ghazalKuch Alfaaz

मुसीबतें सर-बरहना होंगी अक़ीदतें बे-लिबास होंगी थके हुओं को कहाँ पता था कि सुब्हें यूँँ बद-हवा से होंगी तू देख लेना हमारे बच्चों के बाल जल्दी सफ़ेद होंगे हमारी छोड़ी हुई उदासी से सात नस्लें उदास होंगी कहीं मिलें तुम को भूरी रंगत की गहरी आँखें मुझे बताना मैं जानता हूँ कि ऐसी आँखें बहुत अज़िय्यत-शनास होंगी मैं सर्दियों की ठिठुरती शामों के सर्द लम्हों में सोचता हूँ वो सुर्ख़ हाथों की गर्म पोरें न-जाने अब किस को रास होंगी ये जिस की बेटी के सर की चादर कई जगह से फटी हुई है तुम उस के गाँव में जा के देखो तो आधी फ़स्लें कपास होंगी

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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Waseem Barelvi

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ज़िन्दगी में इश्क़ का अधूरापन भी झूठा है मेहबूब के ना होने का सूनापन भी झूठा है गर जो हो जाता है भूले से भी दीदार उस का उसे देख लेने का उतावलापन भी झूठा है महफ़िल में भी खोए रहते हो उस की यादों में यार की यादों का ये अकेलापन भी झूठा है मोहब्बत की ख़ातिर कैसे पागल से फिरते हैं ये आशिकों के प्यार का आवारापन भी झूठा है कुछ मजबूरियाँ रहीं होंगी उस की जो चला गया उस सेे नफ़रत करने का ये दिखावापन भी झूठा है कभी जो फ़ुर्सत मिले तो ख़ुद से भी मिल लेना समझ जाओगे "निहार", ये दीवानापन भी झूठा है

Shashank Tripathi

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फिरे राह से वो यहाँ आते आते अजल मर रही तू कहाँ आते आते न जाना कि दुनिया से जाता है कोई बहुत देर की मेहरबाँ आते आते सुना है कि आता है सर नामा-बर का कहाँ रह गया अरमुग़ाँ आते आते यक़ीं है कि हो जाए आख़िर को सच्ची मिरे मुँह में तेरी ज़बाँ आते आते सुनाने के क़ाबिल जो थी बात उन को वही रह गई दरमियाँ आते आते मुझे याद करने से ये मुद्दआ' था निकल जाए दम हिचकियाँ आते आते अभी सिन ही क्या है जो बेबाकियाँ हों उन्हें आएँगी शोख़ियाँ आते आते कलेजा मिरे मुँह को आएगा इक दिन यूँँही लब पर आह-ओ-फ़ुग़ाँ आते आते चले आते हैं दिल में अरमान लाखों मकाँ भर गया मेहमाँ आते आते नतीजा न निकला थके सब पयामी वहाँ जाते जाते यहाँ आते आते तुम्हारा ही मुश्ताक़-ए-दीदार होगा गया जान से इक जवाँ आते आते तिरी आँख फिरते ही कैसा फिरा है मिरी राह पर आसमाँ आते आते पड़ा है बड़ा पेच फिर दिल-लगी में तबीअत रुकी है जहाँ आते आते मिरे आशियाँ के तो थे चार तिनके चमन उड़ गया आँधियाँ आते आते किसी ने कुछ उन को उभारा तो होता न आते न आते यहाँ आते आते क़यामत भी आती थी हमराह उस के मगर रह गई हम-इनाँ आते आते बना है हमेशा ये दिल बाग़ ओ सहरा बहार आते आते ख़िज़ाँ आते आते नहीं खेल ऐ 'दाग़' यारों से कह दो कि आती है उर्दू ज़बाँ आते आते

Dagh Dehlvi

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ये लौह-ए-इश्क़ पे लिखा है तेरे शहर के लोग वफ़ा से जीत भी जाएँ तो हार जाएँगे वो जिन के हाथ में काग़ज़ की कश्तियाँ होंगी सुना है चंद वही लोग पार जाएँगे किताब-ए-ज़र्फ़-ए-मोहब्बत पे हाथ रख के कहो सवाल जान का आया तो वार जाएँगे

Khalil Ur Rehman Qamar

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गर्दिश में है ज़मीन भी क्या आसमाँ के साथ दुनिया बदल गई निगह-ए-मेहरबाँ के साथ दोहराना अंजुमन में समझ सोच के उसे तेरी भी दास्ताँ है मिरी दास्ताँ के साथ अब मैं हूँ और कुंज-ए-क़फ़स की मुसीबतें वो आशियाँ की बात गई आशियाँ के साथ बेताबियों से रब्त था बेचैनियों से काम गुज़रे हैं ऐसे दिन भी उस आराम-जाँ के साथ रोज़-ए-अज़ल वही तो फ़क़त मुस्तहिक़ न था कुछ गर्दिशें हमें भी मिलीं आसमाँ के साथ ग़म को तिरे भुला न सका दो-जहाँ का ग़म तेरा भी ग़म रहा है ग़म-ए-दो-जहाँ के साथ उम्मीद ही नहीं तो गुज़र जाएगी यूँँही इक मेहरबाँ के साथ कि ना-मेहरबाँ के साथ ये सोज़-ओ-साज़-ए-इश्क़ ग़म-ए-जावेदाँ सही दे उम्र-ए-जावेदाँ भी ग़म-ए-जावेदाँ के साथ मंज़िल का क्या यक़ीं हो बताए कोई मुझे जब रहगुज़ार भी है रवाँ कारवाँ के साथ

Baldev Raaj

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मुश्किल दिन भी आए लेकिन फ़र्क न आया यारी में हम ने पूरी जान लगाई उस की ताबेदारी में बेईमानी करते तो फिर शायद जीत के आ जाते चाहे हार के वापिस आए खेले अपनी बारी में मीठे मीठे होंठ हिलाए कड़वी कड़वी बातें की कीकर और गुलाब लगाया उस ने एक क्यारी में तेरी जानिब उठने वाली आँखों का रुख़ मोड़ लिया हम ने अपने ऐब दिखाए तेरी पर्दादारी में जाने अब वो किस के साथ निकलता होगा रातों को जाने कौन लगाता होगा दो घंटे तैयारी में

Danish Naqvi

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सब लोग कहानी में ही मशरूफ़ रहे थे दरअस्ल अदाकार हक़ीक़त में मरे थे जाते हुए कमरे की किसी चीज़ को छू दे मैं याद करूँँगा कि तेरे हाथ लगे थे आँखें भी तेरी फतह न कर पाए अभी तक किस लम्हा ए बेकार में हम लोग बने थे मैं ने तो कहा था निकल जाते है दोनों उस वक़्त कहानी में सभी लोग नए थे

Danish Naqvi

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माहौल मुनासिब हो तो ऊपर नहीं जाते हम ताज़ा घुटन छोड़ के छत पर नहीं जाते देखो मुझे अब मेरी जगह से न हिलाना फिर तुम मुझे तरतीब से रख कर नहीं जाते बदनाम हैं सदियों से ही काँटों की वजह से आदत से मगर आज भी कीकर नहीं जाते जिस दिन से शिकारी ने अदा की कोई मन्नत दरबार पे उस दिन से कबूतर नहीं जाते सो तुम मुझे हैरत-ज़दा आँखों से न देखो कुछ लोग सँभल जाते हैं सब मर नहीं जाते

Danish Naqvi

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तसल्ली कर के ही आवाज़ देना जिसे भी आख़री आवाज़ देना इसी लहजे की फरमाइश है मेरी मुझे बिल्कुल यही आवाज़ देना तुम्हारी सम्त है सारी तवज़्ज़ोह अ गर चाहो कभी आवाज़ देना मुकर जाते हो फिर तुम पूछने पर बुलाना हो तभी आवाज़ देना ये आवाज़ों का फीकापन तो जाए ज़रा रस घोलती आवाज़ देना हमारा हक़ भी है तुम पर यक़ीनन हमें भी ज़िन्दगी आवाज़ देना

Danish Naqvi

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आवाज़ की दूरी पे खड़ा सोच रहा हूँ अब कौन मुझे देगा सदा सोच रहा हूँ छोटी सी नज़र आती है अतराफ़ की हर शय इस वक़्त मैं कुछ इतना बड़ा सोच रहा हूँ क्या सोचना था मुझ को तिरे बारे में लेकिन अफ़्सोस तिरे बारे में क्या सोच रहा हूँ तू ने तो मिरे बारे में सोचा भी नहीं है मैं फिर भी कोई अच्छा बुरा सोच रहा हूँ जिस दिन से उठीं मुझ पे तिरी सब्ज़ सी आँखें मैं पेड़ नहीं फिर भी हरा सोच रहा हूँ नुक़सान बहुत से थे गए साल के 'दानिश' लेकिन तिरे बारे में बड़ा सोच रहा हूँ

Danish Naqvi

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