मुझे आह-ओ-फ़ुग़ान-ए-नीम-शब का फिर पयाम आया थम ऐ रह-रौ कि शायद फिर कोई मुश्किल मक़ाम आया ज़रा तक़दीर की गहराइयों में डूब जा तू भी कि इस जंगाह से मैं बन के तेग़-ए-बे-नियाम आया ये मिसरा लिख दिया किस शोख़ ने मेहराब-ए-मस्जिद पर ये नादाँ गिर गए सज्दों में जब वक़्त-ए-क़याम आया चल ऐ मेरी ग़रीबी का तमाशा देखने वाले वो महफ़िल उठ गई जिस दम तो मुझ तक दौर-ए-जाम आया दिया 'इक़बाल' ने हिन्दी मुसलमानों को सोज़ अपना ये इक मर्द-ए-तन-आसाँ था तन-आसानों के काम आया उसी 'इक़बाल' की मैं जुस्तुजू करता रहा बरसों बड़ी मुद्दत के बा'द आख़िर वो शाहीं ज़ेर-ए-दाम आया
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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मुझ सेे मत पूछो कि मुझ को और क्या क्या याद है वो मेरे नज़दीक आया था बस इतना याद है यूँँ तो दश्ते-दिल में कितनों ने क़दम रक्खे मगर भूल जाने पर भी एक नक़्श-ए-कफ़-ए-पा याद है उस बदन की घाटियाँ तक नक़्श हैं दिल पर मेरे कोहसारों से समुंदर तक को दरिया याद है मुझ सेे वो काफ़िर मुसलमाँ तो न हो पाया कभी लेकिन उस को वो तरजु में के साथ क़लमा याद है
Tehzeeb Hafi
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अब मजीद उस सेे ये रिश्ता नहीं रखा जाता जिस से इक शख़्स का परदा नहीं रखा जाता एक तो बस में नहीं तुझ से मुहब्बत न करूँ और फिर हाथ भी हल्का नहीं रखा जाता पढ़ने जाता हूँ तो तस्में नहीं बांदे जाते घर पलटता हूँ तो बस्ता नहीं रखा जाता दर-ओ-दीवार पे जंगल का गुमाँ होता है मुझ से अब घर में परिंदा नहीं रखा जाता
Tehzeeb Hafi
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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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दिल सोज़ से ख़ाली है निगह पाक नहीं है फिर इस में अजब क्या कि तू बेबाक नहीं है है ज़ौक़-ए-तजल्ली भी इसी ख़ाक में पिन्हाँ ग़ाफ़िल तू निरा साहिब-ए-इदराक नहीं है वो आँख कि है सुर्मा-ए-अफ़रंग से रौशन पुरकार ओ सुख़न-साज़ है नमनाक नहीं है क्या सूफ़ी ओ मुल्ला को ख़बर मेरे जुनूँ की उन का सर-ए-दामन भी अभी चाक नहीं है कब तक रहे महकूमी-ए-अंजुम में मिरी ख़ाक या मैं नहीं या गर्दिश-ए-अफ़्लाक नहीं है बिजली हूँ नज़र कोह ओ बयाबाँ पे है मेरी मेरे लिए शायाँ ख़स-ओ-ख़ाशाक नहीं है आलम है फ़क़त मोमिन-ए-जाँबाज़ की मीरास मोमिन नहीं जो साहिब-ए-लौलाक नहीं है
Allama Iqbal
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अपनी जौलाँ-गाह ज़ेर-ए-आसमाँ समझा था मैं आब ओ गिल के खेल को अपना जहाँ समझा था मैं बे-हिजाबी से तिरी टूटा निगाहों का तिलिस्म इक रिदा-ए-नील-गूँ को आसमाँ समझा था मैं कारवाँ थक कर फ़ज़ा के पेच-ओ-ख़म में रह गया मेहर ओ माह ओ मुश्तरी को हम-इनाँ समझा था मैं इश्क़ की इक जस्त ने तय कर दिया क़िस्सा तमाम इस ज़मीन ओ आसमाँ को बे-कराँ समझा था मैं कह गईं राज़-ए-मोहब्बत पर्दा-दारी-हा-ए-शौक़ थी फ़ुग़ाँ वो भी जिसे ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ समझा था मैं थी किसी दरमाँदा रह-रौ की सदा-ए-दर्दनाक जिस को आवाज़-ए-रहील-ए-कारवाँ समझा था मैं
Allama Iqbal
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ख़िरद के पास ख़बर के सिवा कुछ और नहीं तिरा इलाज नज़र के सिवा कुछ और नहीं हर इक मक़ाम से आगे मक़ाम है तेरा हयात ज़ौक़-ए-सफ़र के सिवा कुछ और नहीं गिराँ-बहा है तो हिफ़्ज़-ए-ख़ुदी से है वर्ना गुहर में आब-ए-गुहर के सिवा कुछ और नहीं रगों में गर्दिश-ए-ख़ूँ है अगर तो क्या हासिल हयात सोज़-ए-जिगर के सिवा कुछ और नहीं उरूस-ए-लाला मुनासिब नहीं है मुझ से हिजाब कि मैं नसीम-ए-सहर के सिवा कुछ और नहीं जिसे कसाद समझते हैं ताजिरान-ए-फ़रंग वो शय मता-ए-हुनर के सिवा कुछ और नहीं बड़ा करीम है 'इक़बाल'-ए-बे-नवा लेकिन अता-ए-शोला शरर के सिवा कुछ और नहीं
Allama Iqbal
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हर शय मुसाफ़िर हर चीज़ राही क्या चाँद तारे क्या मुर्ग़ ओ माही तू मर्द-ए-मैदाँ तू मीर-ए-लश्कर नूरी हुज़ूरी तेरे सिपाही कुछ क़द्र अपनी तू ने न जानी ये बे-सवादी ये कम-निगाही दुनिया-ए-दूँ की कब तक ग़ुलामी या राहेबी कर या पादशाही पीर-ए-हरम को देखा है मैं ने किरदार-ए-बे-सोज़ गुफ़्तार वाही
Allama Iqbal
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ये पयाम दे गई है मुझे बाद-ए-सुब्ह-गाही कि ख़ुदी के आरिफ़ों का है मक़ाम पादशाही तिरी ज़िंदगी इसी से तिरी आबरू इसी से जो रही ख़ुदी तो शाही न रही तो रू-सियाही न दिया निशान-ए-मंज़िल मुझे ऐ हकीम तू ने मुझे क्या गिला हो तुझ से तू न रह-नशीं न राही मिरे हल्क़ा-ए-सुख़न में अभी ज़ेर-ए-तर्बियत हैं वो गदा कि जानते हैं रह-ओ-रस्म-ए-कज-कुलाही ये मुआमले हैं नाज़ुक जो तिरी रज़ा हो तू कर कि मुझे तो ख़ुश न आया ये तरिक़-ए-ख़ानक़ाही तू हुमा का है शिकारी अभी इब्तिदा है तेरी नहीं मस्लहत से ख़ाली ये जहान-ए-मुर्ग़-ओ-माही तू अरब हो या अजम हो तिरा ला इलाह इल्ला लुग़त-ए-ग़रीब जब तक तिरा दिल न दे गवाही
Allama Iqbal
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