ghazalKuch Alfaaz

फिरे राह से वो यहाँ आते आते अजल मर रही तू कहाँ आते आते न जाना कि दुनिया से जाता है कोई बहुत देर की मेहरबाँ आते आते सुना है कि आता है सर नामा-बर का कहाँ रह गया अरमुग़ाँ आते आते यक़ीं है कि हो जाए आख़िर को सच्ची मिरे मुँह में तेरी ज़बाँ आते आते सुनाने के क़ाबिल जो थी बात उन को वही रह गई दरमियाँ आते आते मुझे याद करने से ये मुद्दआ' था निकल जाए दम हिचकियाँ आते आते अभी सिन ही क्या है जो बेबाकियाँ हों उन्हें आएँगी शोख़ियाँ आते आते कलेजा मिरे मुँह को आएगा इक दिन यूँँही लब पर आह-ओ-फ़ुग़ाँ आते आते चले आते हैं दिल में अरमान लाखों मकाँ भर गया मेहमाँ आते आते नतीजा न निकला थके सब पयामी वहाँ जाते जाते यहाँ आते आते तुम्हारा ही मुश्ताक़-ए-दीदार होगा गया जान से इक जवाँ आते आते तिरी आँख फिरते ही कैसा फिरा है मिरी राह पर आसमाँ आते आते पड़ा है बड़ा पेच फिर दिल-लगी में तबीअत रुकी है जहाँ आते आते मिरे आशियाँ के तो थे चार तिनके चमन उड़ गया आँधियाँ आते आते किसी ने कुछ उन को उभारा तो होता न आते न आते यहाँ आते आते क़यामत भी आती थी हमराह उस के मगर रह गई हम-इनाँ आते आते बना है हमेशा ये दिल बाग़ ओ सहरा बहार आते आते ख़िज़ाँ आते आते नहीं खेल ऐ 'दाग़' यारों से कह दो कि आती है उर्दू ज़बाँ आते आते

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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बरसों पुराना दोस्त मिला जैसे ग़ैर हो देखा रुका झिझक के कहा तुम उमैर हो मिलते हैं मुश्किलों से यहाँ हम-ख़याल लोग तेरे तमाम चाहने वालों की ख़ैर हो कमरे में सिगरेटों का धुआँ और तेरी महक जैसे शदीद धुंध में बाग़ों की सैर हो हम मुत्मइन बहुत हैं अगर ख़ुश नहीं भी हैं तुम ख़ुश हो क्या हुआ जो हमारे बग़ैर हो पैरों में उस के सर को धरें इल्तिजा करें इक इल्तिजा कि जिस का न सर हो न पैर हो

Umair Najmi

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ये सात आठ पड़ोसी कहाँ से आए मेरे तुम्हारे दिल में तो कोई न था सिवाए मेरे किसी ने पास बिठाया बस आगे याद नहीं मुझे तो दोस्त वहाँ से उठा के लाए मेरे ये सोच कर न किए अपने दर्द उस के सुपुर्द वो लालची है असासे न बेच खाए मेरे इधर किधर तू नया है यहाँ कि पागल है किसी ने क्या तुझे क़िस्से नहीं सुनाए मेरे वो आज़माए मेरे दोस्त को ज़रूर मगर उसे कहो कि तरीके न आज़माए मेरे

Umair Najmi

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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

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ख़ातिर से या लिहाज़ से मैं मान तो गया झूटी क़सम से आप का ईमान तो गया दिल ले के मुफ़्त कहते हैं कुछ काम का नहीं उल्टी शिकायतें हुईं एहसान तो गया डरता हूँ देख कर दिल-ए-बे-आरज़ू को मैं सुनसान घर ये क्यूँँ न हो मेहमान तो गया क्या आए राहत आई जो कुंज-ए-मज़ार में वो वलवला वो शौक़ वो अरमान तो गया देखा है बुत-कदे में जो ऐ शैख़ कुछ न पूछ ईमान की तो ये है कि ईमान तो गया इफ़्शा-ए-राज़-ए-इश्क़ में गो ज़िल्लतें हुईं लेकिन उसे जता तो दिया जान तो गया गो नामा-बर से ख़ुश न हुआ पर हज़ार शुक्र मुझ को वो मेरे नाम से पहचान तो गया बज़्म-ए-अदू में सूरत-ए-परवाना दिल मिरा गो रश्क से जला तिरे क़ुर्बान तो गया होश ओ हवा से ओ ताब ओ तवाँ 'दाग़' जा चुके अब हम भी जाने वाले हैं सामान तो गया

Dagh Dehlvi

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रंज की जब गुफ़्तुगू होने लगी आप से तुम तुम से तू होने लगी चाहिए पैग़ाम-बर दोनों तरफ़ लुत्फ़ क्या जब दू-ब-दू होने लगी मेरी रुस्वाई की नौबत आ गई उन की शोहरत कू-ब-कू होने लगी है तिरी तस्वीर कितनी बे-हिजाब हर किसी के रू-ब-रू होने लगी ग़ैर के होते भला ऐ शाम-ए-वस्ल क्यूँँ हमारे रू-ब-रू होने लगी ना-उम्मीदी बढ़ गई है इस क़दर आरज़ू की आरज़ू होने लगी अब के मिल कर देखिए क्या रंग हो फिर हमारी जुस्तुजू होने लगी 'दाग़' इतराए हुए फिरते हैं आज शायद उन की आबरू होने लगी

Dagh Dehlvi

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बाक़ी जहाँ में क़ैस न फ़रहाद रह गया अफ़्साना आशिक़ों का फ़क़त याद रह गया ये सख़्त-जाँ तो क़त्ल से नाशाद रह गया ख़ंजर चला तो बाज़ू-ए-जल्लाद रह गया पाबंदियों ने इश्क़ की बेकस रखा मुझे मैं सौ असीरियों में भी आज़ाद रह गया चश्म-ए-सनम ने यूँँ तो बिगाड़े हज़ार घर इक का'बा चंद रोज़ को आबाद रह गया महशर में जा-ए-शिकवा किया शुक्र यार का जो भूलना था मुझ को वही याद रह गया उन की तो बन पड़ी कि लगी जान मुफ़्त हाथ तेरी गिरह में क्या दिल-ए-नाशाद रह गया पुर-नूर हो रहेगा ये ज़ुल्मत-कदा अगर दिल में बुतों का शौक़-ए-ख़ुदा-दाद रह गया यूँँ आँख उन की कर के इशारा पलट गई गोया कि लब से हो के कुछ इरशाद रह गया नासेह का जी चला था हमारी तरह मगर उल्फ़त की देख देख के उफ़्ताद रह गया हैं तेरे दिल में सब के ठिकाने बुरे भले मैं ख़ानुमाँ-ख़राब ही बर्बाद रह गया वो दिन गए कि थी मिरे सीने में कुछ ख़राश अब दिल कहाँ है दिल का निशाँ याद रह गया सूरत को तेरी देख के खिंचती है जान-ए-ख़ल्क़ दिल अपना थाम थाम के बहज़ाद रह गया ऐ 'दाग़' दिल ही दिल में घुले ज़ब्त-ए-इश्क़ से अफ़्सोस शौक़-ए-नाला-ओ-फ़रियाद रह गया

Dagh Dehlvi

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इन आँखों ने क्या क्या तमाशा न देखा हक़ीक़त में जो देखना था न देखा तुझे देख कर वो दुई उठ गई है कि अपना भी सानी न देखा न देखा उन आँखों के क़ुर्बान जाऊँ जिन्हों ने हज़ारों हिजाबों में परवाना देखा न हिम्मत न क़िस्मत न दिल है न आँखें न ढूँडा न पाया न समझा न देखा मरीज़ान-ए-उल्फ़त की क्या बे-कसी है मसीहा को भी चारा-फ़रमा न देखा बहुत दर्द-मंदों को देखा है तू ने ये सीना ये दिल ये कलेजा न देखा वो कब देख सकता है उस की तजल्ली जिस इंसान ने अपना ही जल्वा न देखा बहुत शोर सुनते थे इस अंजुमन का यहाँ आ के जो कुछ सुना था न देखा सफ़ाई है बाग़-ए-मोहब्बत में ऐसी कि बाद-ए-सबा ने भी तिनका न देखा उसे देख कर और को फिर जो देखे कोई देखने वाला ऐसा न देखा वो था जल्वा-आरा मगर तू ने मूसा न देखा न देखा न देखा न देखा गया कारवाँ छोड़ कर मुझ को तन्हा ज़रा मेरे आने का रस्ता न देखा कहाँ नक़्श-ए-अव्वल कहाँ नक़्श-ए-सानी ख़ुदा की ख़ुदाई में तुझ सा न देखा तिरी याद है या है तेरा तसव्वुर कभी 'दाग़' को हम ने तन्हा न देखा

Dagh Dehlvi

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ग़ैर को मुँह लगा के देख लिया झूट सच आज़मा के देख लिया उन के घर 'दाग़' जा के देख लिया दिल के कहने में आ के देख लिया कितनी फ़रहत-फ़ज़ा थी बू-ए-वफ़ा उस ने दिल को जला के देख लिया कभी ग़श में रहा शब-ए-वा'दा कभी गर्दन उठा के देख लिया जिंस-ए-दिल है ये वो नहीं सौदा हर जगह से मँगा के देख लिया लोग कहते हैं चुप लगी है तुझे हाल-ए-दिल भी सुना के देख लिया जाओ भी क्या करोगे मेहर-ओ-वफ़ा बार-हा आज़मा के देख लिया ज़ख़्म-ए-दिल में नहीं है क़तरा-ए-ख़ूँ ख़ूब हम ने दिखा के देख लिया इधर आईना है उधर दिल है जिस को चाहा उठा के देख लिया उन को ख़ल्वत-सरा में बे-पर्दा साफ़ मैदान पा के देख लिया उस ने सुब्ह-ए-शब-ए-विसाल मुझे जाते जाते भी आ के देख लिया तुम को है वस्ल-ए-ग़ैर से इनकार और जो हम ने आ के देख लिया 'दाग़' ने ख़ूब आशिक़ी का मज़ा जल के देखा जला के देख लिया

Dagh Dehlvi

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