तसल्ली कर के ही आवाज़ देना जिसे भी आख़री आवाज़ देना इसी लहजे की फरमाइश है मेरी मुझे बिल्कुल यही आवाज़ देना तुम्हारी सम्त है सारी तवज़्ज़ोह अ गर चाहो कभी आवाज़ देना मुकर जाते हो फिर तुम पूछने पर बुलाना हो तभी आवाज़ देना ये आवाज़ों का फीकापन तो जाए ज़रा रस घोलती आवाज़ देना हमारा हक़ भी है तुम पर यक़ीनन हमें भी ज़िन्दगी आवाज़ देना
Related Ghazal
सफ़र से लौट जाना चाहता है परिंदा आशियाना चाहता है कोई स्कूल की घंटी बजा दे ये बच्चा मुस्कुराना चाहता है उसे रिश्ते थमा देती है दुनिया जो दो पैसे कमाना चाहता है यहाँ साँसों के लाले पड़ रहे हैं वो पागल ज़हर खाना चाहता है जिसे भी डूबना हो डूब जाए समुंदर सूख जाना चाहता है हमारा हक़ दबा रक्खा है जिस ने सुना है हज को जाना चाहता है
Shakeel Jamali
19 likes
ख़ुशबू की तरह आया वो तेज़ हवाओं में माँगा था जिसे हम ने दिन रात दु'आओं में तुम छत पे नहीं आए मैं घर से नहीं निकला ये चाँद बहुत भटका सावन की घटाओं में इस शहर में इक लड़की बिल्कुल है ग़ज़ल जैसी बिजली सी घटाओं में ख़ुशबू सी अदाओं में मौसम का इशारा है ख़ुश रहने दो बच्चों को मासूम मोहब्बत है फूलों की ख़ताओं में हम चाँद सितारों की राहों के मुसाफ़िर हैं हम रात चमकते हैं तारीक ख़लाओं में भगवान ही भेजेंगे चावल से भरी थाली मज़लूम परिंदों की मासूम सभाओं में दादा बड़े भोले थे सब से यही कहते थे कुछ ज़हर भी होता है अंग्रेज़ी दवाओं में
Bashir Badr
19 likes
डर है घर में कैसे बोला जाएगा छोड़ो जो भी होगा देखा जाएगा नंबर लिखकर हाथों में पकड़ा देना तेरे घर इक छोटा बच्चा जाएगा मैं बस उस का चेहरा पढ़ कर जाऊँगा मेरा पेपर सब सेे अच्छा जाएगा
Vishal Singh Tabish
33 likes
हिज्र में ख़ुद को तसल्ली दी, कहा कुछ भी नहीं दिल मगर हँसने लगा, आया बड़ा कुछ भी नहीं हम अगर सब्र में रहते हैं तो क्या कुछ भी नहीं जाने वालो! कभी आ देखो, बचा कुछ भी नहीं बे-दिली यूँँ ही कि रब कोई मसीहा भेजे हम मसीहा से भी कह देंगे, ओ जा! कुछ भी नहीं देखे बिन इश्क़ हुआ, देखे बिना दूर हुए इतना कुछ हो भी गया और हुआ कुछ भी नहीं सस्ते आबिद न बनें, लत को इबादत न कहें आशिक़ी लज़्ज़त-ओ-ज़िल्लत के सिवा कुछ भी नहीं मैं तेरे बा'द मुसल्ली पे बहुत रोता रहा और कहा, यार ख़ुदा! ख़ैर भला कुछ भी नहीं इश्क़ मरदाना तबीअत नहीं रखता 'अफ़कार'! वरना ये हुस्न-ओ-जमाल और अदा कुछ भी नहीं
Afkar Alvi
26 likes
कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
435 likes
More from Danish Naqvi
मुश्किल दिन भी आए लेकिन फ़र्क न आया यारी में हम ने पूरी जान लगाई उस की ताबेदारी में बेईमानी करते तो फिर शायद जीत के आ जाते चाहे हार के वापिस आए खेले अपनी बारी में मीठे मीठे होंठ हिलाए कड़वी कड़वी बातें की कीकर और गुलाब लगाया उस ने एक क्यारी में तेरी जानिब उठने वाली आँखों का रुख़ मोड़ लिया हम ने अपने ऐब दिखाए तेरी पर्दादारी में जाने अब वो किस के साथ निकलता होगा रातों को जाने कौन लगाता होगा दो घंटे तैयारी में
Danish Naqvi
9 likes
सब लोग कहानी में ही मशरूफ़ रहे थे दरअस्ल अदाकार हक़ीक़त में मरे थे जाते हुए कमरे की किसी चीज़ को छू दे मैं याद करूँँगा कि तेरे हाथ लगे थे आँखें भी तेरी फतह न कर पाए अभी तक किस लम्हा ए बेकार में हम लोग बने थे मैं ने तो कहा था निकल जाते है दोनों उस वक़्त कहानी में सभी लोग नए थे
Danish Naqvi
6 likes
मुसीबतें सर-बरहना होंगी अक़ीदतें बे-लिबास होंगी थके हुओं को कहाँ पता था कि सुब्हें यूँँ बद-हवा से होंगी तू देख लेना हमारे बच्चों के बाल जल्दी सफ़ेद होंगे हमारी छोड़ी हुई उदासी से सात नस्लें उदास होंगी कहीं मिलें तुम को भूरी रंगत की गहरी आँखें मुझे बताना मैं जानता हूँ कि ऐसी आँखें बहुत अज़िय्यत-शनास होंगी मैं सर्दियों की ठिठुरती शामों के सर्द लम्हों में सोचता हूँ वो सुर्ख़ हाथों की गर्म पोरें न-जाने अब किस को रास होंगी ये जिस की बेटी के सर की चादर कई जगह से फटी हुई है तुम उस के गाँव में जा के देखो तो आधी फ़स्लें कपास होंगी
Danish Naqvi
4 likes
आवाज़ की दूरी पे खड़ा सोच रहा हूँ अब कौन मुझे देगा सदा सोच रहा हूँ छोटी सी नज़र आती है अतराफ़ की हर शय इस वक़्त मैं कुछ इतना बड़ा सोच रहा हूँ क्या सोचना था मुझ को तिरे बारे में लेकिन अफ़्सोस तिरे बारे में क्या सोच रहा हूँ तू ने तो मिरे बारे में सोचा भी नहीं है मैं फिर भी कोई अच्छा बुरा सोच रहा हूँ जिस दिन से उठीं मुझ पे तिरी सब्ज़ सी आँखें मैं पेड़ नहीं फिर भी हरा सोच रहा हूँ नुक़सान बहुत से थे गए साल के 'दानिश' लेकिन तिरे बारे में बड़ा सोच रहा हूँ
Danish Naqvi
3 likes
माहौल मुनासिब हो तो ऊपर नहीं जाते हम ताज़ा घुटन छोड़ के छत पर नहीं जाते देखो मुझे अब मेरी जगह से न हिलाना फिर तुम मुझे तरतीब से रख कर नहीं जाते बदनाम हैं सदियों से ही काँटों की वजह से आदत से मगर आज भी कीकर नहीं जाते जिस दिन से शिकारी ने अदा की कोई मन्नत दरबार पे उस दिन से कबूतर नहीं जाते सो तुम मुझे हैरत-ज़दा आँखों से न देखो कुछ लोग सँभल जाते हैं सब मर नहीं जाते
Danish Naqvi
9 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Danish Naqvi.
Similar Moods
More moods that pair well with Danish Naqvi's ghazal.







