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यूँँ दिल से मेरे उतर गए तुम नहीं पता फिर किधर गए तुम न ढूँढों ख़ुद को यूँँ मेरे भीतर यक़ीन मानो कि मर गए तुम तुम्हारा क्या है पुराना छोड़ा नए शजर पर ठहर गए तुम तुम्हारे जैसा मिले तुम्हें और ख़बर हो मुझ को बिखर गए तुम वही हुनर अब सिखाओ मुझ को वो जैसे मुँह पर मुकर गए तुम मैं कितना झूठा था कहता था जो कि मर मिटूँगा अगर गए तुम दिलाओ जितना मगर कभी भी यक़ीं न होगा सुधर गए तुम अदा करो शुक्रिया मेरा अब थी मेरी सोहबत सँवर गए तुम

Aqib khan3 Likes

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो

Jaun Elia

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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तेरी गली में तो जाने का हौसला ही नहीं करूँँ मैं ज़ख़्म हरे फिर से सोचता ही नहीं अजीब राह है जिस पर हमें है जाना मगर कोई क़रीबी हमें आ के रोकता ही नहीं कि तेरे बा'द तो हम साथ साथ सब के गए वो और बात है ये दिल मिरा गया ही नहीं वो शख़्स जो सदा आँखों में है समाया हुआ मिला तो कह दिया मैं तुम को जानता ही नहीं ज़रा सा और दो ये दर्द कम पड़ा है मुझे कि साँस चल रही है अब भी मैं मरा ही नहीं रुके हुए थे इशारे पे एक जिस के वो फिर ये कह के चल दिया मुझ सेे मैं तेरा था ही नहीं बताया हिज्र के बारे में चारा-गर ने मुझे ये मर्ज़ ऐसा है जिस की कोई दवा ही नहीं

Aqib khan

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क्यूँ मुझे कुछ भी यहाँ अच्छा नहीं लगता है अब सच कहूँँ तो ये जहाँ अच्छा नहीं लगता है अब उम्र भर हम साथ हैं ये तो न बोलो मुझ सेे तुम झूठा वा'दा जान ए जाँ अच्छा नहीं लगता है अब हो अगर कुछ काम तो फिर बात भी कर लेंगे हम इश्क़ का चर्चा मियाँ अच्छा नहीं लगता है अब कुछ ख़बर अब तक नहीं है जाना है हम को कहाँ चलना ऐसे राएगाँ अच्छा नहीं लगता है अब चाँद तारों के बराबर बोला था इक शख़्स को सो चमकता आसमाँ अच्छा नहीं लगता है अब वक़्त की ही बात है जो मेरे पीछे थे कभी उन को मेरा कारवाँ अच्छा नहीं लगता है अब

Aqib khan

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मन भर गया है मुझ सेे तो दिलबर बदल कर देख लो क्या एक ही दर पर रहोगे दर बदल कर देख लो इस में तो कोई शक नहीं हैं ख़ूब-सूरत आप पर मेरी तवज्जोह चाहिए तेवर बदल कर देख लो माँ बाप पर जो बोझ है आसान लगता है तुम्हें तुम उन की ज़िम्मेदारियाँ पल भर बदल कर देख लो इन चिंदियों के आने से कुछ भी न बिगड़ा है मेरा इक और मौका है कि तुम लश्कर बदल कर देख लो ये नौकरी आकिब तुम्हारे बस की बिल्कुल भी नहीं ये इश्क़ छोड़ो यार तुम दफ़्तर बदल कर देख लो

Aqib khan

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