ghazalKuch Alfaaz

मिरी चीख़ों से कमरा भर गया था कोई कल रात मुझ में मर गया था बहुत मुश्किल है उस का लौट आना वो पूरी बात कब सुन कर गया था मुझे पहचानता भी है कोई अब मैं बस ये देखने ही घर गया था ज़माना जिस को दरिया कह रहा है हमारी आँख से बह कर गया था कई सदियों से सूखा पड़ रहा है यहाँ इक शख़्स प्यासा मर गया था हमारा बोझ था सर पर हमारे तुम्हारे साथ तो नौकर गया था ये मत समझा ख़ता किस से हुई थी बता इल्ज़ाम किस के सर गया था

Yasir Khan7 Likes

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा

Hasan Abbasi

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वो मुँह लगाता है जब कोई काम होता है जो उस का होता है समझो ग़ुलाम होता है किसी का हो के दुबारा न आना मेरी तरफ़ मोहब्बतों में हलाला हराम होता है इसे भी गिनते हैं हम लोग अहल-ए-ख़ाना में हमारे याँ तो शजर का भी नाम होता है तुझ ऐसे शख़्स के होते हैं ख़ास दोस्त बहुत तुझ ऐसा शख़्स बहुत जल्द आम होता है कभी लगी है तुम्हें कोई शाम आख़िरी शाम हमारे साथ ये हर एक शाम होता है

Umair Najmi

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सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से सो अपने आप को बर्बाद कर के देखते हैं सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उस की सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं सुना है उस को भी है शे'र ओ शा'इरी से शग़फ़ सो हम भी मो'जिज़े अपने हुनर के देखते हैं सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं सुना है हश्र हैं उस की ग़ज़ाल सी आँखें सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस की सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं सुना है उस की सियह-चश्मगी क़यामत है सो उस को सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं सुना है उस के लबों से गुलाब जलते हैं सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं सुना है आइना तिमसाल है जबीं उस की जो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं सुना है जब से हमाइल हैं उस की गर्दन में मिज़ाज और ही लाल ओ गुहर के देखते हैं सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में पलंग ज़ाविए उस की कमर के देखते हैं सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं वो सर्व-क़द है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं कि उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का सो रह-रवान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं सुना है उस के शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त मकीं उधर के भी जल्वे इधर के देखते हैं रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं चले तो उस को ज़माने ठहर के देखते हैं किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे कभी कभी दर ओ दीवार घर के देखते हैं कहानियाँ ही सही सब मुबालग़े ही सही अगर वो ख़्वाब है ता'बीर कर के देखते हैं अब उस के शहर में ठहरें कि कूच कर जाएँ 'फ़राज़' आओ सितारे सफ़र के देखते हैं

Ahmad Faraz

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तुम्हारे काम अगर आए मुस्कुराने में तो कोई हर्ज नहीं मेरे टूट जाने में फ़रोख़्त हो गई हर शय जो दिल मकान में थी मैं इतना ख़र्च हुआ हूँ उसे कमाने में मैं अपनी जान से जाऊँगा है ये सच लेकिन उसे भी ज़ख़्म तो आएँगे आज़माने में वो एक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत न बिन सका मुझ से हज़ार बार मिटा हूँ जिसे बनाने में तुम्हें तो सिर्फ़ ख़बर है चराग़ जलने की हमारे हाथ जले हैं उसे जलाने में तुम्हारे वस्ल की मस्ती थी और मय-ख़ाना शराब ले के गया था शराब-ख़ाने में इमारतों में मोहब्बत का देवता है वो हमारे हाथ कटे हैं जिसे बनाने में

Yasir Khan

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इश्क़ से जाम से बरसात से डर लगता है यार तुम क्या हो कि हर बात से डर लगता है इश्क़ है इश्क़ कोई खेल नहीं बच्चों का वो चला जाए जिसे मात से डर लगता है मैं तिरे हुस्न का शैदाई नहीं हो सकता रोज़ बँटती हुई ख़ैरात से डर लगता है हम ने हालात बदलने की दुआ माँगी थी अब बदलते हुए हालात से डर लगता है दिल तो करता है कि बारिश में नहाएँ 'यासिर' घर जो कच्चा हो तो बरसात से डर लगता है

Yasir Khan

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किसी ने हाल जो पूछा कभी मोहब्बत से लिपट के रोया बहुत देर उस से शिद्दत से हमारा साथ जो छूटा तो इस में हैरत क्या हमारे हाथ तो छूटे हुए थे मुद्दत से ये और बात कि बीनाई जा चुकी मेरी तुम्हारे ख़्वाब रखे हैं मगर हिफ़ाज़त से जब उस ने भीड़ में मुझ को गले लगाया था हर एक आँख मुझे तक रही थी हैरत से ये कारोबार-ए-सियासत बहुत ही अच्छा है बस आप झूट को बेचो बड़ी सदाक़त से

Yasir Khan

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जिन को मालूम नहीं होगा दुआ का मतलब वो हमें ख़ाक बताएँगे ख़ुदा का मतलब वो ये कहते हैं मोहब्बत में सज़ा पाओगे और मैं ख़ूब समझता हूँ सज़ा का मतलब या'नी काँटों से मैं ख़ुशबू के मआ'नी पूछूँ या'नी अब आप बताएँगे वफ़ा का मतलब

Yasir Khan

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आँखों को कुछ ख़्वाब दिखा कर मानेंगे आप हमारे होश उड़ा कर मानेंगे लगता है ये पानी बेचने वाले लोग हर बस्ती में आग लगा कर मानेंगे तुझ को छूने की चाहत में दीवाने शायद अपने हाथ जला कर मानेंगे तय तो ये था पिछली बातें भूलनी हैं आप मगर सब याद दिला कर मानेंगे घर का झगड़ा गर बाहर आ जाएगा बाहर वाले अंदर आ कर मानेंगे चाहे फिर आवाज़ चली जाए लेकिन हम उस को आवाज़ लगा कर मानेंगे घर पक्का करने की बातें करते हैं या'नी वो दीवार उठा कर मानेंगे

Yasir Khan

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