मन भर गया है मुझ सेे तो दिलबर बदल कर देख लो क्या एक ही दर पर रहोगे दर बदल कर देख लो इस में तो कोई शक नहीं हैं ख़ूब-सूरत आप पर मेरी तवज्जोह चाहिए तेवर बदल कर देख लो माँ बाप पर जो बोझ है आसान लगता है तुम्हें तुम उन की ज़िम्मेदारियाँ पल भर बदल कर देख लो इन चिंदियों के आने से कुछ भी न बिगड़ा है मेरा इक और मौका है कि तुम लश्कर बदल कर देख लो ये नौकरी आकिब तुम्हारे बस की बिल्कुल भी नहीं ये इश्क़ छोड़ो यार तुम दफ़्तर बदल कर देख लो
Related Ghazal
क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
371 likes
तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
235 likes
इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ
Mehshar Afridi
173 likes
तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
249 likes
ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
190 likes
More from Aqib khan
यूँँ दिल से मेरे उतर गए तुम नहीं पता फिर किधर गए तुम न ढूँढों ख़ुद को यूँँ मेरे भीतर यक़ीन मानो कि मर गए तुम तुम्हारा क्या है पुराना छोड़ा नए शजर पर ठहर गए तुम तुम्हारे जैसा मिले तुम्हें और ख़बर हो मुझ को बिखर गए तुम वही हुनर अब सिखाओ मुझ को वो जैसे मुँह पर मुकर गए तुम मैं कितना झूठा था कहता था जो कि मर मिटूँगा अगर गए तुम दिलाओ जितना मगर कभी भी यक़ीं न होगा सुधर गए तुम अदा करो शुक्रिया मेरा अब थी मेरी सोहबत सँवर गए तुम
Aqib khan
3 likes
तेरी गली में तो जाने का हौसला ही नहीं करूँँ मैं ज़ख़्म हरे फिर से सोचता ही नहीं अजीब राह है जिस पर हमें है जाना मगर कोई क़रीबी हमें आ के रोकता ही नहीं कि तेरे बा'द तो हम साथ साथ सब के गए वो और बात है ये दिल मिरा गया ही नहीं वो शख़्स जो सदा आँखों में है समाया हुआ मिला तो कह दिया मैं तुम को जानता ही नहीं ज़रा सा और दो ये दर्द कम पड़ा है मुझे कि साँस चल रही है अब भी मैं मरा ही नहीं रुके हुए थे इशारे पे एक जिस के वो फिर ये कह के चल दिया मुझ सेे मैं तेरा था ही नहीं बताया हिज्र के बारे में चारा-गर ने मुझे ये मर्ज़ ऐसा है जिस की कोई दवा ही नहीं
Aqib khan
1 likes
क्यूँ मुझे कुछ भी यहाँ अच्छा नहीं लगता है अब सच कहूँँ तो ये जहाँ अच्छा नहीं लगता है अब उम्र भर हम साथ हैं ये तो न बोलो मुझ सेे तुम झूठा वा'दा जान ए जाँ अच्छा नहीं लगता है अब हो अगर कुछ काम तो फिर बात भी कर लेंगे हम इश्क़ का चर्चा मियाँ अच्छा नहीं लगता है अब कुछ ख़बर अब तक नहीं है जाना है हम को कहाँ चलना ऐसे राएगाँ अच्छा नहीं लगता है अब चाँद तारों के बराबर बोला था इक शख़्स को सो चमकता आसमाँ अच्छा नहीं लगता है अब वक़्त की ही बात है जो मेरे पीछे थे कभी उन को मेरा कारवाँ अच्छा नहीं लगता है अब
Aqib khan
1 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Aqib khan.
Similar Moods
More moods that pair well with Aqib khan's ghazal.







