नज़र से दूर रहे या नज़र के पास रहे हमेशा इश्क़ के मौसम बहुत ही ख़ास रहे मैं तेरे ज़िक्र की वादी में सैर करता रहूँ हमेशा लब पे तिरे नाम की मिठास रहे ये इज़्तिराब जुनूँ को बहुत अखरता है कि तुम क़रीब हो तन पर कोई लिबास रहे वो रू-ब-रू थे तो आँखों से दौर चल निकले खुली न बोतलें ख़ाली सभी गिलास रहे ये बात राज़ की दादी ने हम को बतलाई हमारी उम्र में अब्बा भी देवदास रहे मैं कहकशाओं में ख़ुशियाँ तलाशने निकला मिरे सितारे मिरा चाँद सब उदास रहे मैं मुंतज़र हूँ किसी ऐसे वस्ल का जिस में मिरे बदन पे तिरे जिस्म का लिबास रहे तिरी हयात से जुड़ जाऊँ वाक़िआ'' बन कर तिरी किताब में मेरा भी इकतिसाब रहे
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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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थोड़ा लिक्खा और ज़ियादा छोड़ दिया आने वालों के लिए रस्ता छोड़ दिया तुम क्या जानो उस दरिया पर क्या गुज़री तुम ने तो बस पानी भरना छोड़ दिया लड़कियाँ इश्क़ में कितनी पागल होती हैं फ़ोन बजा और चूल्हा जलता छोड़ दिया रोज़ इक पत्ता मुझ में आ गिरता है जब से मैं ने जंगल जाना छोड़ दिया बस कानों पर हाथ रखे थे थोड़ी देर और फिर उस आवाज़ ने पीछा छोड़ दिए
Tehzeeb Hafi
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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
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हमीं वफ़ाओं से रहते थे बे-यक़ीन बहुत दिल-ओ-निगाह में आए थे मह-जबीन बहुत वो एक शख़्स जो दिखने में ठीक-ठाक सा था बिछड़ रहा था तो लगने लगा हसीन बहुत तू जा रहा था बिछड़ के तो हर क़दम पे तिरे फिसल रही थी मिरे पाँव से ज़मीन बहुत वो जिस में बिछड़े हुए दिल लिपट के रोते हैं मैं देखता हूँ किसी फ़िल्म का वो सीन बहुत तिरे ख़याल भी दिल से नहीं गुज़रते अब इसी मज़ार पे आते थे ज़ाएरीन बहुत तड़प तड़प के जहाँ मैं ने जान दी है 'सिराज' खड़े हुए थे वहीं पर तमाशबीन बहुत
Siraj Faisal Khan
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जुनून सर से उतर गया है वजूद लेकिन बिखर गया है बहुत ख़सारा है आशिक़ी में तमाम इल्म-ओ-हुनर गया है मैं और ही शख़्स हूँ कोई अब जो शख़्स पहले था मर गया है बहुत कड़ा था वो वक़्त मुझ पर वो वक़्त लेकिन गुज़र गया है 'सिराज' इक ख़ुश-मिज़ाज चेहरा मुझे उदासी से भर गया है
Siraj Faisal Khan
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उसे पाने की करते हो दुआ तो मगर उस से भी कल जी भर गया तो यक़ीनन आज हम इक साथ होते अगर करते ज़रा सा हौसला तो चले हो रहनुमा कर इल्म को तुम तुम्हें इस इल्म ने भटका दिया तो समझ सकते हो क्या अंजाम होगा तुम्हारे वार से वो बच गया तो बहुत मसरूफ़ था महफ़िल में माना नहीं कुछ बोलता पर देखता तो किसी को चाहती है पूछ लूँ क्या जवाब इस का मगर हाँ में मिला तो मैं अच्छा हूँ तभी अपना रही हो कोई मुझ से भी अच्छा मिल गया तो बहुत नज़दीक मत आया करो तुम कहीं कुछ हो गई हम से ख़ता तो बहुत से काम कल करने हैं मुझ को मगर ऐ ज़िंदगी कल न हुआ तो ग़ुलामी में जकड़ लेगा कोई फिर वतन ऐसे ही गर लुटता रहा तो उसे फिर कौन मारेगा बताओ ग़म-ए-हिज्राँ ने भी ठुकरा दिया तो
Siraj Faisal Khan
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तिरे एहसास में डूबा हुआ मैं कभी सहरा कभी दरिया हुआ मैं तिरी नज़रें टिकी थीं आसमाँ पर तिरे दामन से था लिपटा हुआ मैं खुली आँखों से भी सोया हूँ अक्सर तुम्हारा रास्ता तकता हुआ मैं ख़ुदा जाने के दलदल में ग़मों के कहाँ तक जाऊँगा धँसता हुआ मैं बहुत पुर-ख़ार थी राह-ए-मोहब्बत चला आया मगर हँसता हुआ मैं कई दिन बा'द उस ने गुफ़्तुगू की कई दिन बा'द फिर अच्छा हुआ मैं
Siraj Faisal Khan
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अब किसी को नहीं मिरा अफ़्सोस जान कर ये बहुत हुआ अफ़्सोस दुख नहीं ये जहाँ मुख़ालिफ़ है साथ अपने नहीं ख़ुदा अफ़्सोस लड़ के बर्बाद हो गए जब हम साथ मिल कर किया गया अफ़्सोस जब भी ख़ुशियों ने दर पे दस्तक दी सामने आ खड़ा हुआ अफ़्सोस हम फ़क़त जंग ही नहीं हारे हौसला भी बिखर गया अफ़्सोस इक ग़ज़ल और हो गई हम से शे'र कोई नहीं हुआ अफ़्सोस आप को मैं ने ठेस पहुँचाई मैं ने बेहद बुरा किया अफ़्सोस ख़ूब-सूरत बहुत नज़र आए जब मिरा दिल नहीं रहा अफ़्सोस मुझ को ख़ुद पर यक़ीं नहीं जानाँ तुम ने मुझ पर यक़ीं किया अफ़्सोस मैं ने बाक़ी नहीं रखा कुछ भी आप ने कुछ नहीं किया अफ़्सोस तू है शर्मिंदा इल्म है लेकिन तू नज़र से उतर गया अफ़्सोस आदमी तू 'सिराज' अच्छा था इतनी जल्दी गुज़र गया अफ़्सोस फ़ातिहा पढ़ कि फूल रख मुझ पर आ गया है तो कुछ जता अफ़्सोस उस ने बर्बाद कर दिया मुझ को उस को इस का नहीं ज़रा अफ़्सोस मुझ को तुम पर बहुत भरोसा था तुम ने मायूस कर दिया अफ़्सोस ऐ ख़ुदा है हसीं तिरी दुनिया पर मिरा जी उचट गया अफ़्सोस
Siraj Faisal Khan
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