ghazalKuch Alfaaz

मुश्किल दिन भी आए लेकिन फ़र्क न आया यारी में हम ने पूरी जान लगाई उस की ताबेदारी में बेईमानी करते तो फिर शायद जीत के आ जाते चाहे हार के वापिस आए खेले अपनी बारी में मीठे मीठे होंठ हिलाए कड़वी कड़वी बातें की कीकर और गुलाब लगाया उस ने एक क्यारी में तेरी जानिब उठने वाली आँखों का रुख़ मोड़ लिया हम ने अपने ऐब दिखाए तेरी पर्दादारी में जाने अब वो किस के साथ निकलता होगा रातों को जाने कौन लगाता होगा दो घंटे तैयारी में

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा

Hasan Abbasi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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मुसीबतें सर-बरहना होंगी अक़ीदतें बे-लिबास होंगी थके हुओं को कहाँ पता था कि सुब्हें यूँँ बद-हवा से होंगी तू देख लेना हमारे बच्चों के बाल जल्दी सफ़ेद होंगे हमारी छोड़ी हुई उदासी से सात नस्लें उदास होंगी कहीं मिलें तुम को भूरी रंगत की गहरी आँखें मुझे बताना मैं जानता हूँ कि ऐसी आँखें बहुत अज़िय्यत-शनास होंगी मैं सर्दियों की ठिठुरती शामों के सर्द लम्हों में सोचता हूँ वो सुर्ख़ हाथों की गर्म पोरें न-जाने अब किस को रास होंगी ये जिस की बेटी के सर की चादर कई जगह से फटी हुई है तुम उस के गाँव में जा के देखो तो आधी फ़स्लें कपास होंगी

Danish Naqvi

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सब लोग कहानी में ही मशरूफ़ रहे थे दरअस्ल अदाकार हक़ीक़त में मरे थे जाते हुए कमरे की किसी चीज़ को छू दे मैं याद करूँँगा कि तेरे हाथ लगे थे आँखें भी तेरी फतह न कर पाए अभी तक किस लम्हा ए बेकार में हम लोग बने थे मैं ने तो कहा था निकल जाते है दोनों उस वक़्त कहानी में सभी लोग नए थे

Danish Naqvi

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आवाज़ की दूरी पे खड़ा सोच रहा हूँ अब कौन मुझे देगा सदा सोच रहा हूँ छोटी सी नज़र आती है अतराफ़ की हर शय इस वक़्त मैं कुछ इतना बड़ा सोच रहा हूँ क्या सोचना था मुझ को तिरे बारे में लेकिन अफ़्सोस तिरे बारे में क्या सोच रहा हूँ तू ने तो मिरे बारे में सोचा भी नहीं है मैं फिर भी कोई अच्छा बुरा सोच रहा हूँ जिस दिन से उठीं मुझ पे तिरी सब्ज़ सी आँखें मैं पेड़ नहीं फिर भी हरा सोच रहा हूँ नुक़सान बहुत से थे गए साल के 'दानिश' लेकिन तिरे बारे में बड़ा सोच रहा हूँ

Danish Naqvi

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तसल्ली कर के ही आवाज़ देना जिसे भी आख़री आवाज़ देना इसी लहजे की फरमाइश है मेरी मुझे बिल्कुल यही आवाज़ देना तुम्हारी सम्त है सारी तवज़्ज़ोह अ गर चाहो कभी आवाज़ देना मुकर जाते हो फिर तुम पूछने पर बुलाना हो तभी आवाज़ देना ये आवाज़ों का फीकापन तो जाए ज़रा रस घोलती आवाज़ देना हमारा हक़ भी है तुम पर यक़ीनन हमें भी ज़िन्दगी आवाज़ देना

Danish Naqvi

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माहौल मुनासिब हो तो ऊपर नहीं जाते हम ताज़ा घुटन छोड़ के छत पर नहीं जाते देखो मुझे अब मेरी जगह से न हिलाना फिर तुम मुझे तरतीब से रख कर नहीं जाते बदनाम हैं सदियों से ही काँटों की वजह से आदत से मगर आज भी कीकर नहीं जाते जिस दिन से शिकारी ने अदा की कोई मन्नत दरबार पे उस दिन से कबूतर नहीं जाते सो तुम मुझे हैरत-ज़दा आँखों से न देखो कुछ लोग सँभल जाते हैं सब मर नहीं जाते

Danish Naqvi

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