इश्क़ से जाम से बरसात से डर लगता है यार तुम क्या हो कि हर बात से डर लगता है इश्क़ है इश्क़ कोई खेल नहीं बच्चों का वो चला जाए जिसे मात से डर लगता है मैं तिरे हुस्न का शैदाई नहीं हो सकता रोज़ बँटती हुई ख़ैरात से डर लगता है हम ने हालात बदलने की दुआ माँगी थी अब बदलते हुए हालात से डर लगता है दिल तो करता है कि बारिश में नहाएँ 'यासिर' घर जो कच्चा हो तो बरसात से डर लगता है
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो
Tehzeeb Hafi
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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तुम्हारे काम अगर आए मुस्कुराने में तो कोई हर्ज नहीं मेरे टूट जाने में फ़रोख़्त हो गई हर शय जो दिल मकान में थी मैं इतना ख़र्च हुआ हूँ उसे कमाने में मैं अपनी जान से जाऊँगा है ये सच लेकिन उसे भी ज़ख़्म तो आएँगे आज़माने में वो एक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत न बिन सका मुझ से हज़ार बार मिटा हूँ जिसे बनाने में तुम्हें तो सिर्फ़ ख़बर है चराग़ जलने की हमारे हाथ जले हैं उसे जलाने में तुम्हारे वस्ल की मस्ती थी और मय-ख़ाना शराब ले के गया था शराब-ख़ाने में इमारतों में मोहब्बत का देवता है वो हमारे हाथ कटे हैं जिसे बनाने में
Yasir Khan
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किसी ने हाल जो पूछा कभी मोहब्बत से लिपट के रोया बहुत देर उस से शिद्दत से हमारा साथ जो छूटा तो इस में हैरत क्या हमारे हाथ तो छूटे हुए थे मुद्दत से ये और बात कि बीनाई जा चुकी मेरी तुम्हारे ख़्वाब रखे हैं मगर हिफ़ाज़त से जब उस ने भीड़ में मुझ को गले लगाया था हर एक आँख मुझे तक रही थी हैरत से ये कारोबार-ए-सियासत बहुत ही अच्छा है बस आप झूट को बेचो बड़ी सदाक़त से
Yasir Khan
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आँखों को कुछ ख़्वाब दिखा कर मानेंगे आप हमारे होश उड़ा कर मानेंगे लगता है ये पानी बेचने वाले लोग हर बस्ती में आग लगा कर मानेंगे तुझ को छूने की चाहत में दीवाने शायद अपने हाथ जला कर मानेंगे तय तो ये था पिछली बातें भूलनी हैं आप मगर सब याद दिला कर मानेंगे घर का झगड़ा गर बाहर आ जाएगा बाहर वाले अंदर आ कर मानेंगे चाहे फिर आवाज़ चली जाए लेकिन हम उस को आवाज़ लगा कर मानेंगे घर पक्का करने की बातें करते हैं या'नी वो दीवार उठा कर मानेंगे
Yasir Khan
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जिन को मालूम नहीं होगा दुआ का मतलब वो हमें ख़ाक बताएँगे ख़ुदा का मतलब वो ये कहते हैं मोहब्बत में सज़ा पाओगे और मैं ख़ूब समझता हूँ सज़ा का मतलब या'नी काँटों से मैं ख़ुशबू के मआ'नी पूछूँ या'नी अब आप बताएँगे वफ़ा का मतलब
Yasir Khan
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ज़मीं बनाई गई आसमाँ बनाया गया बराए-इश्क़ ये सारा जहाँ बनाया गया तुम्हारी ना को ही आख़िर में हाँ बनाया गया यक़ीं के चाक पे रख कर गुमाँ बनाया गया तुम उस के पास हो जिस को तुम्हारी चाह न थी कहाँ पे प्यास थी दरिया कहाँ बनाया गया हमारे साथ कोई दो क़दम भी चल न सका किसी के वास्ते इक कारवाँ बनाया गया बदल के देख लो तुम जिस्म चाहे औरों से वहीं पे ठीक है जिस को जहाँ बनाया गया किसी को जब भी ज़रूरत पड़ी सियाही की हमारा जिस्म जला कर धुआँ बनाया गया बस एक मैं ही था बस्ती में बोलने वाला तो सब से पहले मुझे बे-ज़बाँ बनाया गया
Yasir Khan
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