nahin tha dhyan koi todte hue cigarette main tujh ko bhuul gaya chhodte hue cigarette so yuun hua ki pareshaniyon men piine lage ghham-e-hayat se munh modte hue cigarette mushabah kitne hain ham sokhta-jabinon se kisi sutun se sar phodte hue cigarette kal ik malang ko kuude ke dher par la kar nashe ne tod diya jodte hue cigarette hamare saans bhi le kar na bach sake 'afzal' ye khak-dan men dam todte hue cigarette nahin tha dhyan koi todte hue cigarette main tujh ko bhul gaya chhodte hue cigarette so yun hua ki pareshaniyon mein pine lage gham-e-hayat se munh modte hue cigarette mushabah kitne hain hum sokhta-jabinon se kisi sutun se sar phodte hue cigarette kal ek malang ko kude ke dher par la kar nashe ne tod diya jodte hue cigarette hamare sans bhi le kar na bach sake 'afzal' ye khak-dan mein dam todte hue cigarette
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
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मुझे रोना नहीं आवाज़ भी भारी नहीं करनी मोहब्बत की कहानी में अदाकारी नहीं करनी हवा के ख़ौफ़ से लिपटा हुआ हूँ ख़ुश्क टहनी से कहीं जाना नहीं जाने की तय्यारी नहीं करनी तहम्मुल ऐ मोहब्बत हिज्र पथरीला इलाक़ा है तुझे इस रास्ते पर तेज़-रफ़्तारी नहीं करनी हमारा दिल ज़रा उकता गया था घर में रह रह कर यूँँही बाज़ार आए हैं ख़रीदारी नहीं करनी ग़ज़ल को कम-निगाहों की पहुँच से दूर रखता हूँ मुझे बंजर दिमाग़ों में शजर-कारी नहीं करनी वसिय्यत की थी मुझ को क़ैस ने सहरा के बारे में ये मेरा घर है इस की चार-दीवारी नहीं करनी
Afzal Khan
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तभी तो मैं मोहब्बत का हवालाती नहीं होता यहाँ अपने सिवा कोई मुलाक़ाती नहीं होता गिरफ़्तार-ए-वफ़ा रोने का कोई एक मौसम रख जो नाला रोज़ बह निकले वो बरसाती नहीं होता बिछड़ने का इरादा है तो मुझ से मशवरा कर लो मोहब्बत में कोई भी फ़ैसला ज़ाती नहीं होता तुम्हें दिल में जगह दी थी नज़र से दूर क्या करते जो मरकज़ में ठहर जाए मज़ाफ़ाती नहीं होता
Afzal Khan
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तभी तो मैं मोहब्बत का हवालाती नहीं होता यहाँ अपने सिवा कोई मुलाक़ाती नहीं होता गिरफ़्तार-ए-वफ़ा रोने का कोई एक मौसम रख जो नाला रोज़ बह निकले वो बरसाती नहीं होता बिछड़ने का इरादा है तो मुझ से मशवरा कर लो मोहब्बत में कोई भी फ़ैसला ज़ाती नहीं होता तुम्हें दिल में जगह दी थी नज़र से दूर क्या करते जो मरकज़ में ठहर जाए मज़ाफ़ाती नहीं होता
Afzal Khan
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आज ही फ़ुर्सत से कल का मसअला छेड़ूँगा मैं मसअला हल हो तो हल का मसअला छेड़ूँगा मैं वस्ल ओ हिज्राँ में तनासुब रास्त होना चाहिए इश्क़ के रद्द-ए-अमल का मसअला छेड़ूँगा मैं देखना सब लोग मुझ को ख़ारिजी ठहराएँगे कल यहाँ जंग-ए-जमल का मसअला छेड़ूँगा मैं कश्तियों वाले मुझे तावान दे कर पार जाएँ वर्ना लहरों में ख़लल का मसअला छेड़ूँगा मैं मिल ही जाएँगे कहीं तो मुझ को 'बेदिल-हैदरी' कूज़ा-गर वाली ग़ज़ल का मसअला छेड़ूँगा मैं इस शजर की एक टहनी परले आँगन में भी है अपने हम-साए से फल का मसअला छेड़ूँगा मैं
Afzal Khan
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आज ही फ़ुर्सत से कल का मसअला छेड़ूँगा मैं मसअला हल हो तो हल का मसअला छेड़ूँगा मैं वस्ल ओ हिज्राँ में तनासुब रास्त होना चाहिए इश्क़ के रद्द-ए-अमल का मसअला छेड़ूँगा मैं देखना सब लोग मुझ को ख़ारिजी ठहराएँगे कल यहाँ जंग-ए-जमल का मसअला छेड़ूँगा मैं कश्तियों वाले मुझे तावान दे कर पार जाएँ वर्ना लहरों में ख़लल का मसअला छेड़ूँगा मैं मिल ही जाएँगे कहीं तो मुझ को 'बेदिल-हैदरी' कूज़ा-गर वाली ग़ज़ल का मसअला छेड़ूँगा मैं इस शजर की एक टहनी परले आँगन में भी है अपने हम-साए से फल का मसअला छेड़ूँगा मैं
Afzal Khan
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