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ज़मीं बनाई गई आसमाँ बनाया गया बराए-इश्क़ ये सारा जहाँ बनाया गया तुम्हारी ना को ही आख़िर में हाँ बनाया गया यक़ीं के चाक पे रख कर गुमाँ बनाया गया तुम उस के पास हो जिस को तुम्हारी चाह न थी कहाँ पे प्यास थी दरिया कहाँ बनाया गया हमारे साथ कोई दो क़दम भी चल न सका किसी के वास्ते इक कारवाँ बनाया गया बदल के देख लो तुम जिस्म चाहे औरों से वहीं पे ठीक है जिस को जहाँ बनाया गया किसी को जब भी ज़रूरत पड़ी सियाही की हमारा जिस्म जला कर धुआँ बनाया गया बस एक मैं ही था बस्ती में बोलने वाला तो सब से पहले मुझे बे-ज़बाँ बनाया गया

Yasir Khan9 Likes

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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

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वो ज़माना गुज़र गया कब का था जो दीवाना मर गया कब का ढूँढ़ता था जो इक नई दुनिया लौट के अपने घर गया कब का वो जो लाया था हम को दरिया तक पार अकेले उतर गया कब का उस का जो हाल है वही जाने अपना तो ज़ख़्म भर गया कब का ख़्वाब-दर-ख़्वाब था जो शीराज़ा अब कहाँ है बिखर गया कब का

Javed Akhtar

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ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं और क्या जुर्म है पता ही नहीं इतने हिस्सों में बट गया हूँ मैं मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं ज़िंदगी मौत तेरी मंज़िल है दूसरा कोई रास्ता ही नहीं सच घटे या बढ़े तो सच न रहे झूट की कोई इंतिहा ही नहीं ज़िंदगी अब बता कहाँ जाएँ ज़हर बाज़ार में मिला ही नहीं जिस के कारन फ़साद होते हैं उस का कोई अता-पता ही नहीं कैसे अवतार कैसे पैग़मबर ऐसा लगता है अब ख़ुदा ही नहीं चाहे सोने के फ़्रेम में जड़ दो आईना झूट बोलता ही नहीं अपनी रचनाओं में वो ज़िंदा है 'नूर' संसार से गया ही नहीं

Krishna Bihari Noor

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सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा इतना मत चाहो उसे वो बे-वफ़ा हो जाएगा हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा कितनी सच्चाई से मुझ से ज़िंदगी ने कह दिया तू नहीं मेरा तो कोई दूसरा हो जाएगा मैं ख़ुदा का नाम ले कर पी रहा हूँ दोस्तो ज़हर भी इस में अगर होगा दवा हो जाएगा सब उसी के हैं हवा ख़ुशबू ज़मीन ओ आसमाँ मैं जहाँ भी जाऊँगा उस को पता हो जाएगा

Bashir Badr

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किसे फ़ुर्सत-ए-मह-ओ-साल है ये सवाल है कोई वक़्त है भी कि जाल है ये सवाल है न है फ़िक्र-ए-गर्दिश-ए-आसमाँ न ख़याल-ए-जाँ मुझे फिर ये कैसा मलाल है ये सवाल है वो सवाल जिस का जवाब है मेरी ज़िन्दगी मेरी ज़िन्दगी का सवाल है ये सवाल है मैं बिछड़ के तुझ सेे बुलंदियों पे जो पस्त हूँ ये उरूज है कि ज़वाल है ये सवाल है

Abbas Qamar

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तुम्हारे काम अगर आए मुस्कुराने में तो कोई हर्ज नहीं मेरे टूट जाने में फ़रोख़्त हो गई हर शय जो दिल मकान में थी मैं इतना ख़र्च हुआ हूँ उसे कमाने में मैं अपनी जान से जाऊँगा है ये सच लेकिन उसे भी ज़ख़्म तो आएँगे आज़माने में वो एक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत न बिन सका मुझ से हज़ार बार मिटा हूँ जिसे बनाने में तुम्हें तो सिर्फ़ ख़बर है चराग़ जलने की हमारे हाथ जले हैं उसे जलाने में तुम्हारे वस्ल की मस्ती थी और मय-ख़ाना शराब ले के गया था शराब-ख़ाने में इमारतों में मोहब्बत का देवता है वो हमारे हाथ कटे हैं जिसे बनाने में

Yasir Khan

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मिरी चीख़ों से कमरा भर गया था कोई कल रात मुझ में मर गया था बहुत मुश्किल है उस का लौट आना वो पूरी बात कब सुन कर गया था मुझे पहचानता भी है कोई अब मैं बस ये देखने ही घर गया था ज़माना जिस को दरिया कह रहा है हमारी आँख से बह कर गया था कई सदियों से सूखा पड़ रहा है यहाँ इक शख़्स प्यासा मर गया था हमारा बोझ था सर पर हमारे तुम्हारे साथ तो नौकर गया था ये मत समझा ख़ता किस से हुई थी बता इल्ज़ाम किस के सर गया था

Yasir Khan

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आँखों को कुछ ख़्वाब दिखा कर मानेंगे आप हमारे होश उड़ा कर मानेंगे लगता है ये पानी बेचने वाले लोग हर बस्ती में आग लगा कर मानेंगे तुझ को छूने की चाहत में दीवाने शायद अपने हाथ जला कर मानेंगे तय तो ये था पिछली बातें भूलनी हैं आप मगर सब याद दिला कर मानेंगे घर का झगड़ा गर बाहर आ जाएगा बाहर वाले अंदर आ कर मानेंगे चाहे फिर आवाज़ चली जाए लेकिन हम उस को आवाज़ लगा कर मानेंगे घर पक्का करने की बातें करते हैं या'नी वो दीवार उठा कर मानेंगे

Yasir Khan

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इश्क़ से जाम से बरसात से डर लगता है यार तुम क्या हो कि हर बात से डर लगता है इश्क़ है इश्क़ कोई खेल नहीं बच्चों का वो चला जाए जिसे मात से डर लगता है मैं तिरे हुस्न का शैदाई नहीं हो सकता रोज़ बँटती हुई ख़ैरात से डर लगता है हम ने हालात बदलने की दुआ माँगी थी अब बदलते हुए हालात से डर लगता है दिल तो करता है कि बारिश में नहाएँ 'यासिर' घर जो कच्चा हो तो बरसात से डर लगता है

Yasir Khan

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किसी ने हाल जो पूछा कभी मोहब्बत से लिपट के रोया बहुत देर उस से शिद्दत से हमारा साथ जो छूटा तो इस में हैरत क्या हमारे हाथ तो छूटे हुए थे मुद्दत से ये और बात कि बीनाई जा चुकी मेरी तुम्हारे ख़्वाब रखे हैं मगर हिफ़ाज़त से जब उस ने भीड़ में मुझ को गले लगाया था हर एक आँख मुझे तक रही थी हैरत से ये कारोबार-ए-सियासत बहुत ही अच्छा है बस आप झूट को बेचो बड़ी सदाक़त से

Yasir Khan

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