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तेरी आँखें न रहीं आईना-ख़ाना मिरे दोस्त कितनी तेज़ी से बदलता है ज़माना मिरे दोस्त जाने किस काम में मसरूफ़ रहा बरसों तक याद आया ही नहीं तुझ को भुलाना मिरे दोस्त पूछना मत कि ये क्या हाल बना रक्खा है आईना बन के मिरा दिल न दुखाना मिरे दोस्त इस मुलाक़ात में जो ग़ैर-ज़रूरी हो जाए याद रहता है किसे हाथ मिलाना मिरे दोस्त देखना मुझ को मगर मेरी पज़ीराई को अपनी आँखों में सितारे न सजाना मिरे दोस्त अब वो तितली है न वो उम्र तआ'क़ुब वाली मैं न कहता था बहुत दूर न जाना मरे दोस्त हिज्र तक़दीर में लिक्खा था कि मजबूरी थी छोड़ इस बात से क्या मिलना मिलाना मिरे दोस्त तू ने एहसान किया अपना बना कर मुझ को वर्ना मैं क्या था हक़ीक़त न फ़साना मिरे दोस्त इस कहानी में किसे कौन कहाँ छोड़ गया याद आ जाए तो मुझ को भी बताना मिरे दोस्त छोड़ आया हूँ हवाओं की निगहबानी में वो समुंदर वो जज़ीरा वो ख़ज़ाना मिरे दोस्त ऐसे रस्तों पे जो आपस में कहीं मिलते हों क्यूँँ न उस मोड़ से हो जाएँ रवाना मिरे दोस्त

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आँख को आइना समझते हो तुम भी सबकी तरह समझते हो दोस्त अब क्यूँ नहीं समझते तुम तुम तो कहते थे ना समझते हो अपना ग़म तुम को कैसे समझाऊँ सब सेे हारा हुआ समझते हो मेरी दुनिया उजड़ गई इस में तुम इसे हादसा समझते हो आख़िरी रास्ता तो बाक़ी है आख़िरी रास्ता समझते हो

Himanshi babra KATIB

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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा

Hasan Abbasi

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मुझ को ये फ़िक्र कब है कि साया कहाँ गया सूरज को रो रहा हूँ ख़ुदाया कहाँ गया फिर आइने में ख़ून दिखाई दिया मुझे आँखों में आ गया तो छुपाया कहाँ गया आवाज़ दे रहा था कोई मुझ को ख़्वाब में लेकिन ख़बर नहीं कि बुलाया कहाँ गया कितने चराग़ घर में जलाए गए न पूछ घर आप जल गया है जलाया कहाँ गया ये भी ख़बर नहीं है कि हमराह कौन है पूछा कहाँ गया है बताया कहाँ गया वो भी बदल गया है मुझे छोड़ने के बा'द मुझ से भी अपने आप में आया कहाँ गया तुझ को गँवा दिया है मगर अपने आप को बर्बाद कर दिया है गँवाया कहाँ गया

Faisal Ajmi

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हर्फ़ अपने ही मआ'नी की तरह होता है प्यास का ज़ाइक़ा पानी की तरह होता है मैं भी रुकता हूँ मगर रेग-ए-रवाँ की सूरत मेरा ठहराव रवानी की तरह होता है तेरे जाते ही मैं शिकनों से न भर जाऊँ कहीं क्यूँँ जुदा मुझ से जवानी की तरह होता है जिस्म थकता नहीं चलने से कि वहशत का सफ़र ख़्वाब में नक़्ल-ए-मकानी की तरह होता है चाँद ढलता है तो उस का भी मुझे दुख 'फ़ैसल' किसी गुम-गश्ता निशानी की तरह होता है

Faisal Ajmi

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ये भी नहीं कि दस्त-ए-दुआ तक नहीं गया मेरा सवाल ख़ल्क़-ए-ख़ुदा तक नहीं गया फिर यूँँ हुआ कि हाथ से कश्कोल गिर पड़ा ख़ैरात ले के मुझ से चला तक नहीं गया मस्लूब हो रहा था मगर हँस रहा था मैं आँखों में अश्क ले के ख़ुदा तक नहीं गया जो बर्फ़ गिर रही थी मिरे सर के आस-पास क्या लिख रही थी मुझ से पढ़ा तक नहीं गया 'फ़ैसल' मुकालिमा था हवाओं का फूल से वो शोर था कि मुझ से सुना तक नहीं गया

Faisal Ajmi

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