न होगा यक-बयाबाँ माँदगी से ज़ौक़ कम मेरा हबाब-ए-मौजा-ए-रफ़्तार है नक़्श-ए-क़दम मेरा मोहब्बत थी चमन से लेकिन अब ये बे-दिमाग़ी है कि मौज-ए-बू-ए-गुल से नाक में आता है दम मेरा रह-ए-ख़्वाबीदा थी गर्दन-कश-ए-यक-दर्स-ए-आगाही ज़मीं को सैली-ए-उस्ताद है नक़्श-ए-क़दम मेरा सुराग़-आवारा-ए-अर्ज़-ए-दो-आलम शोर-ए-महशर हूँ पर-अफ़्शाँ है ग़ुबार आँ सू-ए-सहरा-ए-अदम मेरा हवा-ए-सुब्ह यक-आलम गरेबाँ चाकी-ए-गुल है दहान-ए-ज़ख़्म पैदा कर अगर खाता है ग़म मेरा न हो वहशत-कश-ए-दर्स-ए-सराब-ए-सत्र-ए-आगाही मैं गर्द-ए-राह हूँ बे-मुद्दआ है पेच-ओ-ख़म मेरा 'असद' वहशत-परस्त-ए-गोशा-ए-तन्हाई-ए-दिल है ब-रंग-ए-मौज-ए-मय ख़म्याज़ा-ए-साग़र है रम मेरा
Related Ghazal
चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
406 likes
क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
371 likes
सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
140 likes
मेरे लिए तो इश्क़ का वा'दा है शा'इरी आधा सुरूर तुम हो तो आधा है शा'इरी रुद्राक्ष हाथ में है तो सीने में ओम है कृष्णा है मेरा दिल मेरी राधा है शा'इरी अपना तो मेल जोल ही बस आशिकों से है दरवेश का बस एक लबादा है शा'इरी हो आश्ना कोई तो दिखाती है अपना रंग बे रम्ज़ियों के वास्ते सादा है शा'इरी तुम सामने हो और मेरी दस्तरस में हो इस वक़्त मेरे दिल का इरादा है शा'इरी भगवान हो ख़ुदा हो मुहब्बत हो या बदन जिस सम्त भी चलो यही जादा है शा'इरी इस लिए भी इश्क़ ही लिखता हूँ मैं अली मेरा किसी से आख़री वा'दा है शा'इरी
Ali Zaryoun
70 likes
कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे शाम हुए ख़ुश-बाश यहाँ के मेरे पास आ जाते हैं मेरे बुझने का नज़्ज़ारा करने आ जाते होंगे वो जो न आने वाला है ना उस से मुझ को मतलब था आने वालों से क्या मतलब आते हैं आते होंगे उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा यूँँही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे मेरा साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएँगे या'नी मेरे बा'द भी या'नी साँस लिए जाते होंगे
Jaun Elia
88 likes
More from Mirza Ghalib
रौंदी हुई है कौकबा-ए-शहरयार की इतराए क्यूँँ न ख़ाक सर-ए-रहगुज़ार की जब उस के देखने के लिए आएँ बादशाह लोगों में क्यूँँ नुमूद न हो लाला-ज़ार की भूके नहीं हैं सैर-ए-गुलिस्ताँ के हम वले क्यूँँकर न खाइए कि हवा है बहार की
Mirza Ghalib
0 likes
कोह के हों बार-ए-ख़ातिर गर सदा हो जाइए बे-तकल्लुफ़ ऐ शरार-ए-जस्ता क्या हो जाइए बैज़ा-आसा नंग-ए-बाल-ओ-पर है ये कुंज-ए-क़फ़स अज़-सर-ए-नौ ज़िंदगी हो गर रिहा हो जाइए वुसअत-ए-मशरब नियाज़-ए-कुल्फ़त-ए-वहशत 'असद' यक-बयाबाँ साया-ए-बाल-ए-हुमा हो जाइए
Mirza Ghalib
0 likes
तस्कीं को हम न रोएँ जो ज़ौक़-ए-नज़र मिले हूरान-ए-ख़ुल्द में तिरी सूरत मगर मिले अपनी गली में मुझ को न कर दफ़्न बाद-ए-क़त्ल मेरे पते से ख़ल्क़ को क्यूँँ तेरा घर मिले साक़ी-गरी की शर्म करो आज वर्ना हम हर शब पिया ही करते हैं मय जिस क़दर मिले तुझ से तो कुछ कलाम नहीं लेकिन ऐ नदीम मेरा सलाम कहियो अगर नामा-बर मिले तुम को भी हम दिखाएँ कि मजनूँ ने क्या किया फ़ुर्सत कशाकश-ए-ग़म-ए-पिन्हाँ से गर मिले लाज़िम नहीं कि ख़िज़्र की हम पैरवी करें जाना कि इक बुज़ुर्ग हमें हम-सफ़र मिले ऐ साकिनान-ए-कूचा-ए-दिलदार देखना तुम को कहीं जो 'ग़ालिब'-ए-आशुफ़्ता-सर मिले
Mirza Ghalib
1 likes
ग़म नहीं होता है आज़ादों को बेश अज़-यक-नफ़स बर्क़ से करते हैं रौशन शम्-ए-मातम-ख़ाना हम महफ़िलें बरहम करे है गंजिंफ़ा-बाज़-ए-ख़याल हैं वरक़-गर्दानी-ए-नैरंग-ए-यक-बुत-ख़ाना हम बावजूद-ए-यक-जहाँ हंगामा पैदाई नहीं हैं चराग़ान-ए-शबिस्तान-ए-दिल-ए-परवाना हम ज़ोफ़ से है ने क़नाअ'त से ये तर्क-ए-जुस्तुजू हैं वबाल-ए-तकिया-गाह-ए-हिम्मत-ए-मर्दाना हम दाइम-उल-हब्स इस में हैं लाखों तमन्नाएँ 'असद' जानते हैं सीना-ए-पुर-ख़ूँ को ज़िंदाँ-ख़ाना हम बस-कि हैं बद-मस्त-ए-ब-शिकन ब-शिकन-ए-मय-ख़ाना हम मू-ए-शीशा को समझते हैं ख़त-ए-पैमाना हम बस-कि हर-यक-मू-ए-ज़ुल्फ़-अफ़्शाँ से है तार-ए-शुआअ' पंजा-ए-ख़ुर्शीद को समझे हैं दस्त-ए-शाना हम मश्क़-ए-अज़-ख़ुद-रफ़्तगी से हैं ब-गुलज़ार-ए-ख़याल आश्ना ताबीर-ए-ख़्वाब-ए-सब्ज़ा-ए-बेगाना हम फ़र्त-ए-बे-ख़्वाबी से हैं शब-हा-ए-हिज्र-ए-यार में जूँ ज़बान-ए-शम्अ' दाग़-ए-गर्मी-ए-अफ़्साना हम शाम-ए-ग़म में सोज़-ए-इश्क़-ए-आतिश-ए-रुख़्सार से पुर-फ़शान-ए-सोख़्तन हैं सूरत-ए-परवाना हम हसरत-ए-अर्ज़-ए-तमन्ना याँ से समझा चाहिए दो-जहाँ हश्र-ए-ज़बान-ए-ख़ुश्क हैं जूँ शाना हम कश्ती-ए-आलम ब-तूफ़ान-ए-तग़ाफ़ुल दे कि हैं आलम-ए-आब-ए-गुदाज़-ए-जौहर-ए-अफ़्साना हम वहशत-ए-बे-रब्ती-ए-पेच-ओ-ख़म-ए-हस्ती न पूछ नंग-ए-बालीदन हैं जूँ मू-ए-सर-ए-दीवाना हम
Mirza Ghalib
0 likes
घर हमारा जो न रोते भी तो वीराँ होता बहर गर बहर न होता तो बयाबाँ होता तंगी-ए-दिल का गिला क्या ये वो काफ़िर-दिल है कि अगर तंग न होता तो परेशाँ होता बा'द यक-उम्र-ए-वरा' बार तो देता बारे काश रिज़वाँ ही दर-ए-यार का दरबाँ होता
Mirza Ghalib
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Mirza Ghalib.
Similar Moods
More moods that pair well with Mirza Ghalib's ghazal.







