ghazalKuch Alfaaz

अब किसी को नहीं मिरा अफ़्सोस जान कर ये बहुत हुआ अफ़्सोस दुख नहीं ये जहाँ मुख़ालिफ़ है साथ अपने नहीं ख़ुदा अफ़्सोस लड़ के बर्बाद हो गए जब हम साथ मिल कर किया गया अफ़्सोस जब भी ख़ुशियों ने दर पे दस्तक दी सामने आ खड़ा हुआ अफ़्सोस हम फ़क़त जंग ही नहीं हारे हौसला भी बिखर गया अफ़्सोस इक ग़ज़ल और हो गई हम से शे'र कोई नहीं हुआ अफ़्सोस आप को मैं ने ठेस पहुँचाई मैं ने बेहद बुरा किया अफ़्सोस ख़ूब-सूरत बहुत नज़र आए जब मिरा दिल नहीं रहा अफ़्सोस मुझ को ख़ुद पर यक़ीं नहीं जानाँ तुम ने मुझ पर यक़ीं किया अफ़्सोस मैं ने बाक़ी नहीं रखा कुछ भी आप ने कुछ नहीं किया अफ़्सोस तू है शर्मिंदा इल्म है लेकिन तू नज़र से उतर गया अफ़्सोस आदमी तू 'सिराज' अच्छा था इतनी जल्दी गुज़र गया अफ़्सोस फ़ातिहा पढ़ कि फूल रख मुझ पर आ गया है तो कुछ जता अफ़्सोस उस ने बर्बाद कर दिया मुझ को उस को इस का नहीं ज़रा अफ़्सोस मुझ को तुम पर बहुत भरोसा था तुम ने मायूस कर दिया अफ़्सोस ऐ ख़ुदा है हसीं तिरी दुनिया पर मिरा जी उचट गया अफ़्सोस

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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नज़र से दूर रहे या नज़र के पास रहे हमेशा इश्क़ के मौसम बहुत ही ख़ास रहे मैं तेरे ज़िक्र की वादी में सैर करता रहूँ हमेशा लब पे तिरे नाम की मिठास रहे ये इज़्तिराब जुनूँ को बहुत अखरता है कि तुम क़रीब हो तन पर कोई लिबास रहे वो रू-ब-रू थे तो आँखों से दौर चल निकले खुली न बोतलें ख़ाली सभी गिलास रहे ये बात राज़ की दादी ने हम को बतलाई हमारी उम्र में अब्बा भी देवदास रहे मैं कहकशाओं में ख़ुशियाँ तलाशने निकला मिरे सितारे मिरा चाँद सब उदास रहे मैं मुंतज़र हूँ किसी ऐसे वस्ल का जिस में मिरे बदन पे तिरे जिस्म का लिबास रहे तिरी हयात से जुड़ जाऊँ वाक़िआ'' बन कर तिरी किताब में मेरा भी इकतिसाब रहे

Siraj Faisal Khan

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हमीं वफ़ाओं से रहते थे बे-यक़ीन बहुत दिल-ओ-निगाह में आए थे मह-जबीन बहुत वो एक शख़्स जो दिखने में ठीक-ठाक सा था बिछड़ रहा था तो लगने लगा हसीन बहुत तू जा रहा था बिछड़ के तो हर क़दम पे तिरे फिसल रही थी मिरे पाँव से ज़मीन बहुत वो जिस में बिछड़े हुए दिल लिपट के रोते हैं मैं देखता हूँ किसी फ़िल्म का वो सीन बहुत तिरे ख़याल भी दिल से नहीं गुज़रते अब इसी मज़ार पे आते थे ज़ाएरीन बहुत तड़प तड़प के जहाँ मैं ने जान दी है 'सिराज' खड़े हुए थे वहीं पर तमाशबीन बहुत

Siraj Faisal Khan

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जुनून सर से उतर गया है वजूद लेकिन बिखर गया है बहुत ख़सारा है आशिक़ी में तमाम इल्म-ओ-हुनर गया है मैं और ही शख़्स हूँ कोई अब जो शख़्स पहले था मर गया है बहुत कड़ा था वो वक़्त मुझ पर वो वक़्त लेकिन गुज़र गया है 'सिराज' इक ख़ुश-मिज़ाज चेहरा मुझे उदासी से भर गया है

Siraj Faisal Khan

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उसे पाने की करते हो दुआ तो मगर उस से भी कल जी भर गया तो यक़ीनन आज हम इक साथ होते अगर करते ज़रा सा हौसला तो चले हो रहनुमा कर इल्म को तुम तुम्हें इस इल्म ने भटका दिया तो समझ सकते हो क्या अंजाम होगा तुम्हारे वार से वो बच गया तो बहुत मसरूफ़ था महफ़िल में माना नहीं कुछ बोलता पर देखता तो किसी को चाहती है पूछ लूँ क्या जवाब इस का मगर हाँ में मिला तो मैं अच्छा हूँ तभी अपना रही हो कोई मुझ से भी अच्छा मिल गया तो बहुत नज़दीक मत आया करो तुम कहीं कुछ हो गई हम से ख़ता तो बहुत से काम कल करने हैं मुझ को मगर ऐ ज़िंदगी कल न हुआ तो ग़ुलामी में जकड़ लेगा कोई फिर वतन ऐसे ही गर लुटता रहा तो उसे फिर कौन मारेगा बताओ ग़म-ए-हिज्राँ ने भी ठुकरा दिया तो

Siraj Faisal Khan

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तिरे एहसास में डूबा हुआ मैं कभी सहरा कभी दरिया हुआ मैं तिरी नज़रें टिकी थीं आसमाँ पर तिरे दामन से था लिपटा हुआ मैं खुली आँखों से भी सोया हूँ अक्सर तुम्हारा रास्ता तकता हुआ मैं ख़ुदा जाने के दलदल में ग़मों के कहाँ तक जाऊँगा धँसता हुआ मैं बहुत पुर-ख़ार थी राह-ए-मोहब्बत चला आया मगर हँसता हुआ मैं कई दिन बा'द उस ने गुफ़्तुगू की कई दिन बा'द फिर अच्छा हुआ मैं

Siraj Faisal Khan

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