हर्फ़ अपने ही मआ'नी की तरह होता है प्यास का ज़ाइक़ा पानी की तरह होता है मैं भी रुकता हूँ मगर रेग-ए-रवाँ की सूरत मेरा ठहराव रवानी की तरह होता है तेरे जाते ही मैं शिकनों से न भर जाऊँ कहीं क्यूँँ जुदा मुझ से जवानी की तरह होता है जिस्म थकता नहीं चलने से कि वहशत का सफ़र ख़्वाब में नक़्ल-ए-मकानी की तरह होता है चाँद ढलता है तो उस का भी मुझे दुख 'फ़ैसल' किसी गुम-गश्ता निशानी की तरह होता है
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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो
Jaun Elia
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
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ये सात आठ पड़ोसी कहाँ से आए मेरे तुम्हारे दिल में तो कोई न था सिवाए मेरे किसी ने पास बिठाया बस आगे याद नहीं मुझे तो दोस्त वहाँ से उठा के लाए मेरे ये सोच कर न किए अपने दर्द उस के सुपुर्द वो लालची है असासे न बेच खाए मेरे इधर किधर तू नया है यहाँ कि पागल है किसी ने क्या तुझे क़िस्से नहीं सुनाए मेरे वो आज़माए मेरे दोस्त को ज़रूर मगर उसे कहो कि तरीके न आज़माए मेरे
Umair Najmi
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चल दिए फेर कर नज़र तुम भी ग़ैर तो ग़ैर थे मगर तुम भी ये गली मेरे दिलरुबा की है दोस्तों ख़ैरियत इधर तुम भी मुझ पे लोगों के साथ हँसते हो लोग रोएँगे ख़ास कर तुम भी मुझ को ठुकरा दिया है दुनिया ने मैं तो मर जाऊँगा अगर तुम भी उस की गाड़ी तो जा चुकी 'ताबिश' अब उठो जाओ अपने घर तुम भी
Zubair Ali Tabish
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मुझ को ये फ़िक्र कब है कि साया कहाँ गया सूरज को रो रहा हूँ ख़ुदाया कहाँ गया फिर आइने में ख़ून दिखाई दिया मुझे आँखों में आ गया तो छुपाया कहाँ गया आवाज़ दे रहा था कोई मुझ को ख़्वाब में लेकिन ख़बर नहीं कि बुलाया कहाँ गया कितने चराग़ घर में जलाए गए न पूछ घर आप जल गया है जलाया कहाँ गया ये भी ख़बर नहीं है कि हमराह कौन है पूछा कहाँ गया है बताया कहाँ गया वो भी बदल गया है मुझे छोड़ने के बा'द मुझ से भी अपने आप में आया कहाँ गया तुझ को गँवा दिया है मगर अपने आप को बर्बाद कर दिया है गँवाया कहाँ गया
Faisal Ajmi
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ये भी नहीं कि दस्त-ए-दुआ तक नहीं गया मेरा सवाल ख़ल्क़-ए-ख़ुदा तक नहीं गया फिर यूँँ हुआ कि हाथ से कश्कोल गिर पड़ा ख़ैरात ले के मुझ से चला तक नहीं गया मस्लूब हो रहा था मगर हँस रहा था मैं आँखों में अश्क ले के ख़ुदा तक नहीं गया जो बर्फ़ गिर रही थी मिरे सर के आस-पास क्या लिख रही थी मुझ से पढ़ा तक नहीं गया 'फ़ैसल' मुकालिमा था हवाओं का फूल से वो शोर था कि मुझ से सुना तक नहीं गया
Faisal Ajmi
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तेरी आँखें न रहीं आईना-ख़ाना मिरे दोस्त कितनी तेज़ी से बदलता है ज़माना मिरे दोस्त जाने किस काम में मसरूफ़ रहा बरसों तक याद आया ही नहीं तुझ को भुलाना मिरे दोस्त पूछना मत कि ये क्या हाल बना रक्खा है आईना बन के मिरा दिल न दुखाना मिरे दोस्त इस मुलाक़ात में जो ग़ैर-ज़रूरी हो जाए याद रहता है किसे हाथ मिलाना मिरे दोस्त देखना मुझ को मगर मेरी पज़ीराई को अपनी आँखों में सितारे न सजाना मिरे दोस्त अब वो तितली है न वो उम्र तआ'क़ुब वाली मैं न कहता था बहुत दूर न जाना मरे दोस्त हिज्र तक़दीर में लिक्खा था कि मजबूरी थी छोड़ इस बात से क्या मिलना मिलाना मिरे दोस्त तू ने एहसान किया अपना बना कर मुझ को वर्ना मैं क्या था हक़ीक़त न फ़साना मिरे दोस्त इस कहानी में किसे कौन कहाँ छोड़ गया याद आ जाए तो मुझ को भी बताना मिरे दोस्त छोड़ आया हूँ हवाओं की निगहबानी में वो समुंदर वो जज़ीरा वो ख़ज़ाना मिरे दोस्त ऐसे रस्तों पे जो आपस में कहीं मिलते हों क्यूँँ न उस मोड़ से हो जाएँ रवाना मिरे दोस्त
Faisal Ajmi
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