आँखों को कुछ ख़्वाब दिखा कर मानेंगे आप हमारे होश उड़ा कर मानेंगे लगता है ये पानी बेचने वाले लोग हर बस्ती में आग लगा कर मानेंगे तुझ को छूने की चाहत में दीवाने शायद अपने हाथ जला कर मानेंगे तय तो ये था पिछली बातें भूलनी हैं आप मगर सब याद दिला कर मानेंगे घर का झगड़ा गर बाहर आ जाएगा बाहर वाले अंदर आ कर मानेंगे चाहे फिर आवाज़ चली जाए लेकिन हम उस को आवाज़ लगा कर मानेंगे घर पक्का करने की बातें करते हैं या'नी वो दीवार उठा कर मानेंगे
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं
Ali Zaryoun
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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तुम्हारे काम अगर आए मुस्कुराने में तो कोई हर्ज नहीं मेरे टूट जाने में फ़रोख़्त हो गई हर शय जो दिल मकान में थी मैं इतना ख़र्च हुआ हूँ उसे कमाने में मैं अपनी जान से जाऊँगा है ये सच लेकिन उसे भी ज़ख़्म तो आएँगे आज़माने में वो एक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत न बिन सका मुझ से हज़ार बार मिटा हूँ जिसे बनाने में तुम्हें तो सिर्फ़ ख़बर है चराग़ जलने की हमारे हाथ जले हैं उसे जलाने में तुम्हारे वस्ल की मस्ती थी और मय-ख़ाना शराब ले के गया था शराब-ख़ाने में इमारतों में मोहब्बत का देवता है वो हमारे हाथ कटे हैं जिसे बनाने में
Yasir Khan
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किसी ने हाल जो पूछा कभी मोहब्बत से लिपट के रोया बहुत देर उस से शिद्दत से हमारा साथ जो छूटा तो इस में हैरत क्या हमारे हाथ तो छूटे हुए थे मुद्दत से ये और बात कि बीनाई जा चुकी मेरी तुम्हारे ख़्वाब रखे हैं मगर हिफ़ाज़त से जब उस ने भीड़ में मुझ को गले लगाया था हर एक आँख मुझे तक रही थी हैरत से ये कारोबार-ए-सियासत बहुत ही अच्छा है बस आप झूट को बेचो बड़ी सदाक़त से
Yasir Khan
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इश्क़ से जाम से बरसात से डर लगता है यार तुम क्या हो कि हर बात से डर लगता है इश्क़ है इश्क़ कोई खेल नहीं बच्चों का वो चला जाए जिसे मात से डर लगता है मैं तिरे हुस्न का शैदाई नहीं हो सकता रोज़ बँटती हुई ख़ैरात से डर लगता है हम ने हालात बदलने की दुआ माँगी थी अब बदलते हुए हालात से डर लगता है दिल तो करता है कि बारिश में नहाएँ 'यासिर' घर जो कच्चा हो तो बरसात से डर लगता है
Yasir Khan
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मिरी चीख़ों से कमरा भर गया था कोई कल रात मुझ में मर गया था बहुत मुश्किल है उस का लौट आना वो पूरी बात कब सुन कर गया था मुझे पहचानता भी है कोई अब मैं बस ये देखने ही घर गया था ज़माना जिस को दरिया कह रहा है हमारी आँख से बह कर गया था कई सदियों से सूखा पड़ रहा है यहाँ इक शख़्स प्यासा मर गया था हमारा बोझ था सर पर हमारे तुम्हारे साथ तो नौकर गया था ये मत समझा ख़ता किस से हुई थी बता इल्ज़ाम किस के सर गया था
Yasir Khan
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ज़मीं बनाई गई आसमाँ बनाया गया बराए-इश्क़ ये सारा जहाँ बनाया गया तुम्हारी ना को ही आख़िर में हाँ बनाया गया यक़ीं के चाक पे रख कर गुमाँ बनाया गया तुम उस के पास हो जिस को तुम्हारी चाह न थी कहाँ पे प्यास थी दरिया कहाँ बनाया गया हमारे साथ कोई दो क़दम भी चल न सका किसी के वास्ते इक कारवाँ बनाया गया बदल के देख लो तुम जिस्म चाहे औरों से वहीं पे ठीक है जिस को जहाँ बनाया गया किसी को जब भी ज़रूरत पड़ी सियाही की हमारा जिस्म जला कर धुआँ बनाया गया बस एक मैं ही था बस्ती में बोलने वाला तो सब से पहले मुझे बे-ज़बाँ बनाया गया
Yasir Khan
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