ghazalKuch Alfaaz

मुजाहिद की दास्तान है ख़्वाब मेरे उम्र भर की थकान है ख़्वाब मेरे परिंदे तो सभी है पिंजरों में क़ैद पतंगों का आसमान है ख़्वाब मेरे जहाँ सभी मुसाफिर थक हार के पहुंचे जन्नतों का शमशान है ख़्वाब मेरे मैं इस मकाँ से उस मकाँ में दर-ब-दर दीवारों के दरमियान है ख़्वाब मेरे रात भी बदल के सुब्ह हो गई अब तलक वीरान है ख़्वाब मेरे

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा

Hasan Abbasi

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ

Mehshar Afridi

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इसी उलझन में उम्र सारी बसर की ये छाया सूरज की है या शजर की एक दिन मैं अपने घर मेहमान हुआ ताक पर रख दी आवारगी ज़िन्दगी भर की मैं ने हादसों से अपनी झोली भर ली जैसे कमाई हो किसी लंबे सफ़र की कोई इतना मुतमईन कैसे हो सकता है जाम भी ना लिया ज़िन्दगी भी बसर की दिन तो कयामत था गुज़ारा नहीं गया रात तो ज़िन्दगी थी सो बसर की हाँ फसाना तो मैं भूल गया लेकिन कुछ गलियाँ याद है तेरे शहर की

Murli Dhakad

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परिंदे की परवाज सुनाई दी है गगन में कोई आवाज सुनाई दी है ये कांसा टूटा या दिल था किसी का सिक्कों के बिखरने की आवाज सुनाई दी है मैं सोचता था दिल धड़कता तो होगा मुद्दतों बा'द आज आवाज सुनाई दी है मैं जब भी किसी अनजान शहर से गुजरा मुझे एक जानी पहचानी आवाज सुनाई दी है याद तुम्हारी बारहा तो नहीं आई मगर मुझे अक्सर तुम्हारी आवाज सुनाई दी है

Murli Dhakad

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हम सब को इसी हैरत में मर जाना है कि मर के फिर किधर जाना है अच्छा हो गर हो बैचेनी का कोई सबब ये क्या कि पता ही नहीं क्या पाना है मेरे पास रखे हैं बहुत से काग़ज़ के फूल क्या तुम्हारी नजर में कोई बुतख़ाना है एक तो गिला न कर सका बारिशों का और उस पर शौक तो ये है कि नहाना है क्या कभी शाम की आँखों में तुम ने डूबते सूरज के दर्द को पहचाना है

Murli Dhakad

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