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meri ankhon men tire pyaar ka aansu aae koi khushbu main lagaun tiri khushbu aae vaqt-e-rukhsat kahin taare kahin jugnu aae haar pahnane mujhe phuul se baazu aae main ne din raat khuda se ye dua mangi thi koi aahat na ho dar par mire jab tu aae in dinon aap ka aalam bhi ajab aalam hai tiir khaya hua jaise koi aahu aae us ki baten ki gul-o-lala pe shabnam barse sab ko apnane ka us shokh ko jaadu aae us ne chhu kar mujhe patthar se phir insan kiya muddaton baa'd miri ankhon men aansu aae meri aankhon mein tere pyar ka aansu aae koi khushbu main lagaun teri khushbu aae waqt-e-rukhsat kahin tare kahin jugnu aae haar pahnane mujhe phul se bazu aae main ne din raat khuda se ye dua mangi thi koi aahat na ho dar par mere jab tu aae in dinon aap ka aalam bhi ajab aalam hai tir khaya hua jaise koi aahu aae us ki baaten ki gul-o-lala pe shabnam barse sab ko apnane ka us shokh ko jadu aae us ne chhu kar mujhe patthar se phir insan kiya muddaton ba'd meri aankhon mein aansu aae

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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मान मौसम का कहा छाई घटा जाम उठा आग से आग बुझा फूल खिला जाम उठा पी मिरे यार तुझे अपनी क़सम देता हूँ भूल जा शिकवा गिला हाथ मिला जाम उठा हाथ में चाँद जहाँ आया मुक़द्दर चमका सब बदल जाएगा क़िस्मत का लिखा जाम उठा एक पल भी कभी हो जाता है सदियों जैसा देर क्या करना यहाँ हाथ बढ़ा जाम उठा प्यार ही प्यार है सब लोग बराबर हैं यहाँ मय-कदे में कोई छोटा न बड़ा जाम उठा

Bashir Badr

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मिरी नज़र में ख़ाक तेरे आइने पे गर्द है ये चाँद कितना ज़र्द है ये रात कितनी सर्द है कभी कभी तो यूँँ लगा कि हम सभी मशीन हैं तमाम शहर में न कोई ज़न न कोई मर्द है ख़ुदा की नज़्मों की किताब सारी काएनात है ग़ज़ल के शे'र की तरह हर एक फ़र्द फ़र्द है हयात आज भी कनीज़ है हुज़ूर-ए-जब्र में जो ज़िंदगी को जीत ले वो ज़िंदगी का मर्द है इसे तबर्रुक-ए-हयात कह के पलकों पर रखूँ अगर मुझे यक़ीन हो ये रास्ते की गर्द है वो जिन के ज़िक्र से रगों में दौड़ती थीं बिजलियाँ उन्हीं का हाथ हम ने छू के देखा कितना सर्द है

Bashir Badr

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अगर यक़ीं नहीं आता तो आज़माए मुझे वो आइना है तो फिर आइना दिखाए मुझे अजब चराग़ हूँ दिन रात जलता रहता हूँ मैं थक गया हूँ हवा से कहो बुझाए मुझे मैं जिस की आँख का आँसू था उस ने क़द्र न की बिखर गया हूँ तो अब रेत से उठाए मुझे बहुत दिनों से मैं इन पत्थरों में पत्थर हूँ कोई तो आए ज़रा देर को रुलाये मुझे मैं चाहता हूँ कि तुम ही मुझे इजाज़त दो तुम्हारी तरह से कोई गले लगाए मुझे

Bashir Badr

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ख़ून पत्तों पे जमा हो जैसे फूल का रंग हरा हो जैसे बारहा ये हमें महसूस हुआ दर्द सीने का ख़ुदा हो जैसे यूँँ तरस खा के न पूछो अहवाल तीर सीने पे लगा हो जैसे फूल की आँख में शबनम क्यूँँ है सब हमारी ही ख़ता हो जैसे किर्चें चुभती हैं बहुत सीने में आइना टूट गया हो जैसे सब हमें देखने आते हैं मगर नींद आँखों से ख़फ़ा हो जैसे अब चराग़ों की ज़रूरत भी नहीं चाँद इस दिल में छुपा हो जैसे

Bashir Badr

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चमक रही है परों में उड़ान की ख़ुशबू बुला रही है बहुत आसमान की ख़ुशबू भटक रही है पुरानी दुलाइयाँ ओढ़े हवेलियों में मिरे ख़ानदान की ख़ुशबू सुना के कोई कहानी हमें सुलाती थी दु'आओं जैसी बड़े पान-दान की ख़ुशबू दबा था फूल कोई मेज़-पोश के नीचे गरज रही थी बहुत पेचवान की ख़ुशबू अजब वक़ार था सूखे सुनहरे बालों में उदासियों की चमक ज़र्द लॉन की ख़ुशबू वो इत्र-दान सा लहजा मिरे बुज़ुर्गों का रची-बसी हुई उर्दू ज़बान की ख़ुशबू ग़ज़ल की शाख़ पे इक फूल खिलने वाला है बदन से आने लगी ज़ाफ़रान की ख़ुशबू इमारतों की बुलंदी पे कोई मौसम क्या कहाँ से आ गई कच्चे मकान की ख़ुशबू गुलों पे लिखती हुई ला-इलाहा-इल्लल्लाह पहाड़ियों से उतरती अज़ान की ख़ुशबू

Bashir Badr

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