इसी उलझन में उम्र सारी बसर की ये छाया सूरज की है या शजर की एक दिन मैं अपने घर मेहमान हुआ ताक पर रख दी आवारगी ज़िन्दगी भर की मैं ने हादसों से अपनी झोली भर ली जैसे कमाई हो किसी लंबे सफ़र की कोई इतना मुतमईन कैसे हो सकता है जाम भी ना लिया ज़िन्दगी भी बसर की दिन तो कयामत था गुज़ारा नहीं गया रात तो ज़िन्दगी थी सो बसर की हाँ फसाना तो मैं भूल गया लेकिन कुछ गलियाँ याद है तेरे शहर की
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी
Ali Zaryoun
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परिंदे की परवाज सुनाई दी है गगन में कोई आवाज सुनाई दी है ये कांसा टूटा या दिल था किसी का सिक्कों के बिखरने की आवाज सुनाई दी है मैं सोचता था दिल धड़कता तो होगा मुद्दतों बा'द आज आवाज सुनाई दी है मैं जब भी किसी अनजान शहर से गुजरा मुझे एक जानी पहचानी आवाज सुनाई दी है याद तुम्हारी बारहा तो नहीं आई मगर मुझे अक्सर तुम्हारी आवाज सुनाई दी है
Murli Dhakad
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मुजाहिद की दास्तान है ख़्वाब मेरे उम्र भर की थकान है ख़्वाब मेरे परिंदे तो सभी है पिंजरों में क़ैद पतंगों का आसमान है ख़्वाब मेरे जहाँ सभी मुसाफिर थक हार के पहुंचे जन्नतों का शमशान है ख़्वाब मेरे मैं इस मकाँ से उस मकाँ में दर-ब-दर दीवारों के दरमियान है ख़्वाब मेरे रात भी बदल के सुब्ह हो गई अब तलक वीरान है ख़्वाब मेरे
Murli Dhakad
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हम सब को इसी हैरत में मर जाना है कि मर के फिर किधर जाना है अच्छा हो गर हो बैचेनी का कोई सबब ये क्या कि पता ही नहीं क्या पाना है मेरे पास रखे हैं बहुत से काग़ज़ के फूल क्या तुम्हारी नजर में कोई बुतख़ाना है एक तो गिला न कर सका बारिशों का और उस पर शौक तो ये है कि नहाना है क्या कभी शाम की आँखों में तुम ने डूबते सूरज के दर्द को पहचाना है
Murli Dhakad
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