ghazalKuch Alfaaz

मुझ को ये फ़िक्र कब है कि साया कहाँ गया सूरज को रो रहा हूँ ख़ुदाया कहाँ गया फिर आइने में ख़ून दिखाई दिया मुझे आँखों में आ गया तो छुपाया कहाँ गया आवाज़ दे रहा था कोई मुझ को ख़्वाब में लेकिन ख़बर नहीं कि बुलाया कहाँ गया कितने चराग़ घर में जलाए गए न पूछ घर आप जल गया है जलाया कहाँ गया ये भी ख़बर नहीं है कि हमराह कौन है पूछा कहाँ गया है बताया कहाँ गया वो भी बदल गया है मुझे छोड़ने के बा'द मुझ से भी अपने आप में आया कहाँ गया तुझ को गँवा दिया है मगर अपने आप को बर्बाद कर दिया है गँवाया कहाँ गया

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Waseem Barelvi

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मैं ने जो कुछ भी सोचा हुआ है, मैं वो वक़्त आने पे कर जाऊँगा तुम मुझे ज़हर लगते हो और मैं किसी दिन तुम्हें पी के मर जाऊँगा तू तो बीनाई है मेरी तेरे अलावा मुझे कुछ भी दिखता नहीं मैं ने तुझ को अगर तेरे घर पे उतारा तो मैं कैसे घर जाऊँगा चाहता हूँ तुम्हें और बहुत चाहता हूँ, तुम्हें ख़ुद भी मालूम है हाँ अगर मुझ सेे पूछा किसी ने तो मैं सीधा मुँह पर मुकर जाऊँगा तेरे दिल से तेरे शहर से तेरे घर से तेरी आँख से तेरे दर से तेरी गलियों से तेरे वतन से निकाला हुआ हूँ किधर जाऊँगा

Tehzeeb Hafi

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हर्फ़ अपने ही मआ'नी की तरह होता है प्यास का ज़ाइक़ा पानी की तरह होता है मैं भी रुकता हूँ मगर रेग-ए-रवाँ की सूरत मेरा ठहराव रवानी की तरह होता है तेरे जाते ही मैं शिकनों से न भर जाऊँ कहीं क्यूँँ जुदा मुझ से जवानी की तरह होता है जिस्म थकता नहीं चलने से कि वहशत का सफ़र ख़्वाब में नक़्ल-ए-मकानी की तरह होता है चाँद ढलता है तो उस का भी मुझे दुख 'फ़ैसल' किसी गुम-गश्ता निशानी की तरह होता है

Faisal Ajmi

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ये भी नहीं कि दस्त-ए-दुआ तक नहीं गया मेरा सवाल ख़ल्क़-ए-ख़ुदा तक नहीं गया फिर यूँँ हुआ कि हाथ से कश्कोल गिर पड़ा ख़ैरात ले के मुझ से चला तक नहीं गया मस्लूब हो रहा था मगर हँस रहा था मैं आँखों में अश्क ले के ख़ुदा तक नहीं गया जो बर्फ़ गिर रही थी मिरे सर के आस-पास क्या लिख रही थी मुझ से पढ़ा तक नहीं गया 'फ़ैसल' मुकालिमा था हवाओं का फूल से वो शोर था कि मुझ से सुना तक नहीं गया

Faisal Ajmi

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तेरी आँखें न रहीं आईना-ख़ाना मिरे दोस्त कितनी तेज़ी से बदलता है ज़माना मिरे दोस्त जाने किस काम में मसरूफ़ रहा बरसों तक याद आया ही नहीं तुझ को भुलाना मिरे दोस्त पूछना मत कि ये क्या हाल बना रक्खा है आईना बन के मिरा दिल न दुखाना मिरे दोस्त इस मुलाक़ात में जो ग़ैर-ज़रूरी हो जाए याद रहता है किसे हाथ मिलाना मिरे दोस्त देखना मुझ को मगर मेरी पज़ीराई को अपनी आँखों में सितारे न सजाना मिरे दोस्त अब वो तितली है न वो उम्र तआ'क़ुब वाली मैं न कहता था बहुत दूर न जाना मरे दोस्त हिज्र तक़दीर में लिक्खा था कि मजबूरी थी छोड़ इस बात से क्या मिलना मिलाना मिरे दोस्त तू ने एहसान किया अपना बना कर मुझ को वर्ना मैं क्या था हक़ीक़त न फ़साना मिरे दोस्त इस कहानी में किसे कौन कहाँ छोड़ गया याद आ जाए तो मुझ को भी बताना मिरे दोस्त छोड़ आया हूँ हवाओं की निगहबानी में वो समुंदर वो जज़ीरा वो ख़ज़ाना मिरे दोस्त ऐसे रस्तों पे जो आपस में कहीं मिलते हों क्यूँँ न उस मोड़ से हो जाएँ रवाना मिरे दोस्त

Faisal Ajmi

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