ghazalKuch Alfaaz

माहौल मुनासिब हो तो ऊपर नहीं जाते हम ताज़ा घुटन छोड़ के छत पर नहीं जाते देखो मुझे अब मेरी जगह से न हिलाना फिर तुम मुझे तरतीब से रख कर नहीं जाते बदनाम हैं सदियों से ही काँटों की वजह से आदत से मगर आज भी कीकर नहीं जाते जिस दिन से शिकारी ने अदा की कोई मन्नत दरबार पे उस दिन से कबूतर नहीं जाते सो तुम मुझे हैरत-ज़दा आँखों से न देखो कुछ लोग सँभल जाते हैं सब मर नहीं जाते

Related Ghazal

ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

292 likes

बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

196 likes

उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Waseem Barelvi

107 likes

जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो

Tehzeeb Hafi

268 likes

चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

105 likes

More from Danish Naqvi

सब लोग कहानी में ही मशरूफ़ रहे थे दरअस्ल अदाकार हक़ीक़त में मरे थे जाते हुए कमरे की किसी चीज़ को छू दे मैं याद करूँँगा कि तेरे हाथ लगे थे आँखें भी तेरी फतह न कर पाए अभी तक किस लम्हा ए बेकार में हम लोग बने थे मैं ने तो कहा था निकल जाते है दोनों उस वक़्त कहानी में सभी लोग नए थे

Danish Naqvi

6 likes

मुश्किल दिन भी आए लेकिन फ़र्क न आया यारी में हम ने पूरी जान लगाई उस की ताबेदारी में बेईमानी करते तो फिर शायद जीत के आ जाते चाहे हार के वापिस आए खेले अपनी बारी में मीठे मीठे होंठ हिलाए कड़वी कड़वी बातें की कीकर और गुलाब लगाया उस ने एक क्यारी में तेरी जानिब उठने वाली आँखों का रुख़ मोड़ लिया हम ने अपने ऐब दिखाए तेरी पर्दादारी में जाने अब वो किस के साथ निकलता होगा रातों को जाने कौन लगाता होगा दो घंटे तैयारी में

Danish Naqvi

9 likes

मुसीबतें सर-बरहना होंगी अक़ीदतें बे-लिबास होंगी थके हुओं को कहाँ पता था कि सुब्हें यूँँ बद-हवा से होंगी तू देख लेना हमारे बच्चों के बाल जल्दी सफ़ेद होंगे हमारी छोड़ी हुई उदासी से सात नस्लें उदास होंगी कहीं मिलें तुम को भूरी रंगत की गहरी आँखें मुझे बताना मैं जानता हूँ कि ऐसी आँखें बहुत अज़िय्यत-शनास होंगी मैं सर्दियों की ठिठुरती शामों के सर्द लम्हों में सोचता हूँ वो सुर्ख़ हाथों की गर्म पोरें न-जाने अब किस को रास होंगी ये जिस की बेटी के सर की चादर कई जगह से फटी हुई है तुम उस के गाँव में जा के देखो तो आधी फ़स्लें कपास होंगी

Danish Naqvi

4 likes

आवाज़ की दूरी पे खड़ा सोच रहा हूँ अब कौन मुझे देगा सदा सोच रहा हूँ छोटी सी नज़र आती है अतराफ़ की हर शय इस वक़्त मैं कुछ इतना बड़ा सोच रहा हूँ क्या सोचना था मुझ को तिरे बारे में लेकिन अफ़्सोस तिरे बारे में क्या सोच रहा हूँ तू ने तो मिरे बारे में सोचा भी नहीं है मैं फिर भी कोई अच्छा बुरा सोच रहा हूँ जिस दिन से उठीं मुझ पे तिरी सब्ज़ सी आँखें मैं पेड़ नहीं फिर भी हरा सोच रहा हूँ नुक़सान बहुत से थे गए साल के 'दानिश' लेकिन तिरे बारे में बड़ा सोच रहा हूँ

Danish Naqvi

3 likes

तसल्ली कर के ही आवाज़ देना जिसे भी आख़री आवाज़ देना इसी लहजे की फरमाइश है मेरी मुझे बिल्कुल यही आवाज़ देना तुम्हारी सम्त है सारी तवज़्ज़ोह अ गर चाहो कभी आवाज़ देना मुकर जाते हो फिर तुम पूछने पर बुलाना हो तभी आवाज़ देना ये आवाज़ों का फीकापन तो जाए ज़रा रस घोलती आवाज़ देना हमारा हक़ भी है तुम पर यक़ीनन हमें भी ज़िन्दगी आवाज़ देना

Danish Naqvi

2 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Danish Naqvi.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Danish Naqvi's ghazal.