ghazalKuch Alfaaz

जुनून सर से उतर गया है वजूद लेकिन बिखर गया है बहुत ख़सारा है आशिक़ी में तमाम इल्म-ओ-हुनर गया है मैं और ही शख़्स हूँ कोई अब जो शख़्स पहले था मर गया है बहुत कड़ा था वो वक़्त मुझ पर वो वक़्त लेकिन गुज़र गया है 'सिराज' इक ख़ुश-मिज़ाज चेहरा मुझे उदासी से भर गया है

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एक और शख़्स छोड़ कर चला गया तो क्या हुआ हमारे साथ कौन सा ये पहली मर्तबा हुआ अज़ल से इन हथेलियों में हिज्र की लकीर थी तुम्हारा दुख तो जैसे मेरे हाथ में बड़ा हुआ मेरे ख़िलाफ़ दुश्मनों की सफ़ में है वो और मैं बहुत बुरा लगूँगा उस पर तीर खींचता हुआ

Tehzeeb Hafi

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फिर मिरी याद आ रही होगी फिर वो दीपक बुझा रही होगी फिर मिरे फेसबुक पे आ कर वो ख़ुद को बैनर बना रही होगी अपने बेटे का चूम कर माथा मुझ को टीका लगा रही होगी फिर उसी ने उसे छुआ होगा फिर उसी से निभा रही होगी जिस्म चादर सा बिछ गया होगा रूह सिलवट हटा रही होगी फिर से इक रात कट गई होगी फिर से इक रात आ रही होगी

Kumar Vishwas

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सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से सो अपने आप को बर्बाद कर के देखते हैं सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उस की सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं सुना है उस को भी है शे'र ओ शा'इरी से शग़फ़ सो हम भी मो'जिज़े अपने हुनर के देखते हैं सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं सुना है हश्र हैं उस की ग़ज़ाल सी आँखें सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस की सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं सुना है उस की सियह-चश्मगी क़यामत है सो उस को सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं सुना है उस के लबों से गुलाब जलते हैं सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं सुना है आइना तिमसाल है जबीं उस की जो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं सुना है जब से हमाइल हैं उस की गर्दन में मिज़ाज और ही लाल ओ गुहर के देखते हैं सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में पलंग ज़ाविए उस की कमर के देखते हैं सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं वो सर्व-क़द है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं कि उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का सो रह-रवान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं सुना है उस के शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त मकीं उधर के भी जल्वे इधर के देखते हैं रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं चले तो उस को ज़माने ठहर के देखते हैं किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे कभी कभी दर ओ दीवार घर के देखते हैं कहानियाँ ही सही सब मुबालग़े ही सही अगर वो ख़्वाब है ता'बीर कर के देखते हैं अब उस के शहर में ठहरें कि कूच कर जाएँ 'फ़राज़' आओ सितारे सफ़र के देखते हैं

Ahmad Faraz

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मेरे दिल में ये तेरे सिवा कौन है? तू नहीं है तो तेरी जगह कौन है? हम मोहब्बत में हारे हुए लोग हैं और मोहब्बत में जीता हुआ कौन है? मेरे पहलू से उठ के गया कौन है? तू नहीं है तो तेरी जगह कौन है? तू ने जाते हुए ये बताया नहीं मैं तेरा कौन हूँ तू मेरा कौन है

Tehzeeb Hafi

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मफ़रूर परिंदों को ये ऐलान गया है सय्याद नशेमन का पता जान गया है या'नी जिसे दीमक लगी जाती थी वो मैं था अब जा के मेरा मेरी तरफ़ ध्यान गया है शीशे में भले उस ने मेरी नक़्ल उतारी ख़ुश हूँ कि मुझे कोई तो पहचान गया है अब बात तेरी कुन पे है कुछ कर मेरे मौला इक शख़्स तेरे दर से परेशान गया है ये नाम-ओ-नसब जा के ज़माने को बताओ दरवेश तो दस्तक से ही पहचान गया है

Ahmad Abdullah

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हमीं वफ़ाओं से रहते थे बे-यक़ीन बहुत दिल-ओ-निगाह में आए थे मह-जबीन बहुत वो एक शख़्स जो दिखने में ठीक-ठाक सा था बिछड़ रहा था तो लगने लगा हसीन बहुत तू जा रहा था बिछड़ के तो हर क़दम पे तिरे फिसल रही थी मिरे पाँव से ज़मीन बहुत वो जिस में बिछड़े हुए दिल लिपट के रोते हैं मैं देखता हूँ किसी फ़िल्म का वो सीन बहुत तिरे ख़याल भी दिल से नहीं गुज़रते अब इसी मज़ार पे आते थे ज़ाएरीन बहुत तड़प तड़प के जहाँ मैं ने जान दी है 'सिराज' खड़े हुए थे वहीं पर तमाशबीन बहुत

Siraj Faisal Khan

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उसे पाने की करते हो दुआ तो मगर उस से भी कल जी भर गया तो यक़ीनन आज हम इक साथ होते अगर करते ज़रा सा हौसला तो चले हो रहनुमा कर इल्म को तुम तुम्हें इस इल्म ने भटका दिया तो समझ सकते हो क्या अंजाम होगा तुम्हारे वार से वो बच गया तो बहुत मसरूफ़ था महफ़िल में माना नहीं कुछ बोलता पर देखता तो किसी को चाहती है पूछ लूँ क्या जवाब इस का मगर हाँ में मिला तो मैं अच्छा हूँ तभी अपना रही हो कोई मुझ से भी अच्छा मिल गया तो बहुत नज़दीक मत आया करो तुम कहीं कुछ हो गई हम से ख़ता तो बहुत से काम कल करने हैं मुझ को मगर ऐ ज़िंदगी कल न हुआ तो ग़ुलामी में जकड़ लेगा कोई फिर वतन ऐसे ही गर लुटता रहा तो उसे फिर कौन मारेगा बताओ ग़म-ए-हिज्राँ ने भी ठुकरा दिया तो

Siraj Faisal Khan

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नज़र से दूर रहे या नज़र के पास रहे हमेशा इश्क़ के मौसम बहुत ही ख़ास रहे मैं तेरे ज़िक्र की वादी में सैर करता रहूँ हमेशा लब पे तिरे नाम की मिठास रहे ये इज़्तिराब जुनूँ को बहुत अखरता है कि तुम क़रीब हो तन पर कोई लिबास रहे वो रू-ब-रू थे तो आँखों से दौर चल निकले खुली न बोतलें ख़ाली सभी गिलास रहे ये बात राज़ की दादी ने हम को बतलाई हमारी उम्र में अब्बा भी देवदास रहे मैं कहकशाओं में ख़ुशियाँ तलाशने निकला मिरे सितारे मिरा चाँद सब उदास रहे मैं मुंतज़र हूँ किसी ऐसे वस्ल का जिस में मिरे बदन पे तिरे जिस्म का लिबास रहे तिरी हयात से जुड़ जाऊँ वाक़िआ'' बन कर तिरी किताब में मेरा भी इकतिसाब रहे

Siraj Faisal Khan

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अब किसी को नहीं मिरा अफ़्सोस जान कर ये बहुत हुआ अफ़्सोस दुख नहीं ये जहाँ मुख़ालिफ़ है साथ अपने नहीं ख़ुदा अफ़्सोस लड़ के बर्बाद हो गए जब हम साथ मिल कर किया गया अफ़्सोस जब भी ख़ुशियों ने दर पे दस्तक दी सामने आ खड़ा हुआ अफ़्सोस हम फ़क़त जंग ही नहीं हारे हौसला भी बिखर गया अफ़्सोस इक ग़ज़ल और हो गई हम से शे'र कोई नहीं हुआ अफ़्सोस आप को मैं ने ठेस पहुँचाई मैं ने बेहद बुरा किया अफ़्सोस ख़ूब-सूरत बहुत नज़र आए जब मिरा दिल नहीं रहा अफ़्सोस मुझ को ख़ुद पर यक़ीं नहीं जानाँ तुम ने मुझ पर यक़ीं किया अफ़्सोस मैं ने बाक़ी नहीं रखा कुछ भी आप ने कुछ नहीं किया अफ़्सोस तू है शर्मिंदा इल्म है लेकिन तू नज़र से उतर गया अफ़्सोस आदमी तू 'सिराज' अच्छा था इतनी जल्दी गुज़र गया अफ़्सोस फ़ातिहा पढ़ कि फूल रख मुझ पर आ गया है तो कुछ जता अफ़्सोस उस ने बर्बाद कर दिया मुझ को उस को इस का नहीं ज़रा अफ़्सोस मुझ को तुम पर बहुत भरोसा था तुम ने मायूस कर दिया अफ़्सोस ऐ ख़ुदा है हसीं तिरी दुनिया पर मिरा जी उचट गया अफ़्सोस

Siraj Faisal Khan

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तिरे एहसास में डूबा हुआ मैं कभी सहरा कभी दरिया हुआ मैं तिरी नज़रें टिकी थीं आसमाँ पर तिरे दामन से था लिपटा हुआ मैं खुली आँखों से भी सोया हूँ अक्सर तुम्हारा रास्ता तकता हुआ मैं ख़ुदा जाने के दलदल में ग़मों के कहाँ तक जाऊँगा धँसता हुआ मैं बहुत पुर-ख़ार थी राह-ए-मोहब्बत चला आया मगर हँसता हुआ मैं कई दिन बा'द उस ने गुफ़्तुगू की कई दिन बा'द फिर अच्छा हुआ मैं

Siraj Faisal Khan

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