हमीं वफ़ाओं से रहते थे बे-यक़ीन बहुत दिल-ओ-निगाह में आए थे मह-जबीन बहुत वो एक शख़्स जो दिखने में ठीक-ठाक सा था बिछड़ रहा था तो लगने लगा हसीन बहुत तू जा रहा था बिछड़ के तो हर क़दम पे तिरे फिसल रही थी मिरे पाँव से ज़मीन बहुत वो जिस में बिछड़े हुए दिल लिपट के रोते हैं मैं देखता हूँ किसी फ़िल्म का वो सीन बहुत तिरे ख़याल भी दिल से नहीं गुज़रते अब इसी मज़ार पे आते थे ज़ाएरीन बहुत तड़प तड़प के जहाँ मैं ने जान दी है 'सिराज' खड़े हुए थे वहीं पर तमाशबीन बहुत
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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तुम्हारे ग़म से तौबा कर रहा हूँ तअ'ज्जुब है मैं ऐसा कर रहा हूँ है अपने हाथ में अपना गिरेबाँ न जाने किस से झगड़ा कर रहा हूँ बहुत से बंद ताले खुल रहे हैं तिरे सब ख़त इकट्ठा कर रहा हूँ कोई तितली निशाने पर नहीं है मैं बस रंगों का पीछा कर रहा हूँ मैं रस्मन कह रहा हूँ फिर मिलेंगे ये मत समझो कि वा'दा कर रहा हूँ मिरे अहबाब सारे शहर में हैं मैं अपने गाँव में क्या कर रहा हूँ मिरी हर इक ग़ज़ल असली है साहब कई बरसों से धंदा कर रहा हूँ
Zubair Ali Tabish
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अज़िय्यत है कि रोज़-ओ-शब घुटन महसूस होती है भले हों पास मेरे सब घुटन महसूस होती है घुटन मेरी दीवानी है घुटन का मैं दीवाना हूँ ज़माने को बिना मतलब घुटन महसूस होती है मुझे तुझ पर नहीं ख़ुद पर बहुत अफ़सोस होता है तेरे होते हुए भी जब घुटन महसूस होती है वही जिस बाग़ में सब लोग ताज़ा साँस लेते हैं मुझे उस बाग़ में भी अब घुटन महसूस होती है
Ahmad Abdullah
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वो मुँह लगाता है जब कोई काम होता है जो उस का होता है समझो ग़ुलाम होता है किसी का हो के दुबारा न आना मेरी तरफ़ मोहब्बतों में हलाला हराम होता है इसे भी गिनते हैं हम लोग अहल-ए-ख़ाना में हमारे याँ तो शजर का भी नाम होता है तुझ ऐसे शख़्स के होते हैं ख़ास दोस्त बहुत तुझ ऐसा शख़्स बहुत जल्द आम होता है कभी लगी है तुम्हें कोई शाम आख़िरी शाम हमारे साथ ये हर एक शाम होता है
Umair Najmi
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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी
Ali Zaryoun
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नज़र से दूर रहे या नज़र के पास रहे हमेशा इश्क़ के मौसम बहुत ही ख़ास रहे मैं तेरे ज़िक्र की वादी में सैर करता रहूँ हमेशा लब पे तिरे नाम की मिठास रहे ये इज़्तिराब जुनूँ को बहुत अखरता है कि तुम क़रीब हो तन पर कोई लिबास रहे वो रू-ब-रू थे तो आँखों से दौर चल निकले खुली न बोतलें ख़ाली सभी गिलास रहे ये बात राज़ की दादी ने हम को बतलाई हमारी उम्र में अब्बा भी देवदास रहे मैं कहकशाओं में ख़ुशियाँ तलाशने निकला मिरे सितारे मिरा चाँद सब उदास रहे मैं मुंतज़र हूँ किसी ऐसे वस्ल का जिस में मिरे बदन पे तिरे जिस्म का लिबास रहे तिरी हयात से जुड़ जाऊँ वाक़िआ'' बन कर तिरी किताब में मेरा भी इकतिसाब रहे
Siraj Faisal Khan
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जुनून सर से उतर गया है वजूद लेकिन बिखर गया है बहुत ख़सारा है आशिक़ी में तमाम इल्म-ओ-हुनर गया है मैं और ही शख़्स हूँ कोई अब जो शख़्स पहले था मर गया है बहुत कड़ा था वो वक़्त मुझ पर वो वक़्त लेकिन गुज़र गया है 'सिराज' इक ख़ुश-मिज़ाज चेहरा मुझे उदासी से भर गया है
Siraj Faisal Khan
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उसे पाने की करते हो दुआ तो मगर उस से भी कल जी भर गया तो यक़ीनन आज हम इक साथ होते अगर करते ज़रा सा हौसला तो चले हो रहनुमा कर इल्म को तुम तुम्हें इस इल्म ने भटका दिया तो समझ सकते हो क्या अंजाम होगा तुम्हारे वार से वो बच गया तो बहुत मसरूफ़ था महफ़िल में माना नहीं कुछ बोलता पर देखता तो किसी को चाहती है पूछ लूँ क्या जवाब इस का मगर हाँ में मिला तो मैं अच्छा हूँ तभी अपना रही हो कोई मुझ से भी अच्छा मिल गया तो बहुत नज़दीक मत आया करो तुम कहीं कुछ हो गई हम से ख़ता तो बहुत से काम कल करने हैं मुझ को मगर ऐ ज़िंदगी कल न हुआ तो ग़ुलामी में जकड़ लेगा कोई फिर वतन ऐसे ही गर लुटता रहा तो उसे फिर कौन मारेगा बताओ ग़म-ए-हिज्राँ ने भी ठुकरा दिया तो
Siraj Faisal Khan
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तिरे एहसास में डूबा हुआ मैं कभी सहरा कभी दरिया हुआ मैं तिरी नज़रें टिकी थीं आसमाँ पर तिरे दामन से था लिपटा हुआ मैं खुली आँखों से भी सोया हूँ अक्सर तुम्हारा रास्ता तकता हुआ मैं ख़ुदा जाने के दलदल में ग़मों के कहाँ तक जाऊँगा धँसता हुआ मैं बहुत पुर-ख़ार थी राह-ए-मोहब्बत चला आया मगर हँसता हुआ मैं कई दिन बा'द उस ने गुफ़्तुगू की कई दिन बा'द फिर अच्छा हुआ मैं
Siraj Faisal Khan
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अब किसी को नहीं मिरा अफ़्सोस जान कर ये बहुत हुआ अफ़्सोस दुख नहीं ये जहाँ मुख़ालिफ़ है साथ अपने नहीं ख़ुदा अफ़्सोस लड़ के बर्बाद हो गए जब हम साथ मिल कर किया गया अफ़्सोस जब भी ख़ुशियों ने दर पे दस्तक दी सामने आ खड़ा हुआ अफ़्सोस हम फ़क़त जंग ही नहीं हारे हौसला भी बिखर गया अफ़्सोस इक ग़ज़ल और हो गई हम से शे'र कोई नहीं हुआ अफ़्सोस आप को मैं ने ठेस पहुँचाई मैं ने बेहद बुरा किया अफ़्सोस ख़ूब-सूरत बहुत नज़र आए जब मिरा दिल नहीं रहा अफ़्सोस मुझ को ख़ुद पर यक़ीं नहीं जानाँ तुम ने मुझ पर यक़ीं किया अफ़्सोस मैं ने बाक़ी नहीं रखा कुछ भी आप ने कुछ नहीं किया अफ़्सोस तू है शर्मिंदा इल्म है लेकिन तू नज़र से उतर गया अफ़्सोस आदमी तू 'सिराज' अच्छा था इतनी जल्दी गुज़र गया अफ़्सोस फ़ातिहा पढ़ कि फूल रख मुझ पर आ गया है तो कुछ जता अफ़्सोस उस ने बर्बाद कर दिया मुझ को उस को इस का नहीं ज़रा अफ़्सोस मुझ को तुम पर बहुत भरोसा था तुम ने मायूस कर दिया अफ़्सोस ऐ ख़ुदा है हसीं तिरी दुनिया पर मिरा जी उचट गया अफ़्सोस
Siraj Faisal Khan
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