गया किसी कमज़ोर से मुझे अल्फ़ाज़ ढ़ोने वाली इक आवाज़ था मैं बस फिर उस ने सुनके शे'र किया शोर से मुझे तुझ को न पाके ख़ुश हूँ कि खोने का डर नहीं ग़ुरबत बचा रही है हर इक चोर से मुझे जो शाख़ पर हैं तेरे गुज़रने के बावजूद वो फूल चुभ रहे हैं बहुत ज़ोर से मुझे मैं चाहता था और कुछ ऊँचा हो आसमान क़ुदरत ने पंख सौंप दिए मोर से मुझे मैं ने क़ुबूल कर लिया चुप-चाप वो गुलाब जो शाख़ दे रही थी तेरी ओर से मुझे हल्के से उस ने पूछा किसे दूँ मैं अपना दिल मैं मन ही मन में चीख़ा बहुत ज़ोर से "मुझे"

Charagh Sharma

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जंग जितनी हो सके दुश्वार होनी चाहिए जीत हासिल हो तो लज़्ज़त-दार होनी चाहिए एक आशिक़ कल सलामत शहर में देखा गया ये ख़बर तो सुर्ख़ी-ए-अख़बार होनी चाहिए कह रही है आज-कल ग़ज़लें किसी के इश्क़ में वो कि जो ख़ुद ज़ीनत-ए-अश'आर होनी चाहिए इश्क़ दोनों ने किया था ख़ुद-कुशी बस मैं करूँँ वो भी मरने के लिए तय्यार होनी चाहिए दिल की नादानी ही बस काफ़ी नहीं है इश्क़ में अक़्ल भी थोड़ी बहुत बीमार होनी चाहिए प्यार है तो हाथ उस का थाम अपने हाथ में जंग है तो हाथ में तलवार होनी चाहिए

Charagh Sharma

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मिरी उदासी मिरे दरमियान बंद करो कोई सलीक़े से ये इत्र-दान बंद करो पढ़ा रहा हूँ मैं बच्चों को कर्बला का निसाब तुम अपनी तिश्ना-लबी का बखान बंद करो ज़रा समझने की कोशिश करो मिरे अश्कों वो आज ख़ुश है तुम अपनी ज़बान बंद करो मैं एक शर्त पे राज़ी हूँ क़ैद होने को इसी क़फ़स में मिरा आसमान बंद करो मुझे अकेले में करनी हैं ख़ुद से कुछ बातें ये मेरा हुक्म है दीवारो कान बंद करो ग़ज़ल में लाने से ग़म और बढ़ गया है 'चराग़' शटर गिराओ सुख़न की दुकान बंद करो

Charagh Sharma

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अब ये गुल गुलनार कब है ख़ार है बे-कार है आप ने जब कह दिया बे-कार है बे-कार है छोड़ कर मतला ग़ज़ल दमदार है बे-कार है जब सिपह-सालार ही बीमार है बे-कार है इक सवाल ऐसा है मेरे पास जिस के सामने ये जो तेरी शिद्दत-ए-इंकार है बे-कार है तुझ को भी है चाँद का दीदार करने की तलब इक दिए को रौशनी दरकार है बे-कार है मय-कदे के मुख़्तलिफ़ आदाब होते हैं 'चराग़' जो यहाँ पर साहब-ए-किरदार है बे-कार है

Charagh Sharma

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