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mez qalam qirtas daricha sannata kamra khidki zard ujala sannata meri ankhon men dhundlai gahri chup aur chehre par utra piila sannata meri ankhon men likkhi tahrir padho hijr tamanna vahshat sahra sannata guunj uthi hai mere andar khamoshi nas nas men ghut ghut kar bahta sannata us ke saath chali aati thiin qilqaren us ke baad hua hai kitna sannata pahle meri zaat men tha maujud koi ab hai meri zaat ka hissa sannata jhaag udate dariya ke hangame par naqsh hua dil par afsurda sannata main ne ghanton is ummid pe chup sadhi shayad ki vo tod hi dega sannata mil kar bain karen sab meri hijrat par chand udasi jhiil kinara sannata mez qalam qirtas daricha sannata kamra khidki zard ujala sannata meri aankhon mein dhundlai gahri chup aur chehre par utra pila sannata meri aankhon mein likkhi tahrir padho hijr tamanna wahshat sahra sannata gunj uthi hai mere andar khamoshi nas nas mein ghut ghut kar bahta sannata us ke sath chali aati thin qilqaren us ke baad hua hai kitna sannata pahle meri zat mein tha maujud koi ab hai meri zat ka hissa sannata jhag udate dariya ke hangame par naqsh hua dil par afsurda sannata main ne ghanton is ummid pe chup sadhi shayad ki wo tod hi dega sannata mil kar bain karen sab meri hijrat par chand udasi jhil kinara sannata

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जलवे तुझे दिखाएँगे बस इंतिज़ार कर हम कौन हैं बताएँगे बस इंतिज़ार कर जी भर के हम को ख़ून के आँसू रूला तू आज कल हम तुझे रुलाएँगे बस इंतिज़ार कर जब तक क़लम से काम चलेगा चलाएँगे फिर तेग़ भी उठाएँगे बस इंतिज़ार कर ख़ामोश हैं तो गूँगा समझ बैठा है हमें हम शोर भी मचाएँगे बस इंतिज़ार कर मसनद पे तुझ को हम ने बिठाया है ये न भूल हम ही तुझे उठाएँगे बस इंतिज़ार कर

Varun Anand

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नमक की रोज़ मालिश कर रहे हैं हमारे ज़ख़्म वर्ज़िश कर रहे हैं सुनो लोगों को ये शक हो गया है कि हम जीने की साज़िश कर रहे हैं हमारी प्यास को रानी बना लें कई दरिया ये कोशिश कर रहे हैं मिरे सहरा से जो बादल उठे थे किसी दरिया पे बारिश कर रहे हैं ये सब पानी की ख़ाली बोतलें हैं जिन्हें हम नज़्र-ए-आतिश कर रहे हैं अभी चमके नहीं 'ग़ालिब' के जूते अभी नक़्क़ाद पॉलिश कर रहे हैं तिरी तस्वीर, पंखा, मेज़, मफ़लर मिरे कमरे में गर्दिश कर रहे हैं

Fahmi Badayuni

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बड़े तहम्मुल से रफ़्ता रफ़्ता निकालना है बचा है जो तुझ में मेरा हिस्सा निकालना है ये रूह बरसों से दफ़्न है तुम मदद करोगे बदन के मलबे से इस को ज़िंदा निकालना है नज़र में रखना कहीं कोई ग़म-शनास गाहक मुझे सुख़न बेचना है ख़र्चा निकालना है निकाल लाया हूँ एक पिंजरे से इक परिंदा अब इस परिंदे के दिल से पिंजरा निकालना है ये तीस बरसों से कुछ बरस पीछे चल रही है मुझे घड़ी का ख़राब पुर्ज़ा निकालना है ख़याल है ख़ानदान को इत्तिलाअ' दे दूँ जो कट गया उस शजर का शजरा निकालना है मैं एक किरदार से बड़ा तंग हूँ क़लमकार मुझे कहानी में डाल ग़ुस्सा निकालना है

Umair Najmi

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दिगर-गूँ है जहाँ तारों की गर्दिश तेज़ है साक़ी दिल-ए-हर-ज़र्रा में ग़ोग़ा-ए-रुस्ता-ख़े़ज़ है साक़ी मता-ए-दीन-ओ-दानिश लुट गई अल्लाह-वालों की ये किस काफ़िर-अदा का ग़म्ज़ा-ए-ख़ूँ-रेज़ है साक़ी वही देरीना बीमारी वही ना-मोहकमी दिल की इलाज इस का वही आब-ए-नशात-अंगेज़ है साक़ी हरम के दिल में सोज़-ए-आरज़ू पैदा नहीं होता कि पैदाई तिरी अब तक हिजाब-आमेज़ है साक़ी न उट्ठा फिर कोई 'रूमी' अजम के लाला-ज़ारों से वही आब-ओ-गिल-ए-ईराँ वही तबरेज़ है साक़ी नहीं है ना-उमीद 'इक़बाल' अपनी किश्त-ए-वीराँ से ज़रा नम हो तो ये मिट्टी बहुत ज़रख़ेज़ है साक़ी फ़क़ीर-ए-राह को बख़्शे गए असरार-ए-सुल्तानी बहा मेरी नवा की दौलत-ए-परवेज़ है साक़ी

Allama Iqbal

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तेरे वादे को कभी झूट नहीं समझूँगा आज की रात भी दरवाज़ा खुला रक्खूँगा देखने के लिए इक चेहरा बहुत होता है आँख जब तक है तुझे सिर्फ़ तुझे देखूँगा मेरी तन्हाई की रुस्वाई की मंज़िल आई वस्ल के लम्हे से मैं हिज्र की शब बदलूँगा शाम होते ही खुली सड़कों की याद आती है सोचता रोज़ हूँ मैं घर से नहीं निकलूँगा ता-कि महफ़ूज़ रहे मेरे क़लम की हुरमत सच मुझे लिखना है मैं हुस्न को सच लिक्खूँगा

Shahryar

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