मुश्किल दिन भी आए लेकिन फ़र्क न आया यारी में हम ने पूरी जान लगाई उस की ताबेदारी में बेईमानी करते तो फिर शायद जीत के आ जाते चाहे हार के वापिस आए खेले अपनी बारी में मीठे मीठे होंठ हिलाए कड़वी कड़वी बातें की कीकर और गुलाब लगाया उस ने एक क्यारी में तेरी जानिब उठने वाली आँखों का रुख़ मोड़ लिया हम ने अपने ऐब दिखाए तेरी पर्दादारी में जाने अब वो किस के साथ निकलता होगा रातों को जाने कौन लगाता होगा दो घंटे तैयारी में
Related Ghazal
क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
371 likes
ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
355 likes
मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
456 likes
तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
235 likes
ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
232 likes
More from Danish Naqvi
मुसीबतें सर-बरहना होंगी अक़ीदतें बे-लिबास होंगी थके हुओं को कहाँ पता था कि सुब्हें यूँँ बद-हवा से होंगी तू देख लेना हमारे बच्चों के बाल जल्दी सफ़ेद होंगे हमारी छोड़ी हुई उदासी से सात नस्लें उदास होंगी कहीं मिलें तुम को भूरी रंगत की गहरी आँखें मुझे बताना मैं जानता हूँ कि ऐसी आँखें बहुत अज़िय्यत-शनास होंगी मैं सर्दियों की ठिठुरती शामों के सर्द लम्हों में सोचता हूँ वो सुर्ख़ हाथों की गर्म पोरें न-जाने अब किस को रास होंगी ये जिस की बेटी के सर की चादर कई जगह से फटी हुई है तुम उस के गाँव में जा के देखो तो आधी फ़स्लें कपास होंगी
Danish Naqvi
4 likes
सब लोग कहानी में ही मशरूफ़ रहे थे दरअस्ल अदाकार हक़ीक़त में मरे थे जाते हुए कमरे की किसी चीज़ को छू दे मैं याद करूँँगा कि तेरे हाथ लगे थे आँखें भी तेरी फतह न कर पाए अभी तक किस लम्हा ए बेकार में हम लोग बने थे मैं ने तो कहा था निकल जाते है दोनों उस वक़्त कहानी में सभी लोग नए थे
Danish Naqvi
6 likes
आवाज़ की दूरी पे खड़ा सोच रहा हूँ अब कौन मुझे देगा सदा सोच रहा हूँ छोटी सी नज़र आती है अतराफ़ की हर शय इस वक़्त मैं कुछ इतना बड़ा सोच रहा हूँ क्या सोचना था मुझ को तिरे बारे में लेकिन अफ़्सोस तिरे बारे में क्या सोच रहा हूँ तू ने तो मिरे बारे में सोचा भी नहीं है मैं फिर भी कोई अच्छा बुरा सोच रहा हूँ जिस दिन से उठीं मुझ पे तिरी सब्ज़ सी आँखें मैं पेड़ नहीं फिर भी हरा सोच रहा हूँ नुक़सान बहुत से थे गए साल के 'दानिश' लेकिन तिरे बारे में बड़ा सोच रहा हूँ
Danish Naqvi
3 likes
तसल्ली कर के ही आवाज़ देना जिसे भी आख़री आवाज़ देना इसी लहजे की फरमाइश है मेरी मुझे बिल्कुल यही आवाज़ देना तुम्हारी सम्त है सारी तवज़्ज़ोह अ गर चाहो कभी आवाज़ देना मुकर जाते हो फिर तुम पूछने पर बुलाना हो तभी आवाज़ देना ये आवाज़ों का फीकापन तो जाए ज़रा रस घोलती आवाज़ देना हमारा हक़ भी है तुम पर यक़ीनन हमें भी ज़िन्दगी आवाज़ देना
Danish Naqvi
2 likes
माहौल मुनासिब हो तो ऊपर नहीं जाते हम ताज़ा घुटन छोड़ के छत पर नहीं जाते देखो मुझे अब मेरी जगह से न हिलाना फिर तुम मुझे तरतीब से रख कर नहीं जाते बदनाम हैं सदियों से ही काँटों की वजह से आदत से मगर आज भी कीकर नहीं जाते जिस दिन से शिकारी ने अदा की कोई मन्नत दरबार पे उस दिन से कबूतर नहीं जाते सो तुम मुझे हैरत-ज़दा आँखों से न देखो कुछ लोग सँभल जाते हैं सब मर नहीं जाते
Danish Naqvi
9 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Danish Naqvi.
Similar Moods
More moods that pair well with Danish Naqvi's ghazal.







