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क्यूँ मुझे कुछ भी यहाँ अच्छा नहीं लगता है अब सच कहूँँ तो ये जहाँ अच्छा नहीं लगता है अब उम्र भर हम साथ हैं ये तो न बोलो मुझ सेे तुम झूठा वा'दा जान ए जाँ अच्छा नहीं लगता है अब हो अगर कुछ काम तो फिर बात भी कर लेंगे हम इश्क़ का चर्चा मियाँ अच्छा नहीं लगता है अब कुछ ख़बर अब तक नहीं है जाना है हम को कहाँ चलना ऐसे राएगाँ अच्छा नहीं लगता है अब चाँद तारों के बराबर बोला था इक शख़्स को सो चमकता आसमाँ अच्छा नहीं लगता है अब वक़्त की ही बात है जो मेरे पीछे थे कभी उन को मेरा कारवाँ अच्छा नहीं लगता है अब

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा

Fahmi Badayuni

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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क्या ग़लतफ़हमी में रह जाने का सदमा कुछ नहीं वो मुझे समझा तो सकता था कि ऐसा कुछ नहीं इश्क़ से बच कर भी बंदा कुछ नहीं होता मगर ये भी सच है इश्क़ में बंदे का बचता कुछ नहीं जाने कैसे राज़ सीने में लिए बैठा है वो ज़ह्र खा लेता है पर मुँह से उगलता कुछ नहीं शुक्र है कि उस ने मुझ सेे कह दिया कि कुछ तो है मैं उस सेे कहने ही वाला था कि अच्छा कुछ नहीं

Tehzeeb Hafi

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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तेरी गली में तो जाने का हौसला ही नहीं करूँँ मैं ज़ख़्म हरे फिर से सोचता ही नहीं अजीब राह है जिस पर हमें है जाना मगर कोई क़रीबी हमें आ के रोकता ही नहीं कि तेरे बा'द तो हम साथ साथ सब के गए वो और बात है ये दिल मिरा गया ही नहीं वो शख़्स जो सदा आँखों में है समाया हुआ मिला तो कह दिया मैं तुम को जानता ही नहीं ज़रा सा और दो ये दर्द कम पड़ा है मुझे कि साँस चल रही है अब भी मैं मरा ही नहीं रुके हुए थे इशारे पे एक जिस के वो फिर ये कह के चल दिया मुझ सेे मैं तेरा था ही नहीं बताया हिज्र के बारे में चारा-गर ने मुझे ये मर्ज़ ऐसा है जिस की कोई दवा ही नहीं

Aqib khan

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यूँँ दिल से मेरे उतर गए तुम नहीं पता फिर किधर गए तुम न ढूँढों ख़ुद को यूँँ मेरे भीतर यक़ीन मानो कि मर गए तुम तुम्हारा क्या है पुराना छोड़ा नए शजर पर ठहर गए तुम तुम्हारे जैसा मिले तुम्हें और ख़बर हो मुझ को बिखर गए तुम वही हुनर अब सिखाओ मुझ को वो जैसे मुँह पर मुकर गए तुम मैं कितना झूठा था कहता था जो कि मर मिटूँगा अगर गए तुम दिलाओ जितना मगर कभी भी यक़ीं न होगा सुधर गए तुम अदा करो शुक्रिया मेरा अब थी मेरी सोहबत सँवर गए तुम

Aqib khan

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मन भर गया है मुझ सेे तो दिलबर बदल कर देख लो क्या एक ही दर पर रहोगे दर बदल कर देख लो इस में तो कोई शक नहीं हैं ख़ूब-सूरत आप पर मेरी तवज्जोह चाहिए तेवर बदल कर देख लो माँ बाप पर जो बोझ है आसान लगता है तुम्हें तुम उन की ज़िम्मेदारियाँ पल भर बदल कर देख लो इन चिंदियों के आने से कुछ भी न बिगड़ा है मेरा इक और मौका है कि तुम लश्कर बदल कर देख लो ये नौकरी आकिब तुम्हारे बस की बिल्कुल भी नहीं ये इश्क़ छोड़ो यार तुम दफ़्तर बदल कर देख लो

Aqib khan

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