ghazalKuch Alfaaz

निगाह-ए-यार जिसे आश्ना-ए-राज़ करे वो अपनी ख़ूबी-ए-क़िस्मत पे क्यूँँ न नाज़ करे दिलों को फ़िक्र-ए-दो-आलम से कर दिया आज़ाद तिरे जुनूँ का ख़ुदा सिलसिला दराज़ करे ख़िरद का नाम जुनूँ पड़ गया जुनूँ का ख़िरद जो चाहे आप का हुस्न-ए-करिश्मा-साज़ करे तिरे सितम से मैं ख़ुश हूँ कि ग़ालिबन यूँँ भी मुझे वो शामिल-ए-अरबाब-ए-इम्तियाज़ करे ग़म-ए-जहाँ से जिसे हो फ़राग़ की ख़्वाहिश वो उन के दर्द-ए-मोहब्बत से साज़-बाज़ करे उम्मीद-वार हैं हर सम्त आशिक़ों के गिरोह तिरी निगाह को अल्लाह दिल-नवाज़ करे तिरे करम का सज़ा-वार तो नहीं 'हसरत' अब आगे तेरी ख़ुशी है जो सरफ़राज़ करे

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Waseem Barelvi

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हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए

Yasir Khan

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कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे शाम हुए ख़ुश-बाश यहाँ के मेरे पास आ जाते हैं मेरे बुझने का नज़्ज़ारा करने आ जाते होंगे वो जो न आने वाला है ना उस से मुझ को मतलब था आने वालों से क्या मतलब आते हैं आते होंगे उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा यूँँही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे मेरा साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएँगे या'नी मेरे बा'द भी या'नी साँस लिए जाते होंगे

Jaun Elia

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सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से सो अपने आप को बर्बाद कर के देखते हैं सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उस की सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं सुना है उस को भी है शे'र ओ शा'इरी से शग़फ़ सो हम भी मो'जिज़े अपने हुनर के देखते हैं सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं सुना है हश्र हैं उस की ग़ज़ाल सी आँखें सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस की सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं सुना है उस की सियह-चश्मगी क़यामत है सो उस को सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं सुना है उस के लबों से गुलाब जलते हैं सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं सुना है आइना तिमसाल है जबीं उस की जो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं सुना है जब से हमाइल हैं उस की गर्दन में मिज़ाज और ही लाल ओ गुहर के देखते हैं सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में पलंग ज़ाविए उस की कमर के देखते हैं सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं वो सर्व-क़द है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं कि उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का सो रह-रवान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं सुना है उस के शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त मकीं उधर के भी जल्वे इधर के देखते हैं रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं चले तो उस को ज़माने ठहर के देखते हैं किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे कभी कभी दर ओ दीवार घर के देखते हैं कहानियाँ ही सही सब मुबालग़े ही सही अगर वो ख़्वाब है ता'बीर कर के देखते हैं अब उस के शहर में ठहरें कि कूच कर जाएँ 'फ़राज़' आओ सितारे सफ़र के देखते हैं

Ahmad Faraz

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और भी हो गए बेगाना वो ग़फ़लत कर के आज़माया जो उन्हें ज़ब्त-ए-मोहब्बत कर के दिल ने छोड़ा है न छोड़े तिरे मिलने का ख़याल बार-हा देख लिया हम ने मलामत कर के देखने आए थे वो अपनी मोहब्बत का असर कहने को ये है कि आए हैं अयादत कर के पस्ती-ए-हौसला-ए-शौक़ की अब है ये सलाह बैठ रहिए ग़म-ए-हिज्राँ पे क़नाअ'त कर के दिल ने पाया है मोहब्बत का ये आली रुत्बा आप के दर्द-ए-दवाकार की ख़िदमत कर के रूह ने पाई है तकलीफ़-ए-जुदाई से नजात आप की याद को सरमाया-ए-राहत कर के छेड़ से अब वो ये कहते हैं कि संभलों 'हसरत' सब्र ओ ताब-ए-दिल-ए-बीमार को ग़ारत कर के

Hasrat Mohani

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है मश्क़-ए-सुख़न जारी चक्की की मशक़्क़त भी इक तुर्फ़ा तमाशा है 'हसरत' की तबीअत भी जो चाहो सज़ा दे लो तुम और भी खुल खेलो पर हम से क़सम ले लो की हो जो शिकायत भी दुश्वार है रिंदों पर इंकार-ए-करम यकसर ऐ साक़ी-ए-जाँ-परवर कुछ लुत्फ़-ओ-इनायत भी दिल बस-कि है दीवाना उस हुस्न-ए-गुलाबी का रंगीं है उसी रू से शायद ग़म-ए-फ़ुर्क़त भी ख़ुद इश्क़ की गुस्ताख़ी सब तुझ को सिखा देगी ऐ हुस्न-ए-हया-परवर शोख़ी भी शरारत भी बरसात के आते ही तौबा न रही बाक़ी बादल जो नज़र आए बदली मेरी निय्यत भी उश्शाक़ के दिल नाज़ुक उस शोख़ की ख़ू नाज़ुक नाज़ुक इसी निस्बत से है कार-ए-मोहब्बत भी रखते हैं मिरे दिल पर क्यूँँ तोहमत-ए-बेताबी याँ नाला-ए-मुज़्तर की जब मुझ में हो क़ुव्वत भी ऐ शौक़ की बेबाकी वो क्या तेरी ख़्वाहिश थी जिस पर उन्हें ग़ुस्सा है इनकार भी हैरत भी हर-चंद है दिल शैदा हुर्रियत-ए-कामिल का मंज़ूर-ए-दुआ लेकिन है क़ैद-ए-मोहब्बत भी हैं 'शाद' ओ 'सफ़ी' शाइ'र या 'शौक़' ओ 'वफ़ा' 'हसरत' फिर 'ज़ामिन' ओ 'महशर' हैं 'इक़बाल' भी 'वहशत' भी

Hasrat Mohani

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क्या वो अब नादिम हैं अपने जौर की रूदाद से लाए हैं मेरठ जो आख़िर मुझ को फ़ैज़ाबाद से सैर-ए-गुल को आई थी जिस दम सवारी आप की फूल उट्ठा था चमन फ़ख़्र-ए-मुबारकबाद से हर कस-ओ-ना-कस हो क्यूँँकर कामगार-ए-बे-ख़ुदी ये हुनर सीखा है दिल ने इक बड़े उस्ताद से इक जहाँ मस्त-ए-मोहब्बत है कि हर सू ब-ए-उन्स छाई है उन गेसुओं की निकहत-ए-बर्बाद से अब तलक मौजूद है कुछ कुछ लगा लाए थे हम वो जो इक लपका कभी न ख़ाक-ए-जहाँ आबाद से दावा-ए-तक़्वा का 'हसरत' किस को आता है यक़ीं आप और जाते रहें पीर-ए-मुग़ाँ की याद से

Hasrat Mohani

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आसान-ए-हक़ीकी है न कुछ सहल-ए-मजाज़ी मालूम हुई राह-ए-मोहब्बत की दराज़ी कुछ लुत्फ़ ओ नज़र लाज़िम ओ मलज़ूम नहीं हैं इक ये भी तमन्ना की न हो शोबदा बाज़ी दिल ख़ूब समझता है तिरे हर्फ़-ए-करम को हर-चंद वो उर्दू है न तुर्की है न ताज़ी क़ाएम है न वो हुस्न-ए-रुख़-ए-यार का आलम बाक़ी है न वो शौक़ की हंगामा-नवाज़ी ऐ इश्क़ तिरी फ़तह बहर-हाल है साबित मर कर भी शहीदान-ए-मोहब्बत हुए ग़ाज़ी कर जल्द हमें ख़त्म कहीं ऐ ग़म-ए-जानाँ काम आएगी किस रोज़ तिरी सीना-गुदाज़ी मालूम है दुनिया को ये 'हसरत' की हक़ीक़त ख़ल्वत में वो मय-ख़्वार है जल्वत में नमाज़ी

Hasrat Mohani

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और तो पास मिरे हिज्र में क्या रक्खा है इक तिरे दर्द को पहलू में छुपा रक्खा है दिल से अरबाब-ए-वफ़ा का है भुलाना मुश्किल हम ने ये उन के तग़ाफ़ुल को सुना रक्खा है तुम ने बाल अपने जो फूलों में बसा रक्खे हैं शौक़ को और भी दीवाना बना रक्खा है सख़्त बे-दर्द है तासीर-ए-मोहब्बत कि उन्हें बिस्तर-ए-नाज़ पे सोते से जगा रक्खा है आह वो याद कि उस याद को हो कर मजबूर दिल-ए-मायूस ने मुद्दत से भुला रक्खा है क्या तअम्मुल है मिरे क़त्ल में ऐ बाज़ू-ए-यार एक ही वार में सर तन से जुदा रक्खा है हुस्न को जौर से बेगाना न समझो कि उसे ये सबक़ इश्क़ ने पहले ही पढ़ा रक्खा है तेरी निस्बत से सितमगर तिरे मायूसों ने दाग़-ए-हिर्मां को भी सीने से लगा रक्खा है कहते हैं अहल-ए-जहाँ दर्द-ए-मोहब्बत जिस को नाम उसी का दिल-ए-मुज़्तर ने दवा रक्खा है निगह-ए-यार से पैकान-ए-क़ज़ा का मुश्ताक़ दिल-ए-मजबूर निशाने पे खुला रक्खा है इस का अंजाम भी कुछ सोच लिया है 'हसरत' तू ने रब्त उन से जो इस दर्जा बढ़ा रक्खा है

Hasrat Mohani

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