ghazalKuch Alfaaz

manzilen laakh kathin aaen guzar jaunga hausla haar ke baithunga to mar jaunga chal rahe the jo mere saath kahan hain vo log jo ye kahte the ki raste men bikhar jaunga dar-ba-dar hone se pahle kabhi socha bhi na tha ghar mujhe raas na aaya to kidhar jaunga yaad rakkhe mujhe duniya tiri tasvir ke saath rang aise tiri tasvir men bhar jaunga laakh roken ye andhere mira rasta lekin main jidhar raushni jaegi udhar jaunga raas aai na mohabbat mujhe varna 'saqi' main ne socha tha ki har dil men utar jaunga manzilen lakh kathin aaen guzar jaunga hausla haar ke baithunga to mar jaunga chal rahe the jo mere sath kahan hain wo log jo ye kahte the ki raste mein bikhar jaunga dar-ba-dar hone se pahle kabhi socha bhi na tha ghar mujhe ras na aaya to kidhar jaunga yaad rakkhe mujhe duniya teri taswir ke sath rang aise teri taswir mein bhar jaunga lakh roken ye andhere mera rasta lekin main jidhar raushni jaegi udhar jaunga ras aai na mohabbat mujhe warna 'saqi' main ne socha tha ki har dil mein utar jaunga

Related Ghazal

सर-ए-राह कुछ भी कहा नहीं कभी उस के घर मैं गया नहीं मैं जनम जनम से उसी का हूँ उसे आज तक ये पता नहीं उसे पाक नज़रों से चूमना भी इबादतों में शुमार है कोई फूल लाख क़रीब हो कभी मैं ने उस को छुआ नहीं ये ख़ुदा की देन अजीब है कि इसी का नाम नसीब है जिसे तू ने चाहा वो मिल गया जिसे मैं ने चाहा मिला नहीं इसी शहर में कई साल से मिरे कुछ क़रीबी अज़ीज़ हैं उन्हें मेरी कोई ख़बर नहीं मुझे उन का कोई पता नहीं

Bashir Badr

20 likes

वो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगा मसअला फूल का है फूल किधर जाएगा हम तो समझे थे कि इक ज़ख़्म है भर जाएगा क्या ख़बर थी कि रग-ए-जाँ में उतर जाएगा वो हवाओं की तरह ख़ाना-ब-जाँ फिरता है एक झोंका है जो आएगा गुज़र जाएगा वो जब आएगा तो फिर उस की रिफ़ाक़त के लिए मौसम-ए-गुल मिरे आँगन में ठहर जाएगा आख़िरश वो भी कहीं रेत पे बैठी होगी तेरा ये प्यार भी दरिया है उतर जाएगा मुझ को तहज़ीब के बर्ज़ख़ का बनाया वारिस जुर्म ये भी मिरे अज्दाद के सर जाएगा

Parveen Shakir

22 likes

बे-दिली क्या यूँँही दिन गुज़र जाएँगे सिर्फ़ ज़िंदा रहे हम तो मर जाएँगे रक़्स है रंग पर रंग हम-रक़्स हैं सब बिछड़ जाएँगे सब बिखर जाएँगे ये ख़राबातियान-ए-ख़िरद-बाख़्ता सुब्ह होते ही सब काम पर जाएँगे कितनी दिलकश हो तुम कितना दिल-जू हूँ मैं क्या सितम है कि हम लोग मर जाएँगे है ग़नीमत कि असरार-ए-हस्ती से हम बे-ख़बर आए हैं बे-ख़बर जाएँगे

Jaun Elia

28 likes

तुझे कैसे इल्म न हो सका बड़ी दूर तक ये ख़बर गई तिरे शहर ही की ये शाएरा तिरे इंतिज़ार में मर गई कोई बातें थीं कोई था सबब जो मैं वा'दा कर के मुकर गई तिरे प्यार पर तो यक़ीन था मैं ख़ुद अपने आप से डर गई वो तिरे मिज़ाज की बात थी ये मिरे मिज़ाज की बात है तू मिरी नज़र से न गिर सका मैं तिरी नज़र से उतर गई है ख़ुदा गवाह तिरे बिना मिरी ज़िंदगी तो न कट सकी मुझे ये बता कि मिरे बिना तिरी उम्र कैसे गुज़र गई वो सफ़र को अपने तमाम कर, गई रात आएँगे लौट कर ये 'नसीम' मैं ने सुनी ख़बर तो मैं शाम ही से सँवर गई

Mumtaz Naseem

15 likes

कभी यूँँ भी आ मिरी आँख में कि मिरी नज़र को ख़बर न हो मुझे एक रात नवाज़ दे मगर इस के बा'द सहर न हो वो बड़ा रहीम ओ करीम है मुझे ये सिफ़त भी अता करे तुझे भूलने की दुआ करूँँ तो मिरी दुआ में असर न हो मिरे बाज़ुओं में थकी थकी अभी महव-ए-ख़्वाब है चाँदनी न उठे सितारों की पालकी अभी आहटों का गुज़र न हो ये ग़ज़ल कि जैसे हिरन की आँख में पिछली रात की चाँदनी न बुझे ख़राबे की रौशनी कभी बे-चराग़ ये घर न हो कभी दिन की धूप में झूम के कभी शब के फूल को चूम के यूँँ ही साथ साथ चलें सदा कभी ख़त्म अपना सफ़र न हो

Bashir Badr

18 likes

More from Saqi Amrohvi

कौन पुर्सान-ए-हाल है मेरा ज़िंदा रहना कमाल है मेरा तू नहीं तो तिरा ख़याल सही कोई तो हम-ख़याल है मेरा मेरे आसाब दे रहे हैं जवाब हौसला कब निढाल है मेरा चढ़ता सूरज बता रहा है मुझे बस यहीं से ज़वाल है मेरा सब की नज़रें मिरी निगाह में हैं किस को कितना ख़याल है मेरा

Saqi Amrohvi

1 likes

तमाम उम्र मैं हर सुब्ह की अज़ान के बा'द इक इम्तिहान से गुज़रा एक इम्तिहान के बा'द ख़ुदा करे कि कहीं और गर्दिश-ए-तक़दीर किसी का घर न उजाड़े मेरे मकान के बा'द धरा ही क्या है मेरे पास नज़्र करने को तेरे हुज़ूर मेरी जान मेरी जान के बा'द ये राज़ उस पे खुलेगा जो ख़ुद को पहचाने कि इक यक़ीन की मंज़िल भी है गुमान के बा'द ये जुर्म कम है कि सच्चाई का भरम रक्खा सज़ा तो होनी थी मुझ को मेरे बयान के बा'द मेरे ख़ुदा उसे अपनी अमान में रखना जो बच गया है मेरे खेत में लगान के बा'द

Saqi Amrohvi

2 likes

मंज़िलें लाख कठिन आएँ गुज़र जाऊँगा हौसला हार के बैठूँगा तो मर जाऊँगा चल रहे थे जो मेरे साथ कहाँ हैं वो लोग जो ये कहते थे कि रस्ते में बिखर जाऊँगा दर-ब-दर होने से पहले कभी सोचा भी न था घर मुझे रास न आया तो किधर जाऊँगा याद रक्खे मुझे दुनिया तिरी तस्वीर के साथ रंग ऐसे तिरी तस्वीर में भर जाऊँगा लाख रोकें ये अँधेरे मिरा रस्ता लेकिन मैं जिधर रौशनी जाएगी उधर जाऊँगा रास आई न मोहब्बत मुझे वर्ना 'साक़ी' मैं ने सोचा था कि हर दिल में उतर जाऊँगा

Saqi Amrohvi

6 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Saqi Amrohvi.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Saqi Amrohvi's ghazal.